आमरस का भोग लगते ही बीमार हो जाते हैं भगवान जगदीश, जानें पूरी कथा
राजस्थान के कोटा शहर में स्थित ऐतिहासिक जगदीश मंदिर में ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन मौके पर एक प्राचीन परंपरा निभाई जाती है। इस अनूठी रस्म के तहत इंसानों की तरह भगवान भी बीमार पड़ जाते हैं। भीषण गर्मी में ठंडे जल से स्नान और आमरस का भारी भोग लगते ही भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं।
इसके बाद उनके स्वास्थ्य सुधार के लिए अगले दो हफ्तों तक मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद रखे जाते हैं। यहां दूर-दूर से लोग इस अनोखे प्राचीन परंपरा के बारे में जानने के लिए आते हैं। आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी।
भगवान जगदीश क्यों होते हैं बीमार
स्थानीय लोगों के मुताबिक, यह परंपरा करीब 250 सालों से चली आ रही है। ज्येष्ठ महीने में उत्तर भारत में बहुत तेज और भीषण गर्मी पड़ती है। ऐसे में भगवान जगदीश स्वामी को गर्मी से राहत देने के लिए विशेष पूजा होती है। पुजारी सबसे पहले भगवान का 51 पवित्र जल कलशों से अभिषेक करते हैं। साथ ही भगवान को पंचामृत से भी स्नान कराया जाता है।
इसके तुरंत बाद उन्हें शुद्ध और मीठे आमरस का भोग लगता है। भगवान को लगभग आमरस अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि ठंडे पानी और भारी आमरस से भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं।
बीमार होने के बाद उनकी देखभाल कैसे की जाती है
भगवान के बीमार होते ही मंदिर में सन्नाटा पसर जाता है। मंदिर प्रशासन उनके आराम का पूरा ध्यान बहुत गंभीरता से रखता है। गर्भगृह में किसी भी तरह का शोर मचाना पूरी तरह मना होता है।
यहां तक कि मंदिर की घंटियों को भी कपड़े से बांध दिया जाता है। झालर और दूसरे वाद्य यंत्रों को भी ढंक कर रख दिया जाता है। पूरे मंदिर परिसर में शांति का माहौल बना दिया जाता है।
अगले 14 दिनों तक भगवान पूरी तरह विश्राम यानी रेस्ट मोड में रहते हैं। इस दौरान केवल मुख्य पुजारी को ही अंदर जाने की अनुमति होती है। आम जनता के लिए दर्शन पूरी तरह से बंद रहते हैं।
अस्वस्थ भगवान को कैसे ठीक किया जाता है
स्थानीय पुजारी के मुताबिक, भगवान का रोज प्रतीकात्मक स्वास्थ्य परीक्षण होता है। बीमार होने के कारण भगवान को रोज का सामान्य भोजन नहीं दिया जाता।
उनके खाने-पीने में भारी बदलाव किया जाता है। स्वस्थ करने के लिए भगवान को रोज सुबह-शाम एक खास काढ़ा पिलाया जाता है। ये काढ़ा गरम दूध, सूखे मेवे और काली मिर्च से बनता है।
माना जाता है कि इससे भगवान का स्वास्थ्य जल्दी ठीक होता है। इस दौरान श्रद्धालु मंदिर की चौखट तक तो आ सकते हैं। लेकिन वे अपने आराध्य देव के दर्शन बिल्कुल नहीं कर पाते। इसके बाद भी लोगों की श्रद्धा में कोई कमी नहीं आती है।
इस प्राचीन मंदिर का इतिहास
इतिहासकारों के मुताबिक, इस ऐतिहासिक मंदिर की स्थापना महाराज अपलाचारी स्वामी ने की थी। वह करीब ढाई सौ साल पहले सुदूर दक्षिण भारत से यात्रा करके कोटा आए थे। उस पुराने जमाने में यातायात के साधन बहुत ही कम और सीमित हुआ करते थे।
ऐसे में हाड़ौती क्षेत्र के आम लोग ओडिशा के जगन्नाथ पुरी की यात्रा नहीं कर पाते थे। स्थानीय भक्तों की इसी सुविधा के लिए रामपुरा में इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। यहां भगवान कृष्ण, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की काष्ठ मूर्तियां विराजमान हैं।
आज भी इस मंदिर में महाराज अपलाचारी के परिवार की छठी पीढ़ी पूरी निष्ठा से सेवा कर रही है। वर्तमान में एसके श्रीनिवास जी मंदिर की पूरी व्यवस्था को संभाल रहे हैं।
यह मंदिर कोटा की प्राचीन धरोहर और अटूट आस्था का एक बहुत बड़ा प्रतीक माना जाता है। फिर 14 दिन बाद भगवान के स्वस्थ होने पर यहां भव्य उत्सव मनाया जाता है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
ये खबर भी पढ़ें...
पूजा की थाली से लेकर मन की शांति तक, जानें कपूर जलाने के फायदे
चारधाम यात्रा में क्या है केदारनाथ मंदिर का महत्व, भगवान शिव से जुड़ी है मान्यताएं
गर्मी में शिवलिंग पर ठंडा जल चढ़ाने के पीछे क्या है धार्मिक मान्यता, जानें सही नियम
30 या 31 मई? कब है अधिक मास की पूर्णिमा, नोट करें स्नान-दान का शुभ मुहूर्त