सिंहासन छत्तीसी : दरी बिछाने वालों को भूली बीजेपी, चार नेताओं पर भारी एक अधिकारी

Arun Tiwari | Jun 14, 2026, 12:51 IST
सिंहासन छत्तीसी
छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार को ढाई साल बीत चुके हैं, लेकिन राजनीतिक नियुक्तियों की रफ्तार अभी भी धीमी है। निगम, मंडल और आयोगों में 300 से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। इससे पार्टी के भीतर ही नाराजगी बढ़ रही है। मेहनत करने वालों को नजरअंदाज किया जा रहा है।

Raipur : छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार बने हुए आधा समय यानी ढाई साल बीत गए हैं। आखिरी के चुनावी साल को हटा दें तो सरकार के पास कुल जमा डेढ़ साल का वक्त है। प्रदेश में अभी भी निगम,मंडल,आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियों के 300 से ज्यादा पद खाली हैं।



लेकिन बीजेपी इन पर नियुक्तियां नहीं कर रही। बीजेपी के अंदरखाने के लोग ही अपनी सरकार और संगठन से नाराज हैं। वे तो यहां तक कहते हैं कि जिन्होंने चुनाव में काम किया उनको छोड़कर चाकरी करने वालों को मलाईदार निगम मंडलों में बैठा दिया गया और उनको भुला दिया गया।



बीजेपी ने लाल बत्ती का अचार डाल दिया है। वहीं एक अधिकारी ऐसी हैं जो चार नेताओं पर भारी हैं। चार नेताओं के कहने के बाद भी मेडम हटने का नाम नहीं ले रहीं। छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों की ऐसी ही अनसुनी खबरों के लिए पढ़िए द सूत्र का साप्ताहिक कॉलम सिंहासन छत्तीसी।



चापलूसों को कुर्सी, हमें मिली दरी

लगता है बीजेपी ने लाल बत्ती का अचार डाल दिया है। इसीलिए तो निगम मंडल आयोगों में 300 से ज्यादा पद खाली हैं लेकिन उन पर राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हो रहीं। हालांकि लालबत्ती की परंपरा खत्म हो गई है लेकिन रसूखदार पदों पर ये शब्द इस्तेमाल करने से लोगों को असानी से और जल्दी समझ में आता है, इसलिए हम इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं।



लालबत्ती की चाह में ऐसे कई नेता हैं जिन्होंने चुनाव के समय बहुत काम किया है और खुलकर कांग्रेस सरकार को खरी खरी सुनाई है। ये नेता कहते हैं कि सरकार बनी थी तो उम्मीद जागी थी कि अब काम का ईनाम मिलेगा। लेकिन सत्ता और संगठन ने चुन चुन कर चापलूसों को बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठा दिया।



हम अभी भी झूठी आस लगाए बैठे हैं लेकिन सरकार और संगठन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही। वे कहते हैं कि समय निकल रहा है और कुर्सियां खाली हैं तो फिर उन पर नियुक्ति क्यों नहीं दी जा रही। लगता है सरकार ने लाल बत्ती का अचार डाल दिया है। दरी बिछाने वाले दरी ही बिछा रहे हैं और चाटुकार मलाई खा रहे हैं।



चार नेताओं पर भारी,एक अधिकारी

प्रदेश का सहकारिता विभाग में दो ही काम होते हैं विवाद और भ्रष्टाचार। सहकारिता संस्थान की एक मेडम बीजेपी के चार अहम नेताओं पर भारी पड़ रही हैं। चार नेता इनको हटाने की कह चुके हैं लेकिन मेडम अंगद की तरह पैर जमाए हुए हैं। जिन चार नेताओं ने इनके खिलाफ मोर्चा खोला है उनमें एक सांसद, दो विधायक और एक मंत्री शामिल हैं।



ये सब मिलकर भी मेडम का बाल बांका नहीं कर पा रह हैं। मेडम पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और उनकी कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है। यहां तक कि संस्थान के अध्यक्ष भी मुख्य अधिकारी मेडम से परेशान हो चुके हैं। अब इनको कौन बचा रहा है यह तो वे ही जानें लेकिन इतना तय है कि इनके पीछे सरकारी सिस्टम में बैठे बड़े लोग ही हैं।



मंत्री से बड़े ओएसडी

छत्तीसगढ़ में लगता है ओएसडी साहब मंत्रीजी से बड़े हो गए हैं। मंत्री ने कुछ कहा तो उसको पूरा करने की जिम्मेदारी ओएसडी की ही होती है। सरकार के एक तेज तर्रार मंत्री के ओएसडी भी कुछ इसी तरह का काम कर रहे हैं। हैरानी तो इस बात की है कि मंत्री के चतुर होने के बाद भी चर्चा ओएसडी की ही रही है।



मंत्रीजी कुछ बोलते हैं तो ओएसडी साहब नोट कर लेते हैं लेकिन वो नोट किया हुआ कभी पूरा नहीं होता। आमतौर पर मंत्री कोई निर्देश दें तो पीए या ओएसडी उसे नोट करते हैं, फाइल आगे बढ़ाते हैं और समय आने पर याद भी दिलाते हैं। लेकिन यहां सिस्टम थोड़ा एडवांस है। यहां नोट करने के बाद उसे ऐसी जगह रख दिया जाता है कि फिर भगवान भी खोजने निकलें तो शायद जीपीएस मांग लें।



कागज फाइल नहीं बनते, सीधे पोंगली बन जाते हैं। यह सब तब सामने आया जब एक अधिकारी हो हटाया गया। एक जनप्रतिनिधि ने कहा कि इस संबंध में तो वे महीनों पहले मंत्रीजी को आवेदन दे चुके हैं लेकिन उस आवेदन पर कोई काम नहीं हुआ। जब मंत्री जी से चर्चा हुई तो उनके चेहरे पर भी हैरानी थी। उन्हें तो पता ही नहीं था कि ऐसा कोई शिकायती पत्र कभी आया भी था। यानी शिकायत सीधे न्याय की मेज तक नहीं, रद्दी की टोकरी में जा चुकी थी।



अब सोचिए, मंत्री अगर शिकायत देखेंगे ही नहीं तो कार्रवाई करेंगे कैसे? आखिर वे मंत्री हैं, कोई त्रिकालदर्शी महात्मा नहीं कि बंद अलमारी में रखे कागजों का भी दिव्य ज्ञान हो जाए। अच्छी बात सिर्फ इतनी रही कि देर से सही, मामला आखिरकार उनके संज्ञान में आया और कार्रवाई हो गई। वैसे ओएसडी का काम मंत्री का बोझ कम करना होता है। लेकिन यहां तस्वीर कुछ उलटी नजर आती है। मंत्री जी आग बुझाने में लगे हैं और ओएसडी साहब शायद माचिस की तीलियां गिनने में व्यस्त हैं।



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