News Strike: सीजेपी प्रोटेस्ट का कितना असर? ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर क्या फिर दबाव में आएगी सरकार
जेन जी के दबाव में फिर झुकेगी सरकार?
दिल्ली यूनिवर्सिटी चुनाव के नतीजों के बाद सीजेपी के पहले प्रोटेस्ट के असर को खारिज कर दिया गया था। तो आज के उसके प्रदर्शन को किस नजर से देखा जा सकता है। ये प्रोटेस्ट इंपेक्टफुल रहा। क्या सरकार जेन जी के आगे फिर झुकेगी या फिर सीजेपी के हौसले जल्द हवा होंगे। चलिए आज इसी पर कुछ बात करते हैं।
आज दो अक्टूबर का दिन है। ये दिन हमेशा गांधी जयंती के रूप में याद रखा जाता रहा है। दृश्यम की रिलीज के बाद इसे विजय सालगांवकार और पणजी के सत्संग से जोड़ने लगे। अब से गांधी जयंती सीजेपी के प्रोटेस्ट के लिए भी याद की जाती रहेगी। एक भारीभरकम प्रोटेस्ट के बाद सीजेपी केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने में कामयाब रही।
जंतर-मंतर पर CJP प्रदर्शन पर सबकी नजर
पहला आंदोलन यकीनन सफल रहा। इसलिए इस बार भी सीजेपी के प्रोटेस्ट पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। जाहिर है इस बार सरकार भी सीजेपी के आंदोलन को हल्के में नहीं ले रही है और उन्हें रोकने की पूरी तैयारी की गई है।
जंतर-मंतरकी तरफ जाने वाले रास्तों पर पुलिस तैनात रही। कई जगह बैरिकेडिंग की गई। कुछ मेट्रो स्टेशन भी बंद किए गए कि बड़ी संख्या में जेन जी एकजुट न हो सकें। इस प्रदर्शन में सीईओ ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग उठ रही है।
कम भीड़ फिर भी देशभर में गूंजा प्रदर्शन
जब सिस्टम एक्टिव है तो ये तो अंदाजा लगाया ही जा सकता है कि इस बार भीड़ पहले की तरह नहीं जुट सकी होगी। इसलिए भीड़ के लिहाज से माने तो ये प्रदर्शन पहले के मुकाबले हल्का नजर आ सकता है। पर सारी तैयारियों के बावजूद प्रदर्शन की गूंज दिल्ली से लेकर मुंबई तक सुनाई दी।
सीजेपी प्रवक्ता सौरभ दास को हिरासत में लिया फिर छोड़ दिया गया। इसके बाद वो बकायदा हीरो की तरह विनिंग स्माइल के साथ बात करते नजर आए। जब तक हम इस स्क्रिप्ट की तैयारी कर रहे थे तब तक दिल्ली के जंतर मंतर और कनॉट प्लेस, मुंबई और दिल्ली के मेट्रो स्टेशन के बाहर प्रदर्शन की खबर आ चुकी थी।
इन सभी जगहों तक प्रदर्शनकारी न पहुंच सके इसके लिए पुख्ता बेरिकेटिंग हुई। प्रोटेस्ट करने वालों ने ये आरोप लगाए कि जनता की आवाज को रोकने की कोशिश की जा रही है।
CEC के इस्तीफे समेत कई मांगें उठीं
सीजेपी की मुख्य मांगें हैं-
- मुख्य चुनाव आयुक्त का 48 घंटे में इस्तीफा।
- आने वाले सभी चुनावों को फिलहाल रोक दिया जाए।
- जनवरी 2025 की वोटर लिस्ट को वापस लिया जाए।
- एसआईआर की प्रक्रिया बंद करें और जांच की कमेटी बनाई जाए।
- एक मांग मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति से जुड़े कानून में बदलाव की भी है।
प्रदर्शन में प्रोफेशनल युवाओं की बड़ी भागीदारी
एक बात और गौर करने वाली है कि सीजेपी के प्रदर्शन में पढ़े लिखे तबकों का युवा पूरी शिद्दत के साथ शामिल हो रहा है। आमतौर पर जो प्रोफेशनल्स ऐसे प्रदर्शन से दूर रहना मुनासिब समझते हैं वो सभी इस प्रदर्शन में नजर आए।
मसलन डॉक्टर्स ने इस प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया। युवतियां बड़ी संख्या में शामिल होने पहुंची। कुछ लोग अपने बच्चों के साथ प्रदर्शन का हिस्सा बने। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस प्रदर्शन में लोगों को रुझान कम नहीं हुआ है।
भीड़ जुटी पर क्या वोट में बदलेगा समर्थन?
जिस उत्साह से लोग प्रदर्शन का हिस्सा बने उसे देखकर यही लगा कि सीजेपी के प्रोटेस्ट से लोगों की उम्मीद तो जुड़ ही गई है। पर हम हर बार एक बात जरूर कहते हैं। सोशल मीडिया पर धड़ाधड़ हिट्स बटोर लेना और सभाओं में भारी भीड़ जमाकर लेना इस बात की गारंटी नहीं होता कि वो भीड़ वोट या वोटर्स में तब्दील होगी। यही बात सीजेपी के प्रदर्शन पर भी लागू होती है।
जेन जी की नाराजगी का वोट पर कितना असर?
सीजेपी के पिछले प्रदर्शन को लेकर जबरदस्त हो हल्ला हुआ। ये माना गया कि जेन जी सरकार से बेहद नाराज है। सरकार यानी कि बीजेपी से नाराज है। इस नाराजगी को कम करने के लिए खुद पीएम नरेंद्र मोदी जेन जी को रिझाने में जुटे। इंस्टाग्राम पर एक्टिव हुए। पार्टी नेताओं को भी एक्टिव होने का निर्देश दिया।
इसके बाद तो वो जेन जी के साथ भजन क्लबिंग और चर्चाओं में भी नजर आए। मैसेज तो क्लीयर है जेन जी की ये यूनिटी सरकार पर असर डाल रही है। पर वोटर्स पर कितना असर डाल रही है।
यूपी चुनाव बनेगा CJP का बड़ा लिटमस टेस्ट
फिलहाल तो इस इंपेक्ट को समझने के लिए किसी विधानसभा चुनाव के नतीजों का इंतजार करना होगा। यूपी का विधानसभा चुनाव सीजेपी की ताकत को समझने का सबसे बड़ा लिटमस टेस्ट हो सकता है, लेकिन ये भी तो एक प्रोसेस ही है कि किसी भी बड़े सिस्टम को तैयार करने से पहले उसका पायलट प्रोजेक्ट लॉन्च होता है जो एक बड़े सिस्टम का छोटा मॉडल कहा जा सकता है।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में दिखी ABVP की बढ़त
तो चलिए हम दिल्ली यूनिवर्सिटी को सीजेपी के इंपेक्ट का पायलट प्रोजेक्ट मान लेते हैं। आप सभी को पता होगा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में कुछ दिन पहले स्टूडेंट इलेक्शन हुए। जिसकी चार में से तीन सीट पर एबीवीपी जीती।
एबीवीपी यानी कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद। ये परिषद बीजेपी की ही स्टूडेंट विंग है। यानी कि बीजेपी की राजनीति में इंटरेस्ट रखने वाले छात्र नेता एबीवीपी के जरिए ही पॉलिटिक्स में एंट्री लेते हैं।
जमीनी जुड़ाव से मिला Gen Z का साथ: ABVP
हम ये नहीं कहते कि इस जीत को पूरे जेन जी की सोच या विचारधारा माना जा सकता है, लेकिन कैंपस में बीजेपी के काम करने के तरीके को दरकिनार नहीं किया जा सकता। छात्र संघ चुनाव में जीत के बाद एबीवीपी के राष्ट्रीय महासचिव वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने पीटीआई से कहा कि जेन जी उनके साथ है। इसके उन्होंने दो कारण भी दिए।
उनका पहला कारण था कि एबीवीपी के कार्यकर्ता जमीनी रूप से स्टूडेंट्स से जुड़े रहते हैं। लगातार जीत के लिए मेहनत करते हैं और दूसरा कारण था कि स्टूडेंट की सभी परेशानियों पर वो सक्रियता से काम करते हैं और उन्हें दूर करने की पूरी कोशिश करते हैं।
Gen Z में CJP बनाम ABVP नेटवर्क की परीक्षा
इसके क्या मायने हैं। जिस-जिस यूनिवर्सिटी में छात्र संघ चुनाव होते हैं उन सभी जगह पर एबीवीपी का नेटवर्क भी उतना ही स्ट्रॉन्ग है जितना मजबूत बीजेपी के कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है। तो क्या सभी जगह एबीवीपी बीजेपी का ही गुणगान नहीं करती होगी। क्या स्टूडेंट्स की सोच ये नहीं हो सकती कि जब एबीवीपी इतनी एक्टिव है तो बीजेपी कितनी एक्टिव होगी।
यानि जेन जी के यूनिवर्स में दो अलग-अलग सिस्टम एक्टिव हैं एक सीजेपी का प्रोटेस्ट वाला और एक एबीवीपी का सघन नेटवर्क। दोनों में से असरदार कौन है ये तो हम विधानसभा चुनाव के नतीजों से ही समझ सकेंगे। फिलहाल डूसू के नतीजे देखकर यही कह सकते हैं कि जमीनी नेटवर्क में बीजेपी आसानी से बाजी मार सकती है।
SIR विवाद पर बीजेपी की खामोशी क्यों?
दूसरी बात ये है कि बीजेपी ऐसे हर मसले की काट ढूंढने में भी एक्सपर्ट है। ऐसा कहा ही जाता है कि मुद्दा बनाना हो या उसकी हवा निकालनी हो। दोनों में बीजेपी माहिर है, लेकिन एसआईआर के मसले पर इतना बवाल हो चुका है।
अब तक बीजेपी खामोश है। इसकी क्या वजह है। क्या बीजेपी सही मौके या सही मुद्दे की तलाश में है। इसलिए चुप बैठी है। क्योंकि यूपी चुनाव सिर पर है। ये सारे बवाल हावी हुए तो एक बड़े प्रदेश में बीजेपी को नुकसान उठना होगा।
जेन जी के दबाव पर अब क्या करेगी बीजेपी?
ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार बीजेपी कॉकरोच के दबाव में आकर ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लेगी। शुरूआत तो डिक्लेरेशन फॉर्म की वापसी से हो चुकी है। अब देखना ये है कि कौन किस पर भारी पड़ता है। क्या जेन जी की आवाज जीतती है या फिर पॉलिटिकल एजेंडे से उनकी सोच बदली जा सकती है।