अफसरों ने लौटाया 8 करोड़ का बजट, छत्तीसगढ़ की आंगनबाड़ियों में दवाएं बंद

Aishwarya Dwivedi | May 28, 2026, 09:23 IST
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छत्तीसगढ़ में अफसरों की लापरवाही के कारण 51 हजार आंगनबाड़ियों में फर्स्ट एड किट की सप्लाई बंद है, जिससे केंद्र से मिलने वाला 8 करोड़ का बजट लैप्स हो रहा है।

NEWS IN SHORT

  • छत्तीसगढ़ की 51 हजार आंगनबाड़ियों में फर्स्ट एड किट गायब।
  • अफसरों की लापरवाही से 8 करोड़ का बजट वापस लौटा।
  • कागजी कार्रवाई और टेंडर के 'झंझट' से बच रहे अफसर।
  • प्राथमिक उपचार न मिलने से 20 लाख बच्चे परेशान हैं।
  • कार्यकर्ता मजबूरी में दूसरों से मांग रहीं दवा और पट्टी।

NEWS IN DETAIL

छत्तीसगढ़ के महिला एवं बाल विकास विभाग में अधिकारियों की बड़ी लापरवाही सामने आई है। राज्य के 51 हजार से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों में आने वाले लगभग 20 लाख मासूम बच्चों की बुनियादी स्वास्थ्य सुरक्षा को अफसरों ने 'झंझट' समझकर ठंडे बस्ते में डाल दिया है। केंद्र सरकार द्वारा हर साल 'मेडिसिन किट' (फर्स्ट एड) के लिए मिलने वाला साढ़े सात से आठ करोड़ रुपए का बजट अधिकारियों की उदासीनता के कारण बिना उपयोग किए वापस लौट रहा है।



खेल-कूद में चोट और बीमारी का खतरा

केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुसार, 3 से 6 साल के बच्चों के लिए प्री-प्राइमरी शिक्षा और खेलकूद के दौरान हल्की-फुल्की चोट लगना, बुखार आना या डिहाइड्रेशन होना बेहद आम बात है। इसी आपात स्थिति से तुरंत निपटने के लिए केंद्र सरकार प्रति किट 1500 रुपए निर्धारित कर सालाना बजट देती है। इस किट में बच्चों के लिए बेहद जरूरी दवाएं और सामग्री शामिल हैं:



  • पैरासिटामोल सिरप और सिप्रोफ्लॉक्सासिन ड्रॉप्स
  • ओआरएस (ORS) पैकेट
  • पोविडोन आयोडीन सॉल्यूशन और रोलर बैंडेज

इसके बावजूद, प्रदेश की आंगनबाड़ियों में यह बुनियादी दवाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। पड़ताल में सामने आया है कि विभाग के अधिकारी बच्चों की सेहत से जुड़ी इस संवेदनशील खरीदी को प्राथमिकता ही नहीं दे रहे हैं।



टेंडर के झंझट से बच रहे हैं जिम्मेदार अफसर

इस पूरी अव्यवस्था के पीछे तकनीकी और प्रशासनिक बहानों का सहारा लिया जा रहा है। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (CGMSC) ने इस किट की खरीदी से इनकार कर दिया था। नियमतः, ऐसी स्थिति में महिला एवं बाल विकास विभाग को खुद टेंडर जारी करने के लिए उद्योग विभाग समेत कई अन्य विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लेना पड़ता। अफसरों ने इस कागजी प्रक्रिया और 'झंझट' से बचने के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था ही नहीं की, जिसका नतीजा यह हुआ कि मेडिसिन किट की सप्लाई पूरी तरह बंद हो गई।



दूसरों के भरोसे मासूमों का इलाज

एक मीडिया पड़ताल में राजधानी और आसपास की 24 आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं ने अपना दर्द बयां किया। उन्होंने बताया कि कई बार बच्चे तेज बुखार में केंद्र पहुंचते हैं या खेलते समय गिरकर चोटिल हो जाते हैं। केंद्रों में प्राथमिक उपचार या संक्रमण रोकने के लिए मलहम-पट्टी तक नहीं है। मजबूरी में कार्यकर्ताओं को स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (ANM/MHA) या बाहरी लोगों से दवा और पट्टी मांगनी पड़ती है।



विभाग का पक्ष

मामले की गंभीरता को देखते हुए महिला एवं बाल विकास विभाग की संचालक डॉ. रेणुका श्रीवास्तव ने कहा:



"हमने स्वास्थ्य विभाग से पूछा है कि मेडिसिन किट में क्या-क्या दवाइयां उपलब्ध कराई जा सकती हैं। जानकारी आने के बाद किट की खरीदी की जाएगी। पूर्व में यह खरीदी क्यों नहीं की गई, इस पूरे मामले का परीक्षण किया जा रहा है।"



लाखों बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा यह मामला प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।



निष्कर्ष

आंगनबाड़ियों में मेडिसिन किट न होना प्रशासनिक संवेदनशीलता और दूरदर्शिता की कमी को दर्शाता है। टेंडर प्रक्रिया की कागजी कार्रवाई से बचने के लिए लाखों बच्चों के स्वास्थ्य को दांव पर लगाना बेहद चिंताजनक है। सरकार को इस 'झंझट' को दरकिनार कर मासूमों की सुरक्षा के लिए तत्काल कड़े कदम उठाने चाहिए।



FAQ

  1. मेडिसिन किट का बजट कितना था ?
    Ans: केंद्र सरकार हर साल ₹7.5 से ₹8 करोड़ का बजट देती है।
  2. Q 3. एक मेडिसिन किट की कीमत क्या तय है ?
    Ans: केंद्र सरकार ने प्रति किट लगभग ₹1500 की कीमत तय की है।
  3. किट में कौन सी जरूरी दवाएं शामिल हैं ?
    Ans: पैरासिटामोल, ओआरएस (ORS), सिप्रोफ्लॉक्सासिन ड्रॉप्स, आयोडीन और बैंडेज।
  4. विभाग की संचालक का इस पर क्या कहना है ?
    Ans: डॉ. रेणुका श्रीवास्तव के मुताबिक, स्वास्थ्य विभाग से चर्चा के बाद खरीदी का परीक्षण किया जा रहा है।

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