पोंगल से खिचड़ी तक, जानें भारत में मकर संक्रांति मनाने के तरीके

Kaushiki | Jan 08, 2026, 13:31 IST
makar sankranti 2026
मकर संक्रांति पर सूर्य मकर राशि में प्रवेश कर उत्तरायण होते हैं। भारत में इसे पोंगल, लोहड़ी और खिचड़ी जैसे विभिन्न नामों से उत्साहपूर्वक मनाया जाता है।

भारत में त्योहारों का अपना ही एक अलग रंग और गहरा आध्यात्मिक महत्व होता है। इन्हीं पर्वों में सबसे प्रमुख है मकर संक्रांति, जो सूर्य देव की उपासना का महापर्व है। मकर संक्रांति भारत का एक ऐसा त्योहार है जो खगोलीय घटना पर आधारित है।



सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करते ही अंधकार कम और प्रकाश बढ़ने लगता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, उत्तरायण का समय देवताओं का दिन माना जाता है। इस पावन अवसर पर पवित्र नदियों में स्नान और अन्न दान का विशेष महत्व है।



इस दिन से सूर्य उत्तरायण होकर उत्तर दिशा की ओर बढ़ते हैं। इसी के साथ धरती पर शुभ दिनों की शुरुआत और मांगलिक कार्यों का आरंभ होता है। उत्तर से दक्षिण तक, भारत के हर कोने में इसकी छटा बिल्कुल निराली होती है। आइए जानें...



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उत्तर भारत की खिचड़ी और दान की महिमा

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, उत्तर प्रदेश और बिहार में इस त्योहार को मुख्य रूप से खिचड़ी कहा जाता है। इस दिन उड़द दाल और चावल की खिचड़ी बनाकर भगवान को भोग लगाते हैं। लोग नदियों में स्नान के बाद ब्राह्मणों को तिल, गुड़ और कंबल दान करते हैं।



माना जाता है कि खिचड़ी खाने से कुंडली के नवग्रह शांत और शुभ होते हैं। प्रयागराज के माघ मेले में इस दिन लाखों श्रद्धालु पवित्र संगम में डुबकी लगाते हैं।



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दक्षिण भारत का पोंगल और किसानों का उत्साह

तमिलनाडु में यह पर्व चार दिनों तक चलने वाले पोंगल उत्सव के रूप में मनाते हैं। किसान अपनी नई फसल के आगमन पर प्रकृति और सूर्य देव का आभार जताते हैं। घर के बाहर मिट्टी के बर्तन में नए चावल और दूध का पोंगल बनाया जाता है।



धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, पोंगल का उबाल आना परिवार में समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। लोग अपने पशुओं, विशेषकर बैलों की पूजा करते हैं और उन्हें सजाते हैं।



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पंजाब की लोहड़ी

पंजाब और हरियाणा में संक्रांति से एक दिन पहले लोहड़ी का पर्व मनाते हैं। शाम को पवित्र अग्नि जलाकर उसमें तिल, रेवड़ी, मूंगफली और मक्का अर्पित करते हैं। लोग ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा कर खुशियों का इजहार करते हैं।



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गुजरात का उत्तरायण

वहीं, गुजरात में इसे उत्तरायण कहते हैं। यहां आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सूर्य की रोशनी में समय बिताने का तरीका है।



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पूर्वोत्तर का बिहू

असम में इस समय माघ बिहू या भोगली बिहू का उत्सव मनाया जाता है। यहां लोग मेजी (अग्नि कुंड) जलाकर सामूहिक भोज और पारंपारिक नृत्यों का आनंद लेते हैं।



मकर संक्रांति - Wikiwand


अन्य क्षेत्रीय नाम

कर्नाटक में इसे सुग्गी हब्बा और केरल में मकरविलक्कू के नाम से जाना जाता है। संक्रांति (मकर संक्रांति का महत्व)का ये पर्व विदेशों जैसे नेपाल, थाईलैंड और म्यांमार में भी मनाया जाता है। यह त्योहार अखंड भारत की सांस्कृतिक एकता और प्रकृति प्रेम का प्रतीक है।



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FAQ

  1. मकर संक्रांति हर साल 14 या 15 जनवरी को ही क्यों आती है?
    मकर संक्रांति का पर्व सूर्य की गति के आधार पर अंग्रेजी कैलेंडर से तय होता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के समय के मुताबिक तारीख में बदलाव होता है। अधिकतर यह 14 जनवरी को पड़ता है लेकिन खगोलीय गणना से यह 15 भी हो सकता है।
  2. इस दिन तिल और गुड़ खाने का धार्मिक और वैज्ञानिक कारण क्या है?
    धार्मिक रूप से तिल का दान और सेवन कष्टों को दूर करने वाला माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से, सर्दियों में तिल और गुड़ शरीर को जरूरी गर्मी प्रदान करते हैं। यह मेल सेहत के लिए वरदान है और रिश्तों में मिठास का संदेश देता है।
  3. मकर संक्रांति को 'खिचड़ी' के रूप में क्यों मनाया और खाया जाता है?
    उत्तर भारत में इस दिन चावल, दाल, हल्दी और नमक की खिचड़ी खाने की परंपरा है। यह व्यंजन सुपाच्य होता है और ग्रहों की शांति के लिए उत्तम माना गया है। खिचड़ी के माध्यम से नए अन्न का सम्मान और दान का संदेश दिया जाता है।

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