Professor of Practice: UGC का बड़ा बदलाव, बिना PhD बनें प्रोफेसर, जानें कैसे
अब यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के लिए केवल किताबी ज्ञान या पीएचडी (PhD) की डिग्री ही काफी नहीं है। भारत सरकार और यूजीसी (UGC) ने एक ऐसी पहल की है। इस पहल में आपका अनुभव (Experience) ही आपकी सबसे बड़ी डिग्री मानी जाएगी। मशहूर लोक गायिका मालिनी अवस्थी (Malini Awasthi) की मेरठ विश्वविद्यालय में बतौर 'प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस' नियुक्ति ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है।
यह पहल उन एक्सपर्ट्स के लिए है, जिन्होंने अपनी फील्ड में कम से कम 15 साल काम किया है। साथ ही उन छात्रों के लिए जो व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) दे सकते हैं। आइए से समझते हैं कि प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस (Professor of Practice) क्या है और आप इस प्रोफेसर पद तक कैसे पहुंच सकते हैं।
क्या है ‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’
यूजीसी द्वारा शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य शिक्षण संस्थानों और उद्योगों (Industries) के बीच की दूरी को कम करना है। अक्सर देखा जाता है कि छात्र डिग्री तो ले लेते हैं, लेकिन जब वे नौकरी के लिए फील्ड में उतरते हैं, तो उन्हें असली कामकाज का अनुभव नहीं होता।
‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ (PoP) के तहत उन लोगों को प्रोफेसर नियुक्त किया जाता है जो अपने क्षेत्र के दिग्गज हैं। इनके लिए पीएचडी (PhD) या नेट (NET) जैसी ट्रेडीशनल परीक्षाओं की जरूरत खत्म कर दी गई है। मालिनी अवस्थी की नियुक्ति इसी कैटेगरी में हुई है, जहां वे छात्रों को लोक संगीत की बारीकियों और सांस्कृतिक विरासत के बारे में पढ़ा पाएंगी।
प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस बनने के लिए एलिजिबिलिटी
अनुभव (Experience): उम्मीदवार के पास संबंधित क्षेत्र (जैसे- मीडिया, इंजीनियरिंग, कला, कानून, बिजनेस आदि) में कम से कम 15 साल का प्रोफेशनल एक्सपीरियंस होना चाहिए।
विशेषज्ञता (Expertise): उम्मीदवार ने अपने क्षेत्र में अच्छा काम किया हो या वे उस फील्ड के एक्सपर्ट हों।
एजुकेशनल क्वालिफिकेशन: इस पद के लिए PhD या NET की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उम्मीदवार के पास ग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट की डिग्री होनी चाहिए।
क्षेत्र (Fields): आप टेक्नोलॉजी, साइंस, सोशल साइंस, मीडिया, लिटरेचर, या फाइन आर्ट्स जैसे किसी भी क्षेत्र से हो सकते हैं।
चयन प्रक्रिया और कार्यकाल
‘प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस’ की नियुक्ति सीधे यूनिवर्सिटी लेवल पर की जाती है।
चयन समिति: कुलपति (Vice-Chancellor) की अध्यक्षता में एक समिति आवेदनों की समीक्षा करती है।
कार्यकाल: यह नियुक्ति आमतौर पर एक साल के लिए होती है, जिसे परफॉर्मेंस के आधार पर 3 से 4 साल तक बढ़ाया जा सकता है।
पदों की संख्या: यूजीसी के अनुसार, किसी भी संस्थान में कुल स्वीकृत पदों का अधिकतम 10% प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के लिए हो सकता है।
प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस के फायदे
छात्रों को फायदा: उन्हें किताबों से हटकर 'रियल वर्ल्ड' की चुनौतियों का पता चलता है।
इंटर्नशिप के मौके: इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स के आने से छात्रों के लिए इंटर्नशिप और प्लेसमेंट के रास्ते आसान होते हैं।
नवाचार (Innovation): विशेषज्ञों के अनुभव से नए स्टार्टअप और आइडियाज को बढ़ावा मिलता है।
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