खालसा पंथ की स्थापना से लेकर फसल कटाई तक, जानें किसानों के लिए क्यों खास है बैसाखी

Kaushiki | Apr 09, 2026, 14:50 IST
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बैसाखी आज 14 अप्रैल 2026 को मनाई जाएगी। यह रबी फसल की कटाई, सिख नव वर्ष और खालसा पंथ की स्थापना का पावन पर्व है। लेख में जानें इतिहास, महत्व और पूजा विधि।

Baisakhi 2026: बैसाखी भारत का एक बहुत ही पवित्र और प्रमुख त्योहार है। ये पर्व हर साल अप्रैल के महीने में खुशियों की नई सौगात लेकर आता है। किसानों के लिए ये फसल की कटाई का उत्सव है। तो सिख समुदाय के लिए ये खालसा पंथ की स्थापना का गौरवशाली दिन है।



बैसाखी आज 14 अप्रैल को मनाई जा रही है। इसी दिन सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करते हैं। इसे मेष संक्रांति भी कहा जाता है। ढोल की थाप, भांगड़ा, गिद्दा और गुरुद्वारों में गूंजती अरदास इस दिन को बेहद खास और यादगार बना देती है।



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क्यों मनाते हैं बैसाखी का पर्व

बैसाखी का इतिहास गुरु गोबिंद सिंह जी से गहराई से जुड़ा है। 13 अप्रैल 1699 को उन्होंने आनंदपुर साहिब में खालसा पंथ सजाया था। उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए पांच वीरों का चुनाव किया था।



ये पांच वीर इतिहास में पंज प्यारे के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने अमृत छकाकर समानता और वीरता का संदेश पूरी दुनिया को दिया। साल 2026 में बैसाखी 14 अप्रैल, मंगलवार को मनाई जाएगी।



हर साल ये त्योहार 13 या 14 अप्रैल को ही आता है। यह सौर कैलेंडर पर आधारित है, इसलिए तिथि लगभग स्थिर रहती है। इसी दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं जिसे मेष संक्रांति कहते हैं।



सिख धर्म की पवित्र पहचान

खालसा पंथ में दीक्षित होने पर पांच चीजें धारण करना अनिवार्य है। इन्हें पांच ककार (5 Ks) कहा जाता है जो मर्यादा का प्रतीक हैं। इसमें केश, कंघा, कड़ा, कच्छा और कृपाण शामिल किए जाते हैं। ये पांचों चीजें एक सिख की धार्मिक पहचान को मजबूत बनाती हैं। ये अनुशासन, स्वच्छता और आत्मरक्षा के मार्ग को हमेशा दिखाते हैं।



किसानों के लिए खुशियों का दिन

बैसाखी मूल रूप से खेती और फसल से जुड़ा एक बड़ा उत्सव है। इस समय रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, पूरी तरह पककर तैयार होती है। किसान अपनी मेहनत का फल देखकर ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हैं।



ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्दा इसकी रौनक बढ़ा देते हैं। लोग मिलकर अवात पौनी परंपरा से फसल की कटाई शुरू करते हैं। सुबह-सुबह लोग गुरुद्वारों में जाकर मत्था टेकते हैं।



वहां विशेष अरदास, कीर्तन और कड़ा प्रसाद का वितरण होता है। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में इस दिन लाखों की भीड़ उमड़ती है। इस दिन लोग पीले रंग के कपड़े पहनते हैं जो समृद्धि का प्रतीक है। घरों में मीठे पीले चावल, खीर, छोले-भटूरे और हलवा जैसे स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं।



जलियांवाला बाग को श्रद्धांजलि

बैसाखी का दिन हमें एक बड़े बलिदान की भी याद दिलाता है। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में निर्दोष लोग शहीद हुए थे। जनरल डायर ने वहां शांतिपूर्ण सभा पर गोलियां चलवा दी थीं। आज भी पूरा देश उन शहीदों को बैसाखी पर नमन करता है। यह दिन आजादी की लड़ाई के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ।



बैसाखी पूजा विधि

बैसाखी पर सुबह जल्दी उठकर स्नान करना बहुत शुभ है। पूजा के लिए अगरबत्ती, धूप, घी का दीया और कपूर चाहिए। ताजे फूल, नारियल और पीला कपड़ा भी पूजा में रखें। भगवान को गुड़, हलवा या कड़ा प्रसाद का भोग अवश्य लगाएं। घर में सात्विक भोजन बनाएं और परिवार के साथ मिलकर खाएं।



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