वट सावित्री व्रत 2026: बरगद की पूजा में न करें ये गलती, वरना अधूरी रहेगी पूजा, जानें व्रत के नियम

Kaushiki | May 13, 2026, 13:56 IST
Vat Savitri Vrat 2026
वट सावित्री व्रत 16 मई 2026 को मनाया जाएगा। सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए बरगद के पेड़ की पूजा करेंगी। इस दिन 7 बार परिक्रमा और कच्चा सूत लपेटना बहुत जरूरी है।

Vat Savitri Vrat 2026: हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है। इस साल यह व्रत 16 मई 2026 को मनाया जाएगा। सुहागिन महिलाएं इस दिन निर्जला या फलाहार रहकर उपवास रखती हैं।



यह व्रत पति-पत्नी के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, सावित्री ने इसी दिन यमराज को हरा दिया था। उन्होंने अपने पति सत्यवान को मौत के मुंह से वापस निकाला था।



तभी से महिलाएं बरगद के पेड़ की पूजा करती आ रही हैं। बरगद को देव वृक्ष माना जाता है जिसमें त्रिदेवों का वास है। आइए जानते हैं इस पूजा के सबसे जरूरी काम।



Vat Savitri Vrat 2026 Date: अखंड सौभाग्य के लिए वट सावित्री व्रत इसी माह किया जाएगा, जानें पूजा में


वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा

वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा सावित्री और सत्यवान के अटूट प्रेम और साहस की कहानी है। राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री ने सत्यवान को अपना पति चुना था। हालांकि, नारद जी ने सावित्री को पहले ही बता दिया था कि सत्यवान अल्पायु हैं। सावित्री ने हार नहीं मानी और शादी के बाद अपने पति की सेवा में जुट गईं।



जब सत्यवान की मृत्यु का दिन आया, तो यमराज उनके प्राण लेने धरती पर आए। सावित्री ने अपने पति का साथ नहीं छोड़ा और यमराज के पीछे-पीछे चल दीं। उनकी भक्ति और बुद्धिमानी देख यमराज खुश हो गए।



उन्होंने सावित्री को तीन वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने बड़ी चतुराई से अपने ससुर की आंखों की रोशनी, खोया हुआ राज्य और अंत में सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया।



यमराज ने जैसे ही 'तथास्तु' कहा, वे अपने ही वचन में फंस गए। पति के बिना सावित्री मां नहीं बन सकती थीं, इसलिए यमराज को सत्यवान के प्राण लौटाने पड़े।



सावित्री उसी वट वृक्ष (बरगद) के नीचे लौटीं जहां सत्यवान का शरीर पड़ा था। वट वृक्ष की कृपा और सावित्री के तप से सत्यवान जीवित हो गए। तभी से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए बरगद की पूजा और यह व्रत करती हैं।



Vat Savitri Vrat


वट सावित्री पर अपनाएं ये नियम

वट सावित्री (Vat Savitri Puja) व्रत अखंड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इस दिन महिलाओं को दुल्हन की तरह सजने की सलाह दी जाती है। लाल, पीली या हरी रंग की साड़ी पहनना शुभ होता है।



एक बात का विशेष ध्यान रखें कि श्रृंगार उधार न लें। सिंदूर, चूड़ी या मंगलसूत्र जैसी चीजें अपनी ही इस्तेमाल करें। दूसरों का सुहाग का सामान मांगकर पहनना वर्जित माना गया है।



मान्यता है कि शुद्ध मन और नए श्रृंगार से पूजा सफल होती है। यह नियम सुहागिनों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। अपनी खुशहाली के लिए इन छोटी बातों का ख्याल जरूर रखें।



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बरगद की परिक्रमा के नियम

वट सावित्री की पूजा में परिक्रमा का बहुत बड़ा महत्व है। महिलाएं बरगद के पेड़ के चारों ओर घूमकर पूजा करती हैं। आमतौर पर 7 बार परिक्रमा करने का नियम सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है।



यह 7 फेरे सात जन्मों के अटूट रिश्ते को दर्शाते हैं। कुछ महिलाएं अपनी श्रद्धा के अनुसार 21 या 108 परिक्रमा भी करती हैं। परिक्रमा करते समय मन में पति की लंबी आयु की कामना करें।



धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, परिक्रमा जीवन में स्थिरता लाती है। इससे वैवाहिक संबंधों में मजबूती और आपसी प्रेम बढ़ता है। यह महज एक रिवाज नहीं बल्कि सुरक्षा का घेरा है।



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कच्चा सूत लपेटने के पीछे की धार्मिक वजह

पूजा के दौरान बरगद पर कच्चा सूत लपेटना बहुत जरूरी है। कच्चा सूत प्राकृतिक रूप से शुद्ध और सादा माना जाता है। इसे त्रिदेवों से सुरक्षा कवच मांगने का तरीका माना गया है।



बरगद की जड़ में ब्रह्मा और तने में विष्णु वास करते हैं। इसकी शाखाओं को महादेव का स्वरूप माना जाता है। सूत लपेटकर महिलाएं त्रिदेवों से अपने परिवार की रक्षा मांगती हैं।



कहते हैं कि यह धागा पति पर आने वाले संकट टालता है। जितनी बार परिक्रमा करें उतनी बार धागा लपेटना शुभ होता है। इसके बिना वट सावित्री की पूजा को अधूरा माना जाता है।



बांस के पंखे का रहस्य

वट सावित्री का व्रत बिना कथा सुने पूरा नहीं होता। बरगद के नीचे बैठकर सावित्री-सत्यवान की कहानी जरूर सुनें। कथा सुनने से ही व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है।



इस दिन बांस के पंखे का भी विशेष महत्व होता है। सावित्री ने इसी पंखे से सत्यवान को हवा की थी। तब उनकी चेतना वापस आई और प्राणों की रक्षा हुई थी।



आज भी महिलाएं बांस का पंखा खरीदकर पूजा करती हैं। बाद में इस पंखे को ब्राह्मणों को दान कर दिया जाता है। यह परंपरा वैवाहिक जीवन में सुख और शांति लाती है।



स्कंद पुराण में बताया गया है व्रत का फल

शास्त्रों में इस व्रत (वट सावित्री व्रत कथा) की महिमा का विस्तार से वर्णन है। स्कंद पुराण के मुताबिक, यह व्रत सभी पापों को हरता है। इससे संतान सुख और धन-समृद्धि की प्राप्ति भी होती है।



भविष्योत्तर पुराण में भी इस व्रत को श्रेष्ठ बताया गया है। जो स्त्री विधिपूर्वक यह व्रत करती है वह सौभाग्यवती रहती है। यह व्रत घर में खुशहाली और सकारात्मक ऊर्जा भर देता है।



इस बार 16 मई को सुबह से ही अमावस्या तिथि शुरू हो जाएगी। महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। यह दिन आपकी श्रद्धा और समर्पण की परीक्षा का है।



वट सावित्री व्रत की पूजा विधि

  • ब्रह्म मुहूर्त में स्नान:
    वट सावित्री पूजा (वट सावित्री व्रत 2026) के दिन सूर्योदय से पहले उठकर घर की सफाई करें। पवित्र नदियों के जल से या शुद्ध पानी से स्नान कर नए और सुंदर वस्त्र पहनें।
  • श्रृंगार और संकल्प:
    स्नान के बाद सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करें। इसके बाद हाथ में जल और पुष्प लेकर व्रत का संकल्प लें कि आप पति की लंबी आयु के लिए यह व्रत कर रही हैं।
  • सामग्री की तैयारी:
    एक थाली में धूप, दीप, रोली, अक्षत (चावल), कलावा (कच्चा सूत), फल, मिठाई और भीगे हुए चने रख लें। साथ ही बांस का पंखा और माता सावित्री की प्रतिमा या तस्वीर भी साथ रखें।
  • वट वृक्ष की पूजा:
    बरगद के पेड़ के नीचे जाकर पहले स्थान को शुद्ध करें। वहां माता सावित्री और सत्यवान की मूर्ति स्थापित करें। अब पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें और फल-फूल चढ़ाएं।
  • कच्चा सूत और परिक्रमा:
    बरगद के तने पर रोली से तिलक लगाएं। अब हाथ में कच्चा सूत (कलावा) लेकर पेड़ की 7, 21 या 108 बार परिक्रमा करें और सूत को तने पर लपेटते जाएं।
  • बांस के पंखे की रस्म:
    पूजा के दौरान बांस के पंखे से बरगद के पेड़ और सत्यवान-सावित्री को हवा करें। यह उस समय की याद दिलाता है जब सावित्री ने सत्यवान की चेतना वापस लाने के लिए हवा की थी।
  • कथा का श्रवण:
    बरगद (Vat Savitri Vrat Katha)के पेड़ के नीचे बैठकर ही सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा पढ़ें या सुनें। कथा के अंत में आरती करें और अपने सुहाग की रक्षा के लिए त्रिदेवों से प्रार्थना करें।
  • दान और पारण:
    पूजा संपन्न होने के बाद बांस का पंखा, फल और सुहाग की सामग्री किसी ब्राह्मण को दान करें। इसके बाद भीगे हुए चने खाकर अपना व्रत खोलें और बड़ों का आशीर्वाद लें।

डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।



FAQ

  1. वट सावित्री व्रत 2026 में कब है और इसका शुभ मुहूर्त क्या है?
    वट सावित्री का व्रत 16 मई 2026, शनिवार के दिन रखा जाएगा। पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ अमावस्या तिथि 16 मई को सुबह 05:11 बजे शुरू होगी। इस तिथि का समापन 16 मई की देर रात 01:30 बजे होगा। उदया तिथि की मान्यता के कारण पूरा दिन पूजा के लिए शुभ है, लेकिन सुबह का समय श्रेष्ठ माना जाता है।
  2. वट सावित्री की पूजा में बरगद के पेड़ का ही महत्व क्यों है?
    धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बरगद के पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास होता है। साथ ही माता सावित्री ने अपने पति के प्राण इसी पेड़ के नीचे तप करके वापस पाए थे। बरगद की आयु बहुत लंबी होती है, इसलिए इसे अमरता का प्रतीक माना जाता है। इसकी पूजा करने से पति को लंबी उम्र और परिवार को मजबूती मिलती है।
  3. क्या वट सावित्री के दिन दान करना जरूरी है और क्या दान करें?
    हां, इस व्रत में दान का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा के बाद सुहाग की सामग्री और बांस का पंखा दान करना चाहिए। इसके अलावा मौसमी फल जैसे आम, खरबूजा और चने का दान शुभ होता है। दान करने से व्रत का फल कई गुना बढ़ जाता है और ब्राह्मणों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

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