सिंहासन छत्तीसी : मंत्रीजी के पीए को पसंद गोवा, रामकथा में अफसरों को देना पड़ा 11 लाख का चढ़ावा

Arun Tiwari | May 31, 2026, 11:55 IST
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छत्तीसगढ़ में कमीशनखोरी से मंत्री के पीए की गोवा यात्रा, रामकथा में अफसरों से वसूली और केंद्रीय मंत्री के गुपचुप दौरे की चर्चाएं गर्म हैं। आज के सिंहासन छत्तीसी में पढ़िए इन घटनाओं के बारे में विस्तार से

RAIPUR : छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों कुछ किस्से बहुत चर्चा में हैं। एक मंत्रीजी हैं जिनके पीए को गोवा का चस्का लग गया है। कमीशन की खूब खेती हो रही है और पैदावार भी बहुत है। जब फसल कटती है तो पीए साहब सीधे गोवा पहुंच जाते हैं। उनको गोवा का बीच और वहां पर लेटकर समुंदर की लहरें देखना बहुत पसंद आ रहा है। कभी कभी कैसीनो में दांव भी लगा लेते हैं।



अब अपने अपने शौक हैं। वहीं एक मंत्रीजी की रामकथा की भी बहुत चर्चा है। रामकथा में अफसरों से 11-11 लाख का चढ़ावा मांगा गया। अफसरों ने ठेकेदारों से चढ़ावा मांग लिया। सबने मिलजुल कर राम राम जप लिया। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।



पीए को गोवा बीच की लहरें :

The PA and the Waves of Goa


मंत्रीजी के पीए साहब इन दिनों विभागीय गलियारों में खासे चर्चित हैं। वजह उनकी प्रशासनिक दक्षता नहीं, बल्कि कमीशन प्रबंधन की अद्भुत कला है। कहते हैं कि साहब को सरकारी फाइलों से ज्यादा फायदे की फसल उगाने का हुनर आता है। कौन सी फाइल में कितना पानी देना है, किस ठेके में कितनी खाद डालनी है और किस भुगतान से कितना उत्पादन निकलेगा इस कृषि विज्ञान में उनका कोई सानी नहीं। साहब की खेती भी बड़ी आधुनिक है।



खेत सरकारी, मेहनत दूसरों की और फसल सीधे निजी खाते की। जैसे-जैसे विभाग में योजनाओं की बारिश होती है, वैसे-वैसे कमीशन की फसल लहलहाने लगती है। टेबल के ऊपर नियम-कायदे चलते हैं और नीचे उपज का हिसाब-किताब। हर दो-तीन महीने में जब फसल पूरी तरह पक जाती है, तब साहब अपने हिस्से की कटाई करते हैं। फिर अचानक विभागीय मोबाइल की घंटियां कम बजने लगती हैं और एयरपोर्ट पर उनकी गतिविधियां बढ़ जाती हैं। गंतव्य लगभग तय रहता है गोवा।



गोवा पहुंचते ही साहब सरकारी तनाव उतारकर सीधे समुद्र की लहरों के हवाले हो जाते हैं। दिन में बीच, रात में रोशनी और फिर केसिनो के जहाज पर किस्मत आजमाने का दौर। वहां नोट ऐसे उड़ते हैं मानो किसी किसान ने धान नहीं, सीधे करेंसी की बुआई कर दी हो। फर्क बस इतना है कि आम किसान मौसम देखकर डरता है, लेकिन साहब की फसल पर न सूखे का असर पड़ता है, न बाढ़ का।



राम राम जपना,पराया माल अपना :

Claiming Others Wealth


प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक दिलचस्प कथा चर्चा में है। कथा धार्मिक थी, माहौल भक्तिमय था, भजन-कीर्तन और प्रवचन से वातावरण गूंज रहा था, लेकिन कथा समाप्त होते-होते लोगों की जुबान पर भगवान कम और भुगतान ज्यादा चढ़ गया। वजह यह कि इस धार्मिक आयोजन के पीछे श्रद्धा से ज्यादा संग्रह की कहानी सुनाई देने लगी। कहते हैं कि मंत्री जी ने अपने इलाके में भव्य कथा कराई। आयोजन ऐसा कि मानो धर्म और सत्ता दोनों का संगम हो गया हो।



लेकिन आयोजन खत्म होने के बाद जो फुसफुसाहट बाहर आई, उसने भक्ति के इस मंच को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। चर्चा यह है कि मंत्री जी के विभाग की हर जिला इकाई को मोटा चढ़ावा देने का संदेश पहुंचा था। रकम भी कोई छोटी-मोटी नहीं, पूरे 11-11 लाख रुपए। अब सरकारी विभागों में बैठे अफसर ऐसे तो होते नहीं कि जेब से लाखों निकालकर कथा में अर्पित कर दें। यह सिलसिला चला अफसरों से कारोबारियों तक और कारोबारियों से ठेकेदारों तक।



आखिर सरकारी कृपा और धार्मिक पुण्य दोनों का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी जो ठहरा। मामला यहीं नहीं रुका। विभाग की निर्माण इकाई के इंजीनियरों तक संदेश पहुंचा कि भगवान के नाम पर दान नहीं करोगे तो “पाप” लगेगा। अब सरकारी व्यवस्था में पाप से बड़ा डर और क्या हो सकता है! इंजीनियरों ने भी अपनी आत्मा का बोझ हल्का करने के लिए ठेकेदारों पर आर्थिक तपस्या डाल दी। धर्म का प्रवाह आखिर ऊपर से नीचे ही आता है।



चर्चा में केंद्रीय मंत्री का दौरा :

Union Minister Visit Sparks Discussion


हाल ही में छत्तीसगढ़ आए केंद्रीय मंत्री का यह दौरा बहुत चर्चा में है। मंत्रीजी आए तो थे विभागीय समीक्षा करने लेकिन यह चर्चा ड्राइंग रुम तक सिमट कर रह गई। कहने वाले तो यही कह रहे हैं। मंत्रीजी का बिलासपुर जाना और एक कोयला व्यापारी के घर चाय की चुस्कियां लेना बाहर आ गया।



विभाग के लोगों में ही यह खुसुर फुसुर होने लगी कि क्या कोयला नीति यहीं बनने जा रही है। बहरहाल राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा चल रही है कि यह गुपचुप बैठक सरकार की आय बढ़ाने के लिए हुई या किसी की और की किस्मत चमकाने के लिए। खैर यह सब तो बातें हैं बातों का क्या।




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