बस्तर बना काजू का नया हब ; देश-विदेश के बाजारों में बढ़ी मांग, प्रोसेसिंग यूनिट्स से महिलाओं को मिल रहा रोजगार
NEWS IN SHORT
- बस्तर में काजू उत्पादन 50 हजार क्विंटल से अधिक
- 10 हजार परिवारों की आय का मुख्य स्रोत बना
- कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल साबित
- प्रोसेसिंग यूनिट्स में महिलाओं को मिला रोजगार और आत्मनिर्भरता
- बस्तर का काजू राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में लोकप्रिय हुआ
NEWS IN DETAIL
छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध वनोपज के लिए विश्व विख्यात है। लेकिन अब इस क्षेत्र की पहचान एक नए रूप में उभर रही है— 'काजू हब'। बस्तर की लाल मिट्टी और अनुकूल जलवायु ने यहां काजू की खेती को एक नई ऊंचाई दी है। वर्तमान में, बस्तर में प्रतिवर्ष 50 हजार क्विंटल से अधिक काजू का उत्पादन हो रहा है, जो न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है, बल्कि करीब 10 हजार परिवारों के लिए जीविकोपार्जन का मुख्य जरिया बन गया है।
खाली जमीन से सुनहरे भविष्य तक का सफर
बस्तर के वन क्षेत्रों में काजू वृक्षारोपण की नींव साल 1979 के आसपास रखी गई थी। उस समय इसका मुख्य उद्देश्य बंजर और खाली पड़ी जमीनों को हरा-भरा करना और स्थानीय आदिवासियों को रोजगार से जोड़ना था। दशकों बाद, वह दूरदर्शी सोच अब धरातल पर सार्थक सिद्ध हो रही है। आज बस्तर का काजू अपनी विशिष्ट मिठास और गुणवत्ता के कारण देशभर के बाजारों में अपनी धाक जमा रहा है।
कम लागत,अधिक मुनाफा
जिले के बकावंड ब्लॉक समेत कई क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर काजू का उत्पादन किया जा रहा है। काजू उत्पादकों का मानना है कि अन्य फसलों की तुलना में यह काफी फायदेमंद है। काजू का पेड़ 4 से 5 वर्षों में फल देना शुरू कर देता है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार पेड़ तैयार हो जाने के बाद इसके रखरखाव में बेहद कम खर्च आता है, जिससे छोटे किसानों पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ता।
स्थानीय किसानों और सरपंचों का कहना है कि यदि सरकार निजी भूमि पर काजू बागान विकसित करने के लिए और अधिक प्रोत्साहन और तकनीकी सहायता प्रदान करे, तो आने वाले समय में बस्तर 'देश की काजू राजधानी' बनने की क्षमता रखता है।
प्रोसेसिंग यूनिट्स से महिला सशक्तिकरण
काजू केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने स्थानीय स्तर पर औद्योगिक विकास के द्वार भी खोले हैं। बस्तर में स्थापित प्रोसेसिंग यूनिट्स में बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। कच्चा काजू तोड़ने से लेकर उसे ग्रेडिंग और पैकिंग करने तक का काम महिलाएं कर रही हैं, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।
बाजार में बढ़ती धमक
कभी बस्तर के चौक-चौराहों और सड़कों पर बिकने वाला स्थानीय काजू अब सात समंदर पार जाने की तैयारी में है। बेहतर स्वाद और जैविक खेती की वजह से इसकी मांग महानगरों में तेजी से बढ़ी है। वनों पर निर्भर रहने वाले आदिवासी अब पारंपरिक खेती के साथ-साथ काजू उत्पादन से अपनी आय में भारी वृद्धि कर रहे हैं।
निष्कर्ष
बस्तर का काजू खेती आज सिर्फ एक फल नहीं, बल्कि स्थानीय आदिवासियों की आर्थिक आजादी का प्रतीक बन गया है। 'समृद्ध किसान, समृद्ध प्रदेश' के संकल्प को पूरा करते हुए बस्तर का यह 'सफेद सोना' बस्तर की नई तस्वीर पेश कर रहा है।
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