IAS और IFS में क्या है फर्क? जानें किसके पास हैं ज्यादा अधिकार
संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा पास करना हिमालय चढ़ने जैसा है, लेकिन शिखर पर पहुंचने के बाद दो रास्ते अलग हो जाते हैं। जहां एक तरफ आईएएस अधिकारी देश के सिस्टम की धड़कन संभालते हैं।
वहीं आईएफएस अधिकारी सात समंदर पार तिरंगे की शान बढ़ाते हैं। इन दोनों में से कौन सा करियर आपके व्यक्तित्व के लिए सही है, यह समझना बेहद जरूरी है। चलिए आज इसे विस्तार से जानते हैं।
आईएएस और आईएफएस के कामों में अंतर
एक आईएएस अधिकारी का कार्यक्षेत्र भारत की सीमाएं हैं। उनके कंधों पर सरकारी नीतियों को जमीन पर उतारने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और जनता की समस्याओं को सीधे सुलझाने का भार होता है।
इसके उलट, एक आईएफएस अधिकारी सेंट्रल सर्विस का हिस्सा होता है और विदेशों में भारत का चेहरा बनता है। वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखते हैं, संधियों पर बातचीत करते हैं और दूसरे देशों में फंसे भारतीय नागरिकों के लिए रक्षक की भूमिका निभाते हैं।
कौन है ज्यादा पावरफुल?
अगर ताकत की बात करें तो आईएएस अधिकारियों के पास घरेलू प्रशासन में कहीं ज्यादा शक्तियां होती हैं। एक जिले का कलेक्टर पूरे जिले का सर्वेसर्वा होता है।
वहीं, आईएफएस अधिकारी की शक्ति सॉफ्ट पावर और कूटनीतिक प्रभाव में छिपी होती है। वे ग्लोबल लेवल पर भारत की विदेश नीति को दिशा देते हैं। हालांकि, देश के भीतर नीतिगत फैसलों में आईएएस का दबदबा ज्यादा महसूस होता है।
किसे मिलता है ज्यादा पैसा?
वेतन के मामले में 7वें वेतन आयोग के अनुसार दोनों की शुरुआती बेसिक सैलरी 56 हजार 100 प्रति माह होती है। डीए एचआरए और अन्य भत्तों को मिलाकर शुरुआती वेतन 85 हजार से एक लाख के बीच रहता है। लेकिन यहां आईएफएस अधिकारियों को एक खास फायदा मिलता है- स्पेशल फॉरेन अलाउंस।
विदेश में रहने के कारण उन्हें वहां के रहन-सहन के हिसाब से अतिरिक्त भत्ता मिलता है, जिससे उनकी कुल कमाई आईएएस से काफी ज्यादा हो जाती है। हालांकि करियर के शीर्ष पर कैबिनेट सेक्रेटरी का पद आईएएस के पास ही होता है, जिनकी सैलरी करीब 2 लाख 50 हजार प्रतिमाह तक जाती है।
डीएम से एंबेसडर तक का सफर
आईएएस अधिकारी का सफर SDM से शुरू होकर डीएम, कमिश्नर और अंत में सचिव Secretary तक जाता है। इनका सीधा जुड़ाव जनता और विकास कार्यों से होता है।
दूसरी तरफ, आईएफएस अधिकारी थर्ड सेक्रेटरी से शुरुआत कर एंबेसडर या हाई कमिश्नर बनते हैं। उनका जीवन अलग-अलग देशों की संस्कृतियों को समझने और वैश्विक राजनीति की बारीकियों में बीतता है।
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