क्या है श्रीकृष्ण के रणछोड़ नाम के पीछे की असली कहानी, जानें इसके पीछे का सच
Shri Krishna Ranchhod Story: भगवान श्रीकृष्ण के अनेक पावन और सुंदर नाम हैं। भक्त उन्हें प्यार से कान्हा, गोपाल, श्याम और मुरलीधर कहते हैं। लेकिन उनका एक नाम रणछोड़ भी है। इस नाम का अर्थ है जो युद्ध का मैदान छोड़कर भाग जाए। पहली नजर में यह नाम किसी योद्धा के लिए अच्छा नहीं लगता।
कई लोग सोचते हैं कि क्या कान्हा सच में डरकर भागे थे? क्या 18वीं बार मैदान छोड़ना उनकी कायरता थी? सनातन धर्म ग्रंथों के मुताबिक, ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह कान्हा की अद्भुत बुद्धिमानी और दूरदर्शिता थी। उन्होंने मथुरा की निर्दोष प्रजा को विनाश से बचाया था। आइए जानें...
कंश वध और जरासंध का प्रतिशोध
इस पूरी कहानी की शुरुआत मथुरा में कंश के वध से होती है। मगध का राजा जरासंध कंश का श्वसुर था। उसकी दो बेटियों की शादी कंश से हुई थी। कंश की मृत्यु के बाद जरासंध बेहद क्रोधित हो गया।
उसने मथुरा और यादवों का नामोनिशान मिटाने की प्रतिज्ञा ली। उसने एक विशाल सेना एकत्र की और मथुरा पर चढ़ाई कर दी। मगध की सेना बहुत शक्तिशाली और क्रूर मानी जाती थी। लेकिन श्रीकृष्ण और बलराम के पराक्रम के सामने जरासंध की एक न चली।
17 बार मिली हार और जरासंध की जिद्द
श्रीकृष्ण ने हर बार जरासंध को युद्ध के मैदान में हराया। ये सिलसिला एक या दो बार नहीं चला। जरासंध ने लगातार 17 बार अलग-अलग सेनाओं के साथ आक्रमण किया। हर बार कान्हा ने उसकी सेना को नष्ट कर दिया।
लेकिन कान्हा ने जरासंध का वध नहीं किया। क्योंकि वे जानते थे कि जरासंध के बहाने पृथ्वी के अनेक पापी योद्धा एक जगह एकत्र हो रहे थे। कान्हा उन सभी अधर्मियों का विनाश करना चाहते थे। लेकिन 17 बार हारने के बाद भी जरासंध का अहंकार कम नहीं हुआ।
जब हुआ कालयवन का प्रवेश
धर्म ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता के मुताबिक, 18वीं बार जरासंध ने एक नई चाल चली। उसने म्लेच्छ देश के राजा कालयवन को अपने साथ मिला लिया। कालयवन को भगवान शिव से वरदान मिला था। उसे कोई भी अस्त्र-शस्त्र या योद्धा मार नहीं सकता था।
कालयवन तीन करोड़ असुरों की सेना लेकर मथुरा आ पहुंचा। एक तरफ जरासंध की विशाल सेना थी और दूसरी तरफ कालयवन था। मथुरा की आम जनता इस भयंकर युद्ध से पूरी तरह पिस रही थी। लगातार युद्धों से मथुरा का बहुत नुकसान हो रहा था।
द्वारका नगरी का निर्माण
श्रीकृष्ण ने स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझ लिया। वे जानते थे कि युद्ध में जीत तो उनकी होगी। लेकिन मथुरा की निर्दोष प्रजा बेकार में मारी जाएगी। कान्हा के लिए अपनी प्रतिष्ठा से ज्यादा प्रजा की सुरक्षा महत्वपूर्ण थी।
उन्होंने रातों-रात देवशिल्पी विश्वकर्मा की मदद से समुद्र के बीच द्वारका नगरी बसाई। उन्होंने योगबल से मथुरा के सभी निवासियों को सुरक्षित द्वारका पहुंचा दिया। इसके बाद कान्हा और बलराम अकेले ही कालयवन के सामने आए।
कालयवन का अंत
कालयवन को देखते ही श्रीकृष्ण बिना अस्त्र उठाए भागने लगे। कालयवन उनके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। कान्हा भागते-भागते एक अंधेरी गुफा में प्रवेश कर गए। उस गुफा में इक्ष्वाकु वंश के राजा मुचुकुंद विश्राम कर रहे थे।
राजा मुचुकुंद को देवताओं से वरदान मिला था। जो भी उन्हें नींद से जगाएगा, वह जलकर भस्म हो जाएगा। कान्हा ने अपना पीतांबर राजा मुचुकुंद के ऊपर डाल दिया। कालयवन ने उन्हें कृष्ण समझकर लात मार दी। राजा मुचुकुंद ने आंखें खोलीं और कालयवन भस्म हो गया।
रणछोड़ कहलाने में छिपा कान्हा का गौरव
इस तरह कान्हा ने बिना अस्त्र उठाए कालयवन का अंत कर दिया। जरासंध जब वापस मथुरा आया, तो उसे पूरा शहर खाली मिला। कान्हा के मैदान छोड़ने की वजह से लोग उन्हें रणछोड़ कहने लगे।
मथुरा की प्रजा को बार-बार के युद्ध, विनाश और हिंसा से बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने युद्ध का मैदान छोड़ने का फैसला किया। वे वहां से भागकर द्वारका चले गए और द्वारकाधीश कहलाए।
लेकिन यह कायरता नहीं, बल्कि इतिहास की सबसे बड़ी सैन्य रणनीति थी। श्रीकृष्ण ने दिखाया कि कभी-कभी पीछे हटना भी बड़ी जीत की तैयारी होता है। गुजरात में आज भी भक्त उन्हें प्यार से रणछोड़राय के रूप में श्रद्धा से पूजते हैं।
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