अंजलि मुंडा ने खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में रचा इतिहास, बनी पहली महिला स्वर्ण पदक विजेता

thesootr Desk | Mar 26, 2026, 19:07 IST
Anjali Munda Creates History Khelo India Tribal Games
जाजपुर की अंजलि मुंडा ने रायपुर 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026' की पहली महिला स्वर्ण पदक विजेता बनकर तैराकी में नया इतिहास रचा है। एक वैन चालक की बेटी का यह स्वर्णिम सफर सरकारी प्रोत्साहन और अटूट मेहनत से उपजी एक प्रेरणादायक मिसाल है।

NEWS IN SHORT

  • वैन चालक की बेटी अंजलि मुंडा बनीं पहली महिला गोल्ड मेडलिस्ट
  • अंजलि मुंडा ने तैराकी में जीता स्वर्ण, जाजपुर का नाम किया रोशन
  • खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में स्वर्ण जीतकर भी अंजलि मुंडा असंतुष्ट
  • जाजपुर के छोटे से गाँव में जश्न का माहौल
  • अंजलि मुंडा ने फ्रीस्टाइल स्पर्धा में प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ा

NEWS IN DETAIL

RAIPUR : कभी-कभी एक छोटा सा संयोग पूरे जीवन की दिशा बदल देता है। ओडिशा के एक छोटे से गाँव से निकली 15 वर्षीय अंजलि मुंडा की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। जिस तैराकी को उन्होंने महज मनोरंजन के लिए चुना था, आज उसी खेल ने उन्हें राष्ट्रीय फलक पर एक ऐतिहासिक पहचान दिला दी है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आयोजित 'खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026' में अंजलि ने न केवल स्वर्ण पदक जीता, बल्कि इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता की पहली महिला स्वर्ण पदक विजेता बनकर अपना नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज करा लिया।



स्वर्ण पदक के साथ ऐतिहासिक शुरुआत

रायपुर के स्विमिंग पूल में जब अंजलि मुंडा ने 200 मीटर फ्रीस्टाइल स्पर्धा के लिए छलांग लगाई, तो किसी ने नहीं सोचा था कि वे एक नया कीर्तिमान स्थापित करने जा रही हैं। उन्होंने 2:39.02 सेकंड का शानदार समय निकालते हुए स्वर्ण पदक अपने नाम किया। अंजलि की यह जीत इसलिए भी खास है क्योंकि वे इस आयोजन में गोल्ड जीतने वाली पहली महिला एथलीट बनीं। उनकी इस उपलब्धि ने न केवल ओडिशा का मान बढ़ाया, बल्कि जनजातीय क्षेत्रों की खेल प्रतिभाओं की असीम क्षमता को भी दुनिया के सामने रखा।



संघर्षों की लहरों को पार कर मिली सफलता

अंजलि की सफलता के पीछे का सफर संघर्षों और संकल्पों से भरा है। ओडिशा के जाजपुर जिले के गहिरागड़िया गांव की रहने वाली अंजलि एक अत्यंत साधारण परिवार से आती हैं। उनके पिता एक स्थानीय फैक्ट्री में वैन चालक के रूप में काम करते हैं। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी अंजलि ने संसाधनों के अभाव को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया।



उनकी जिंदगी में बड़ा बदलाव तब आया जब 10 वर्ष की आयु में वे कलिंगा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (KISS) से जुड़ीं। यहाँ उन्हें न केवल निःशुल्क शिक्षा मिली, बल्कि विश्व स्तरीय प्रशिक्षण और खेल का माहौल भी मिला।



अंजलि बताती हैं कि शुरुआत में वे अपनी बड़ी बहन से प्रेरित थीं, जो तीरंदाजी में सक्रिय हैं, लेकिन 2022 में कक्षा में खेल चयन के दौरान उन्होंने अचानक तैराकी को चुना। उस समय वे तैराकी को सिर्फ मस्ती और मनोरंजन मानती थीं, लेकिन कोचों के मार्गदर्शन ने उनके भीतर के चैंपियन को पहचान लिया।



अस्मिता लीग और सुधार की भूख

अंजलि अपनी इस सफलता का श्रेय भारत सरकार के खेल मंत्रालय की ‘अस्मिता लीग’ पहल को देती हैं। उन्होंने कहा, "वर्ष 2024 में संबलपुर और फिर गुवाहाटी में आयोजित अस्मिता स्विमिंग लीग ने मेरे आत्मविश्वास को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया।" इन लीगों में जीते गए रजत पदकों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि वे स्वर्ण की भी हकदार हैं।



हैरान करने वाली बात यह है कि स्वर्ण पदक जीतने और राष्ट्रीय चैंपियन बनने के बावजूद अंजलि संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है, "मेरा लक्ष्य अपने 2:25 सेकंड के व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ समय (Personal Best) में सुधार करना है।" लंबी यात्राओं की थकान और लगातार प्रतिस्पर्धाओं के बावजूद उनका ध्यान केवल अपनी तकनीक और गति पर केंद्रित है।



भविष्य की चुनौतियाँ और उम्मीदें

रायपुर में मिली यह जीत तो सिर्फ एक शुरुआत है। अंजलि की नजर अब आगामी स्पर्धाओं 50 मीटर बैकस्ट्रोक, 100 मीटर बैकस्ट्रोक और 200 मीटर इंडिविजुअल मेडली पर है। वे हर स्पर्धा में अपने पिछले रिकॉर्ड को तोड़ना चाहती हैं। अंजलि मुंडा की यह कहानी देशभर के उन हजारों बच्चों के लिए प्रेरणा है, जो छोटे गाँवों से आते हैं और बड़े सपने देखते हैं।



यह इस बात का भी प्रमाण है कि यदि सही अवसर, सही मार्गदर्शन और सरकारी योजनाओं का सहारा मिले, तो भारत के जनजातीय क्षेत्रों से निकलने वाली प्रतिभाएं दुनिया जीत सकती हैं। अंजलि अब केवल ओडिशा की 'जलपरी' नहीं हैं, बल्कि वे संघर्ष और सफलता का एक ऐसा चेहरा बन गई हैं, जिसे पूरा देश सलाम कर रहा है।



निष्कर्ष

अंजलि मुंडा की यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि प्रतिभा को सही अवसर और अटूट संकल्प का साथ मिले, तो अभाव कभी भी बाधा नहीं बनते। एक वैन चालक की बेटी से नेशनल गोल्ड मेडलिस्ट बनने तक का उनका यह सफर देश की लाखों जनजातीय बेटियों के लिए प्रेरणा का नया स्रोत है। खेलो इंडिया और अस्मिता लीग जैसे मंचों ने उनकी क्षमता को तराशकर उन्हें एक ऐतिहासिक मुकाम तक पहुँचाया है। यह जीत केवल एक पदक नहीं, बल्कि संघर्षों पर हौसलों की एक शानदार विजय है।



ये खबरें भी पढ़ें...

खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026; छत्तीसगढ़ में इतिहास रचने की तैयारी, 2000 खिलाड़ी होंगे शामिल



बस्तर में सजेगा खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स का भव्य मंच, छत्तीसगढ़ के युवाओं को मिलेगा बड़ा अवसर



खेलो इंडिया गेम्स : करोड़ों का बजट खर्च करने के बाद भी नतीजा सिफर, न खिलाड़ी पहुंचे और ना ही दर्शक



खेलो इंडिया यूनिवर्सिटी गेम्स: RNTU हॉकी टीम पहले प्रयास में चैंपियन



Tags:
  • छत्तीसगढ़
  • रायपुर
  • खेलो इंडिया
  • ओडिशा
  • स्वर्ण पदक जीता
  • स्विमिंग पूल
  • ट्राइबल गेम्स