News Strike : निगम-मंडल अध्यक्षों के लिए लाभ का पद नहीं बनेगा आराम का पद, न मिलेगा टिकट, उल्टा करनी पड़ेगी ये मशक्कत!

Harish Divekar | May 26, 2026, 07:00 IST
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निगम-मंडलों में अध्यक्ष पद मिलते ही कई नेताओं ने इसे राजनीतिक ताकत का प्रतीक मान लिया। यह ठसक अब भारी पड़ती दिख रही है। अब बीजेपी ने ऐसा फैसला लिया है, जिसने इनकी राजनीतिक उम्मीदों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

निगम मंडल में अध्यक्ष का पद मिलने के बाद नेता जितने खुश हुए होंगे। आज की खबर उन के लिए उतनी ही बेड न्यूज साबित होगी। इन संस्थाओं का अध्यक्ष पद यानी कि मंत्री या राज्य मंत्री का दर्जा, एक बंगला, एक गाड़ी चंद अर्दली। यानी कि पॉलिटिक्स की पूरी ठसक... इसलिए तो ये पद मिलते ही कुछ नेता गाड़ियों का काफिला लेकर पद ग्रहण करने पहुंचे। अपनी पॉलिटिकल पावर दिखाने की पूरी कोशिश की, लेकिन अफसोस कि इन सारे पैंतरेबाजी से पार्टी आलाकमान, सत्ता और संगठन कोई खास खुश नहीं हुए हैं। और, ऐसा फैसला लिया है जो यकीनन इन अध्यक्षों को पसंद आने वाला नहीं है।



नमस्कार...



मप्र में चुनाव अभी दूर हैं। आमतौर पर पॉलिटिकल पार्टियां इतनी जल्दी चुनाव के लिए दम नहीं भरती हैं, लेकिन बीजेपी थोड़ी डिफरेंट है। एक प्रदेश का चुनाव जीतने के बाद बीजेपी सांस भी नहीं लेती और दूसरे चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है। अगले साल यूपी जैसे प्रदेश में चुनाव है। बीजेपी उसकी तैयारी भी कर रही है। उसके साथ साथ ही मप्र में चुनाव की तैयारी भी शुरू हो चुकी है। विधानसभा चुनाव में किसे टिकट मिलेगा, किसे नहीं इसका एक खाका बनकर तैयार हो चुका है।



इस ब्लू प्रिंट की एक कॉपी द सूत्र के हाथ भी लग चुकी है। और, मैं आपको बता रहा हूं कि इस ब्लू प्रिंट में टिकट देने की पहली गाइडलाइन क्या है। ब्लू प्रिंट से मेरा आशय यहां कागज के किसी टुकड़े से नहीं है, बल्कि एक मोटी मोटी गाइडलाइन है। जो बीजेपी ने सत्ता और संगठन के बीच शेयर कर दी है, जिसे टिकट देते समय ध्यान में रखना है। सूत्रों के हवाले से ये गाइडलाइन हमारे पास भी आ गई है। इस गाइडलाइन के मुताबिक बीजेपी इस बार निगम मंडल के अध्यक्षों को टिकट नहीं देगी।



पावर शो करने वाले माननीयों को टिकट नहीं

जी हां, वो सारे निगम-मंडल अध्यक्ष जिन्होंने पदभार के समय ही जमकर पावर शो किया। किसी ने गाड़ियों का लंबा काफिला निकाला तो किसी ने अपना स्वागत तक करवा लिया। उन सारे नेताओं के अरमानों पर पानी फेरने के लिए गाइडलाइन काफी है। बीजेपी ने सारे निगम, मंडल और आयोगों के अध्यक्षों को ये साफ कर दिया है कि उन्हें चुनाव में टिकट नहीं मिलेगा। आपको याद दिला दूं कि पार्टी ने करीब 63 निगम मंडलों, आयोगों और प्राधिकरणों में अध्यक्ष नियुक्त कर दिए हैं, जो करीब 18 विभागों से जुड़े हुए हैं। ये भी समझ लेना जरूरी है कि इन नियुक्तियों के दौरान भी बीजेपी ने चुनावी और सामाजिक समीकरणों को पूरी तरह ध्यान में रखा था। अध्यक्ष पद वैसे भी एक राजनीतिक पुनर्वास ही माना जाता है। बीजेपी ने वही किया भी है। इन 63 पदों के जरिए बीजेपी ने अपने कई नेताओं को एडजस्ट कर उनकी नाराजगी दूर करने की पूरी कोशिश की है। अब वक्त है उन्हें जिम्मेदारियां सौंपने का।



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अपने घर को भूल जाओ, दूसरा घर संभालो

पार्टी ने सभी को ये साफ कर दिया है कि पार्टी ने उन्हें मौका दे दिया है। अब उन सबको संगठन को मजबूत करने के लिए काम करना है। न कि सत्ता हासिल करने के लिए कोशिशें करनी है। इसके लिए सबसे पहला निर्देश दिया गया है कि अपने घर को भूल जाओ। घर यानी कि वो एरिया, जहां इन अध्यक्ष रूपी नेताओं की बहुत धाक है। उस ही क्षेत्र में अब अध्यक्षों को ज्यादा समय बिताने के मौका नहीं मिलेगा। इस फैसले के पीछे एक बड़ा कारण ये भी है कि जब अध्यक्ष अपने क्षेत्र से बाहर होंगे तो टिकट के दावेदार या प्रत्याशी के काम में दखल नहीं दे सकेंगे। न अपना रसूख ज्यादा दिखाकर उसके काम को प्रभावित करेंगे, बल्कि इन अध्यक्षों को ऐसे क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी जाएगी, जो उनके गृह नगर के आसपास भी न हो। क्षेत्र में गुटबाजी रोकने, खींचतान और भीतराघात जैसे फेक्टर्स को जीरो करने के लिए बीजेपी ने ये फैसला किया है।



संगठन मजबूत करने में झोंकनी होगी ताकत

अब सवाल ये है कि अपने गृह क्षेत्र और उसके आसपास के क्षेत्र में नहीं जाएंगे तो निगम-मंडल के अध्यक्ष जाएंगे कहां। इसका भी जवाब बीजेपी ने अपनी गाइडलाइन में दिया है। इन सारे निगम-मंडल के अध्यक्षों को अपनी सारी ताकत, अपनी धाक और अपना रुतबा उन सीटों पर झोंकना होगा, जहां बीजेपी का संगठन कमजोर है और जिन सीटों पर बीजेपी को हार मिली है। पार्टी का ये मानना है कि ढाई साल पहले से ही सीनियर नेताओं की निगरानी में संगठन मजबूत करने का काम शुरू होगा तो चुनाव तक स्थिति मजबूत हो जाएगी।



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पुअर परफॉर्मेंस यानी कुर्सी जाने का खतरा

विधानसभा चुनाव से पहले नगरीय निकाय चुनाव होने हैं, जिन्हें सत्ता का सेमीफाइनल कहा जाता है। इसकी भी एक खास वजह है। ये चुनाव ये जाहिर कर देते हैं कि जमीनी स्तर पर किसी भी राजनीतिक दल के हालात क्या हैं। इन्हीं चुनाव के नतीजों को बीजेपी अपनी प्रयोगशाला में टेस्ट करेगी। उसी में ये भी साफ हो जाएगा कि निगम-मंडल के अध्यक्षों को दी गई जिम्मेदारी में वो कितना खरे उतरते हैं। इसे एक टेस्ट की तरह भी देखा जा रहा है। बीजेपी ने ये साफ कर दिया है कि लाभ के पद पर बने रहने के लिए भी थोड़ी मेहनत तो करनी ही पड़ेगी। फिलहाल ये स्पष्ट नहीं है कि सत्ता के सेमीफाइनल में निगम मंडल का जो अध्यक्ष फेल हो जाएगा। उसे क्या सजा मिलेगी, पर अंदरूनी अटकलें तेज हैं और ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या पुअर परफॉर्म करने वाले अध्यक्ष को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ सकती है। संगठन मजबूत करने के लिए बीजेपी किस हद तक सख्ती दिखा सकती है, इसका जवाब भी नगरीय निकाय चुनावों के नतीजों के बाद ही मिल सकेगा।



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