बोधघाट पर फिर भड़का बस्तर, 56 गांवों ने बांधा विरोध का मोर्चा
बस्तर की बहुप्रतीक्षित लेकिन लंबे समय से विवादों में घिरी बोधघाट जलविद्युत परियोजना को लेकर एक बार फिर विरोध तेज हो गया है। दंतेवाड़ा जिले के हितालकुदुम गांव में आयोजित विशाल महापंचायत में 18 पंचायतों के 56 गांवों के हजारों आदिवासी एक मंच पर जुटे और परियोजना के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की। ग्रामीणों ने साफ शब्दों में कहा कि यदि बोधघाट बांध का निर्माण किया गया तो उनके गांव, जंगल, पहाड़, देवी-देवताओं के स्थल और सांस्कृतिक पहचान जलमग्न हो जाएगी, जिसे वे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे।
विकास के नाम छीन रही जमीन:
महापंचायत में शामिल ग्रामीणों का कहना था कि सरकार विकास के नाम पर उनकी जमीन और संसाधनों का अधिग्रहण करना चाहती है, जबकि इस परियोजना से सबसे बड़ा नुकसान स्थानीय आदिवासी समाज को होगा। ग्रामीणों ने कहा कि उनके लिए जंगल, पहाड़ और गुफाएं केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं बल्कि आस्था और संस्कृति के केंद्र हैं। इन स्थलों पर उनके देवी-देवताओं का निवास माना जाता है। ऐसे में बांध बनने से इनका डूब क्षेत्र में आना उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर सीधा प्रहार होगा।
उजड़ जाएगा बस्तर:
सभा के दौरान कई वक्ताओं ने कहा कि बोधघाट परियोजना के कारण हजारों परिवारों के विस्थापन का खतरा पैदा हो जाएगा। ग्रामीणों का दावा है कि परियोजना के निर्माण से बस्तर का बड़ा हिस्सा प्रभावित होगा और लोगों को अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन से उनका जीवन जुड़ा हुआ है, इसलिए इसके नुकसान की भरपाई किसी मुआवजे से नहीं की जा सकती।
भड़की आंदोलन की आग:
महापंचायत में ग्रामीणों ने सरकार को चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि उनकी सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाया गया तो व्यापक आंदोलन किया जाएगा। कुछ वक्ताओं ने यहां तक कहा कि सरकार पहले उनकी बात सुने, अन्यथा विरोध और अधिक उग्र रूप ले सकता है। सभा में मौजूद लोगों ने एक स्वर में परियोजना को तत्काल निरस्त करने की मांग की।
राजनीतिक रूप से भी यह आयोजन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बोधघाट परियोजना के विरोध में आयोजित इस महापंचायत में कई विपक्षी नेताओं ने हिस्सा लिया और आदिवासियों के आंदोलन को समर्थन दिया। कार्यक्रम में कांग्रेस विधायक विक्रम मंडावी, चित्रकोट के पूर्व विधायक राजमन बेंजाम, जगदलपुर के पूर्व विधायक रेखचंद जैन, देवती कर्मा सहित कई प्रमुख नेता मौजूद रहे। नेताओं ने मंच से कहा कि आदिवासियों की सहमति के बिना किसी भी परियोजना को लागू करना उचित नहीं है और प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए।
मामले ने लिया राजनीतिक रूप:
विधायक विक्रम मंडावी ने कहा कि कांग्रेस भी इस मुद्दे पर आदिवासियों के साथ है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि प्रभावित गांवों की आवाज रायपुर से लेकर दिल्ली तक पहुंचाई जाएगी। मंडावी ने सवाल उठाया कि जिस परियोजना का स्थानीय लोग पिछले 47 वर्षों से विरोध कर रहे हैं, उसे सरकार आखिर किस आधार पर आगे बढ़ाना चाहती है।
बोध घाट परियोजना की परिकल्पना वर्ष 1979 में की गई थी। तब से यह योजना समय-समय पर चर्चा और विरोध का विषय बनती रही है। हाल ही में परियोजना से जुड़े सर्वे कार्यों की खबर सामने आने के बाद प्रभावित गांवों में चिंता बढ़ गई है। परियोजना विरोधी संघर्ष समिति का दावा है कि इससे दंतेवाड़ा, बीजापुर, बस्तर और नारायणपुर जिलों की 18 पंचायतों के 56 गांव प्रभावित होंगे।
वहीं सरकार का पक्ष है कि बोधघाट बहुउद्देशीय परियोजना से क्षेत्र में सिंचाई, बिजली उत्पादन और विकास को नई गति मिलेगी। हालांकि प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि विकास की कीमत उनकी संस्कृति, पहचान और अस्तित्व नहीं हो सकती। इसी मुद्दे को लेकर बस्तर में एक बार फिर बोधघाट परियोजना को लेकर संघर्ष की नई जमीन तैयार होती दिखाई दे रही है।
FAQ
- बोधघाट परियोजना क्या है?
बोधघाट परियोजना छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय जलविद्युत और सिंचाई परियोजना है, जिसका उद्देश्य बिजली उत्पादन और कृषि सिंचाई को बढ़ावा देना बताया जाता है। - बोधघाट परियोजना पर विवाद क्यों है?
बोधघाट परियोजना पर विवाद इसलिए है क्योंकि स्थानीय आदिवासी समुदाय का कहना है कि इससे उनके गांव, जंगल, धार्मिक स्थल और सांस्कृतिक पहचान जलमग्न हो जाएगी, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन और जीवन-यापन पर असर पड़ेगा।
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