16 साल की मेहनत लाई रंग : बस्तर में लहलहा रहे लाल चंदन के सैकड़ों पेड़
समझें क्या है पूरा मामला
- 15 पौधों से शुरू हुआ लाल चंदन का सफर
- बस्तर की महिला किसान ने बदली खेती की तस्वीर
- 200 पेड़ों तक पहुंचा 16 साल का मेहनत भरा सफर
- प्रभाती ने बचाईं 450 से ज्यादा देसी धान की किस्में
- जैविक खेती से बनाई देशभर में अलग पहचान
Jagdalpur। छत्तीसगढ़ के बस्तर की एक महिला किसान ने अपनी मेहनत और लगन से खेती की नई मिसाल पेश की है। गारावंड खुर्द गांव की रहने वाली प्रभाती भारत ने करीब 16 साल पहले सिर्फ 15 लाल चंदन के पौधों से खेती की शुरुआत की थी। आज उनके खेत में करीब 200 लाल चंदन के पेड़ तैयार हो चुके हैं। उनकी यह पहल अब दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन गई है।
भुवनेश्वर से लाईं थीं लाल चंदन के पौधे
प्रभाती भारत ने साल 2010 के आसपास लाल चंदन की खेती शुरू की थी। उन्होंने शुरुआती पौधे भुवनेश्वर से मंगवाए और अपने खेत में लगाए। बाद में वन विभाग की मदद से भी उन्हें कुछ पौधे मिले। उन्होंने इन पौधों की लगातार देखभाल की और जैविक तरीके से खेती को आगे बढ़ाया।
लंबे समय तक धैर्य और मेहनत का नतीजा यह रहा कि आज उनके खेत में लाल चंदन के पेड़ लहलहा रहे हैं। प्रभाती का कहना है कि पेड़ों को तैयार होने में समय जरूर लगता है, लेकिन भविष्य में यह किसानों के लिए अच्छी आय का जरिया बन सकता है।
मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर भी कराया रोपण
प्रभाती भारत ने सिर्फ अपने खेत तक लाल चंदन की खेती को सीमित नहीं रखा। उन्होंने बालाजी मंदिर, मां दंतेश्वरी मंदिर और शिव मंदिर सहित कई जगहों पर भी लाल चंदन के पौधे लगाए हैं।
उनका उद्देश्य दुर्लभ पेड़ों का संरक्षण करना और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना है। उनके प्रयासों से बस्तर में लाल चंदन के पौधों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ रहा है।
गांव की महिलाओं को जोड़ा जैविक खेती से
प्रभाती भारत ने खेती के साथ महिला सशक्तिकरण पर भी काम किया। उन्होंने गांव की महिलाओं को एकजुट कर जैविक खेती के लिए प्रेरित किया। खेतों में काम करने वाली महिलाओं को प्राकृतिक खेती के तरीके सिखाए।
आज गारावंड खुर्द गांव में कई किसान बिना रासायनिक खाद और संकर बीजों के जैविक खेती कर रहे हैं। प्रभाती की पहल से कई महिलाओं को खेती के नए तरीके सीखने का मौका मिला है।
450 से ज्यादा देसी धान की किस्मों को बचाया
लाल चंदन के अलावा प्रभाती भारत देशी बीजों के संरक्षण का भी काम कर रही हैं। उन्होंने 450 से ज्यादा दुर्लभ और विलुप्त हो रही धान की किस्मों को सुरक्षित रखा है।
वह बस्तर में ब्लैक राइस और रेड राइस की खेती को बढ़ावा देने वाली शुरुआती महिला किसानों में शामिल हैं। उनके खेत में तैयार होने वाले शुगर फ्री लाल चावल और काले चावल की मांग देश के साथ विदेशों में भी है।
परिवार से मिला पूरा सहयोग
प्रभाती की इस सफलता में उनके परिवार का भी बड़ा योगदान रहा है। उनके पति विजय भारत वनौषधीय पौधों की जानकारी रखते हैं। वहीं उनके ससुर विशाल भारत वन विभाग में रेंजर रह चुके थे।
प्रभाती ने औषधीय पौधों से जुड़ी ट्रेनिंग भी ली है। उन्होंने ग्रामीण वनस्पति विशेषज्ञ का कोर्स पूरा किया और अब विलुप्त होती वनस्पतियों के संरक्षण पर काम कर रही हैं।
किसानों के लिए बढ़िया विकल्प बन सकती है लाल चंदन की खेती
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक बस्तर की जलवायु लाल चंदन की खेती के लिए अनुकूल है। विशेषज्ञों का मानना है कि खेतों की मेड़ों और खाली जमीन पर लाल चंदन का पौधरोपण किसानों की आय बढ़ाने का अच्छा विकल्प हो सकता है।
हालांकि लाल चंदन का पेड़ तैयार होने में करीब 15 से 20 साल का समय लगता है। लेकिन तैयार होने के बाद इसकी लकड़ी और तेल की बाजार में अच्छी कीमत मिलती है।
प्रभाती भारत ने अपने प्रयासों से साबित कर दिया है कि खेती सिर्फ परंपरागत तरीके से नहीं बल्कि नए प्रयोगों के साथ भी की जा सकती है। उनका मॉडल बस्तर ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के किसानों के लिए प्रेरणा बन रहा है।
FAQ
- प्रभाती भारत ने लाल चंदन की खेती कब शुरू की थी?
प्रभाती भारत ने करीब 16 साल पहले वर्ष 2010 के आसपास लाल चंदन की खेती शुरू की थी। - प्रभाती भारत के खेत में कितने लाल चंदन के पेड़ तैयार हो चुके हैं?
उनके खेत में वर्तमान में करीब 200 लाल चंदन के पेड़ तैयार हो चुके हैं। - प्रभाती भारत खेती के अलावा कौन-कौन से काम कर रही हैं?
वह जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ 450 से ज्यादा देसी धान की किस्मों के संरक्षण और बीज बैंक तैयार करने का काम कर रही हैं।
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