News Strike: मप्र में सूखे की मार, पानी के लिए तरस रहे कितने जिले, कांग्रेस का प्रदर्शन, सरकार की क्या तैयारी?
रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून.... रहीम साहब ने कितने साल पहले ये जान लिया था कि पानी की कीमत क्या है। एक बड़े राजनेता ने भी बहुत साल पहले ये भविष्यवाणी कर दी थी कि आने वाली सदी में पानी के लिए लड़ाइयां होंगी। ये राजनेता कोई और नहीं दिग्विजय सिंह थे, जिन्होंने साल 2000 के आसपास ही ये भांप लिया था कि आने वाला दौर पानी को लेकर कितनी मुश्किलों से भरा हो सकता है। और, देखिए अब जो हालात हैं वो ये साफ इशारा कर रहे हैं कि पानी की किल्लत दिन पर दिन बढ़ती जा रही हैं। और सियासतदानों का भाषण पानी के इर्द गिर्द सिमटे हुए हैं। एक रिपोर्ट ये दावा भी करती है कि अब 42 फीसदी मप्र पानी की किल्लत से जूझ रहा है। इसका मतलब समझते हैं आप कि स्थिति कितनी गंभीर है।
नमस्कार...
ये तस्वीरें मप्र में पानी की किल्लत की गंभीरता दिखाती हैं। कुछ साल पहले तक ऐसी तस्वीरें नजर आती थीं और लोग समझ जाते थे कि मप्र के बुंदेलखंड का इलाका तपने लगा है.... सूखने लगा है। अब यही हालात कमोबेश प्रदेश के हर अंचल के हैं। बाकी अंचलों की तो बात ही छोड़ दीजिए मालवा तक पानी की मार झेलने पर मजबूर हो गया है। मालवा की माटी की बातें तो आपने खूब सुनी होंगी। ये वो इलाका है जहां पानी इतना भरपूर रहा है कि कभी पानी का संकट नहीं हुआ। लहराती हुई फसलें ही नजर आईं और शब ए मालवा के नाम से रातें मशहूर हुईं। जो इतनी ठंडी हुआ करती थीं कि कभी एसी कूलर की जरूरत ही नहीं पड़ी। पर क्या अब गर्मी में झुलस रहा मालवा ऐसी ही तासीर रखता है। ठंडक की बात तो दूर रही अब तो यहां पानी की किल्लत तेजी से बढ़ने लगी है। और, अभी अभी आपने जो तस्वीर देखी, पानी की खातिर पहाड़ों को नापने की, वो बुंदेलखंड की नहीं मालवा की है।
मुख्यमंत्री का दावा कितना सही
मप्र में जल गंगा संरक्षण अभियान के तहत जलापूर्ति के तमाम तरीके अपनाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री खुद ये दावा कर रहे हैं कि प्रदेश जल संरक्षण में बहुत बेहतर काम कर रहा है।
लेकिन हकीकत ये है कि जल संरक्षण की कोई कोशिश बहुत कामयाब नहीं नजर आ रही है। एक मीडिया रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि प्रदेश के करीब 42 फीसदी शहर ऐसे हैं, जहां रोज पानी मिल पाना मुश्किल हो रहा है। 413 में से 162 नगरीय निकाय ऐसे हैं, जहां रोज पानी सप्लाई नहीं हो रहा है। कुछ निकाय तो ऐसे भी हैं, जहां दो-दो दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है। ऐसे शहरों में जबलपुर जैसा बड़ा शहर भी शामिल है। रिपोर्ट्स कहती हैं कि नर्मदा के दामन में बसे इस शहर के कुछ निकाय में तीन दिन में एक बार ही पानी की सप्लाई हो रही है।
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मालवा प्यासा, राजधानी भी तरस रही पानी को
बात इंदौर की करते हैं, जिसके नाम से मालवा को अलग पहचान मिली है। इंदौर के बड़े हिस्से को रोज पानी मिल पाना मुश्किल हो रहा है। करीब 76 फीसदी शहर में रोज पानी नहीं दिया जा रहा है। उज्जैन का भी यही हाल है। एक रिपोर्ट में ये दावा किया गया है कि इंदौर में नगर निगम के करीब 6500 सरकारी बोरवेल्स में से 32 सौ से ज्यादा सूख चुके हैं। नर्मदा की पाइपलाइन होने के बाद भी कई इलाकों में बहुत कम प्रेशर से पानी आ दिया जा रहा है। भूजल स्तर इतना नीचे जा चुका है कि बोरवेल्स लगातार सूख रहे हैं। महाकाल की नगरी और सीएम के गृह नगर में 64 फीसदी शहर पानी के संकट से जूझ रहा है।
राजधानी के हालात भी बहुत अच्छे मत समझिए। भोपाल संभाग के बड़े हिस्से में रोज पानी नहीं दिया जा रहा है। मंडीदीप में पानी दो दिन में एक बार दिया जा रहा है। कोलार रोड, बैरागढ़, अयोध्या बायपास, सेमरा, सुभाष नगर जैसे कई इलाके हैं, जहां पानी मुश्किल से मिल रहा है। टैंकर बुलवाना लोगों की मजबूरी बन चुका है।
सूखी नदी में झिरी खोदने की मजबूरी
ग्वालियर के तिघरा डैम का जलस्तर भी तेजी से घट चुका है। पानी का स्टॉक बचाए रखने के लिए यहां भी एक दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है। शहडोल की भी कुछ तस्वीरें वायरल हैं। यहां पानी लेने के लिए गांव के लोग दो किमी लंबा सफर तय करते हैं। खाई उतरते हैं, तब कहीं जाकर उन्हें पानी मिल पाता है। सीहोर में भी यही हालात हैं, यहां महिलाएं सूखी नदी में झिरी खोदती हैं, पानी रिसना शुरू कर करता है। उसके बाद घड़ा भर पाता है। यहां पीएचई विभाग को करीब 345 शिकायतें मिल चुकी हैं।
रायसेन में भी हाल बेहाल हैं। यहां के कोकलपुर गांव की शिकायत है कि दबंगों ने सरकारी कुएं में मोटर पंप डाल दिया है, जिससे पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है।
पांच किमी दूर से ला रहे पानी
मंदसौर के कुछ गांवों की शिकायत है कि कीड़े और बदबू वाला पानी मिल रहा है। बैतूल के गांव हरिमऊ के लोग पांच किमी दूर जाकर पानी ला रहे हैं, वो भी गंदा और बदबूदार। बड़वानी के आदिवासी गांवों में भी गंदा पानी पहुंच रहा है।
ये सारी रिपोर्ट्स बताती हैं कि मप्र में जल संकट कितना गहरा चुका है, जिस पर प्रदर्शन भी हो रहे हैं। कांग्रेस ने जल संकट को बड़ा मुद्दा बनाना शुरू कर दिया है। इंदौर में बड़ी तादाद में कांग्रेसी जमा हुए और प्रदर्शन किया। कांग्रेस ने खाली मटका लेकर प्रदर्शन किया। बीजेपी और महापौर के खिलाफ नारेबाजी भी की। कांग्रेस अध्यक्ष ने नाराजगी जताने में भी कमी नहीं की।
कांग्रेस का प्रदर्शन कितना कारगर
पानी को लेकर हालात गंभीर है इसमें कोई दो राय नहीं है। एक तरफ सरकार है, जो जल गंगा संवर्धन के जरिए जल संकट दूर करने का दावा कर ही रही है। जल संरक्षण पर भी बात हो ही रही है। दूसरी तरफ कांग्रेस है, जो अब जल संकट को मुद्दा बनाना शुरू कर चुकी है। जाहिर है ये विरोध इंदौर से निकलकर दूसरे जिलों तक भी जा सकता है, लेकिन इससे निपटने का तरीका क्या है। इस साल ठोस हल नहीं निकला तो आने वाला साल और बेहाल कर सकता है। पेड़ लगातार कट रहे हैं। ये एक अलग मुद्दा है। इस पर भी अलग से चर्चा जरूरी है। फिलहाल क्या ये संभव है कि अगले साल पानी की किल्लत न हो, उसके लिए आज से ही कोई ठोस कदम उठाए जा सकेंगे।