सावन के अंतिम मंगला गौरी पर भौम प्रदोष का महासंयोग, इस विधि से करें पूजा

Kaushiki | Aug 24, 2026, 14:04 IST
Sawan Bhaum Pradosh 2026
Sawan Bhaum Pradosh 2026
सावन मास के आखिरी मंगला गौरी व्रत पर भौम प्रदोष का अत्यंत दुर्लभ संयोग बन रहा है। 25 अगस्त को पड़ने वाले इस खास दिन पर भगवान शिव, माता पार्वती और हनुमान जी की पूजा करने से भक्तों को मनोवांछित फल और सौभाग्य की प्राप्ति होगी।

Sawan Bhaum Pradosh 2026: हिंदू धर्म में सावन के महीने का विशेष महत्व होता है। इस पूरे महीने में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना की जाती है। इस बार सावन के अंतिम मंगला गौरी व्रत पर एक बेहद दुर्लभ और शुभ संयोग बन रहा है।



इस दिन मंगला गौरी व्रत के साथ-साथ भौम प्रदोष व्रत भी पड़ रहा है। सनातन परंपरा में जब मंगलवार के दिन त्रयोदशी तिथि आती है, तो उसे भौम प्रदोष कहा जाता है।



इस खास दिन पर व्रत रखने से साधक को एक साथ शिव, शक्ति और हनुमान जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 25 अगस्त को मंगला गौरी व्रत के साथ-साथ भौम प्रदोष व्रत भी है।



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पौराणिक ग्रंथों में भौम प्रदोष का सच

स्कंद पुराण और शिव पुराण के मुताबिक, प्रदोष व्रत भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। पौराणिक कथा के मुताबिक, जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया था, तो उससे भयंकर हलाहल विष निकला था।



सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए देवताओं ने त्रयोदशी तिथि के दिन संध्या काल में शिव जी की विशेष स्तुति की थी।



शिव जी ने प्रसन्न होकर नृत्य किया था। तभी से शाम के समय प्रदोष पूजा की परंपरा चली आ रही है। मंगलवार के दिन पड़ने से हनुमान जी की कृपा भी इस व्रत से जुड़ जाती है।



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मंगला गौरी और देवी सती की कथा

देवी भागवत पुराण में मंगला गौरी व्रत का सुंदर वर्णन मिलता है। सावन के हर मंगलवार को माता पार्वती के मंगला गौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। पौराणिक मान्यता है कि माता सती ने पुनर्जन्म में भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए यह कठोर तपस्या की थी।



शास्त्रों के मुताबिक, जो भी महिला या कन्या सावन में मंगला गौरी का व्रत रखती है, उसे अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है। इस बार भौम प्रदोष के साथ मिलने से इस व्रत का फल कई गुना बढ़ गया है।



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नोट करें पूजा का मुहूर्त

हिंदू पंचांग के मुताबिक, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 25 अगस्त को सुबह 6 बजकर 21 मिनट पर शुरू होगी। यह तिथि 26 अगस्त को सुबह 8 बजे समाप्त हो जाएगी।



चूंकि प्रदोष व्रत की पूजा सूर्यास्त के समय यानी प्रदोष काल में की जाती है, इसलिए 25 अगस्त को ही व्रत रखा जाएगा। इस दिन शाम को पूजा का सबसे शुभ मुहूर्त 5 बजकर 50 मिनट से लेकर 7 बजकर 50 मिनट तक रहेगा। इस दो घंटे की अवधि में की गई पूजा बहुत फलदायी होगी।



इस विधि से करें तीनों देवों की पूजा

सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनकर व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थान पर शिव-पार्वती की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। दिन भर मन में ॐ नमः शिवाय का जाप करते रहें।



शाम को प्रदोष काल में शिवलिंग का गंगाजल, दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें। इसके बाद बेलपत्र, धतूरा और फूल अर्पित करें। माता पार्वती को लाल चुनरी और श्रृंगार का सामान चढ़ाएं। अंत में हनुमान जी के सामने चमेली के तेल का दीपक जलाकर सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें।



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