दफ्तर में महिला सहकर्मी को घूरने वाले आरोपी को क्लीन चिट, बॉम्बे हाईकोर्ट रद्द की FIR
Sourabh Bhatnagar | Apr 12, 2026, 11:48 IST
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बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऑफिस में महिला सहकर्मी को घूरना नैतिक रूप से गलत है, लेकिन यह वॉयरिज्म नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने इंश्योरेंस कर्मचारी के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करते हुए यह बात कही है।
News In Short
- बॉम्बे हाईकोर्ट ने वर्कप्लेस व्यवहार पर बड़ा फैसला सुनाया है।
- ऑफिस में महिला को घूरना IPC 354C के तहत अपराध नहीं।
- हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी है।
- हाईकोर्ट ने कहा कि वॉयरिज्म तभी लागू होता है जब 'निजी कृत्य' हो।
- कोर्ट ने नैतिकता और कानून के बीच फर्क साफ किया।
News In Detail
पहले समझें Voyeurism क्या है?
अब समझें क्या था पूरा मामला
शिकायत के मुताबिक, मामला 2014 का है। आरोपी एक बीमा कंपनी में असिस्टेंट वाइस-प्रेसिडेंट था और शिकायतकर्ता डिप्टी सेल्स मैनेजर के पद पर थी। महिला का कहना था कि मीटिंग्स के दौरान निगुडकर सामान्य आई-कॉन्टैक्ट (Eye Contact) करने की बजाय जानबूझकर उसके सीने की तरफ टकटकी लगाकर देखता था।
कंपनी की आंतरिक शिकायत समिति यानी आईसीसी (ICC - Internal Complaints Committee) ने पहले इस मामले की जांच की। जांच के बाद ICC ने आरोपी को क्लीन चिट दे दी।
इसके बाद, आरोपी ने महिला के काम में खामियां निकालना शुरू कर दी और उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया। कंपनी ने महिला को नोटिस जारी किया और नौकरी से निकालने की धमकी दी।इसके बाद मामला मुंबई पुलिस तक पहुंचा और IPC की धारा 354C के तहत 2015 में FIR दर्ज हुई।
धारा 354C क्या कहती है?
निजी कृत्य का अर्थ उन पलों से है जहां महिला को पूरी तरह से प्राइवेसी की उम्मीद होती है। जैसे वॉशरूम का उपयोग करते समय या कपड़े बदलते समय। ऑफिस में एक खुले माहौल में किसी को घूरना इस परिभाषा में नहीं आता।
गलत है, लेकिन अपराध नहीं- कोर्ट
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि शिकायत में कहीं भी यह नहीं बताया गया कि आरोपी ने महिला को किसी निजी काम के दौरान देखा या उसकी कोई रिकॉर्डिंग की।
अदालत ने कहा कि आरोपी का व्यवहार अपमानजनक और कार्यस्थल पर अनुचित हो सकता है, लेकिन यह धारा 354-सी के तहत अपराध नहीं बनता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि हर वर्कप्लेस विवाद को आपराधिक मामला बनाना सही नहीं है। यहां आरोप सिर्फ घूरने और अपमानजनक व्यवहार तक सीमित हैं, जो इस धारा के दायरे में नहीं आते है। इसी आधार पर अदालत ने निगुडकर के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया।
यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह बताता है कि कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी अलग-अलग होती है। भले ही कोई व्यवहार पेशेवर माहौल के लिहाज से पूरी तरह अशोभनीय हो, लेकिन हर गलत काम को एक खास कानूनी धारा में नहीं बांधा जा सकता।
वर्कप्लेस पर महिलाओं के अधिकार
भारत में कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से बचाव के लिए POSH (Prevention of Sexual Harassment) कानून यानी 'यौन उत्पीड़न रोकथाम कानून 2013' मौजूद है।
इस कानून के तहत कंपनियों को ICC बनाना अनिवार्य है। इस मामले में ICC ने जांच कर आरोपी को क्लीन चिट दी थी। लेकिन POSH (POSH ACT-2013) कानून के तहत मिलने वाली राहत और IPC के तहत मिलने वाली सजा अलग-अलग चीजें हैं।
कोर्ट का यह फैसला यह भी याद दिलाता है कि वर्कप्लेस पर महिलाओं को सुरक्षित माहौल देने की जिम्मेदारी सिर्फ पुलिस या अदालत की नहीं है। कंपनियों को खुद भी ऐसे व्यवहार के खिलाफ सख्त नीतियां बनानी होंगी।
इलाहाबाद एचसी की इस बात से नाराज हुआ था एससी
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि हम हाईकोर्ट का आदेश खारिज करेंगे और ट्रायल को जारी रखने देंगे।" हाईकोर्ट ने आरोपियों पर लगे ‘रेप के प्रयास’ के आरोप को हटा दिया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपना पक्ष साफ किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां पीड़िता पर डर का असर डालती हैं और कई बार शिकायत वापस लेने का दबाव भी बनाती हैं।
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