आंगनबाड़ी साड़ी वितरण में करोड़ों का खेल, 5.5 मीटर की जगह 5 मीटर की साड़ी का हुआ वितरण

Aishwarya Dwivedi | Apr 09, 2026, 18:15 IST
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बिलासपुर में 9 करोड़ 7 लाख का साड़ी घोटाला उजागर हुआ है। 5.5 मीटर की जगह पांच मीटर की घटिया साड़ियां बांटी गईं। प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार के चलते फिलहाल भुगतान रोककर जांच शुरू है।

NEWS IN SHORT

  • 5.5 मीटर की जगह केवल 5 मीटर साड़ी दी गई; लाखों मीटर कपड़े का गबन।
  • पहली धुलाई में ही रंग उतरा और कपड़ा सिकुड़कर पहनने लायक नहीं बचा।
  • बिना क्वालिटी चेक और लैब टेस्ट के करोड़ों का स्टॉक अधिकारियों ने पास कर दिया।
  • 9 करोड़ 7 लाख का भारी-भरकम बजट होने के बावजूद घटिया सामग्री बांटी गई।
  • दोषी अधिकारियों और सप्लायर पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

NEWS IN DETAIL

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में महिला एवं बाल विकास विभाग में साड़ियों की खरीद को लेकर एक बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। 9 करोड़ 7 लाख के इस प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही का ऐसा गठजोड़ सामने आया है, जिसने प्रदेश की 1 लाख 94 हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के हक पर डाका डाला है।



आधा मीटर कपड़ा गायब

आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो यह महज खराब कपड़े का मामला नहीं, बल्कि एक बड़े वित्तीय घोटाले की ओर इशारा करता है। टेंडर के मुताबिक साड़ी की लंबाई 5.5 मीटर तय थी, लेकिन बांटी गई साड़ियां केवल 5 मीटर निकलीं।



यदि प्रति साड़ी आधा मीटर कपड़ा कम दिया गया, तो कुल 1 लाख 94 हजार साड़ियों में लगभग 1 लाख मीटर कपड़ा बचा लिया गया। 500 प्रति साड़ी के बजट वाली इस डील में यह हेराफेरी करोड़ों रुपये के कमीशन की ओर इशारा करती है। सवाल यह है कि यह पैसा किसकी जेब में गया?



कागजों पर फिट हकीकत में बेकार

इस घोटाले ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसी भी सरकारी सप्लाई से पहले क्वालिटी कंट्रोल और सैंपल टेस्टिंग अनिवार्य होती है। इस तरह में कई सवाल सामने आते है। साड़ियों को जिलों में बांटने से पहले क्या अधिकारियों ने फिजिकल वेरिफिकेशन नहीं किया? आधा मीटर की कमी और कपड़े का पतलापन किसी की नजर में क्यों नहीं आया?



कार्यकर्ताओं का आक्रोश

मस्तूरी, सिरगिट्टी और गनियारी की कार्यकर्ताओं ने जब इन साड़ियों को धोया, तो रंग बह गया और कपड़ा सिकुड़कर और छोटा हो गया। महिलाओं का कहना है कि यूनिफॉर्म उनकी पहचान है, लेकिन विभाग ने उन्हें पोछा जैसा कपड़ा थमा दिया है। अब कार्यकर्ताओं ने सामूहिक मोर्चा खोलते हुए साड़ियां वापस करने और जांच की मांग की है।



दबाव में विभाग

मामला गरमाता देख विभाग की संचालक ने जांच कमेटी गठित कर दी है और फिलहाल भुगतान पर रोक लगा दी गई है। हालांकि, यह कदम केवल डैमेज कंट्रोल जैसा लग रहा है।



अब बड़ा सवाल यह है की भुगतान रोकना काफी नहीं है। असली सवाल उन जिम्मेदार अधिकारियों पर है जिन्होंने इस घटिया स्टॉक को स्वीकार किया। क्या उन पर कोई ठोस कार्रवाई होगी या जांच के नाम पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?



निष्कर्ष

बिलासपुर साड़ी घोटाला भ्रष्टाचार और प्रशासनिक मिलीभगत का जीता-जागता सबूत है। 9 करोड़ 7 लाख के बजट में कपड़े की लंबाई और गुणवत्ता से समझौता करना न केवल आर्थिक अपराध है, बल्कि कार्यकर्ताओं के सम्मान के साथ खिलवाड़ भी है। केवल भुगतान रोकना पर्याप्त नहीं, बल्कि दोषी अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई और व्यवस्था में पारदर्शिता अनिवार्य है।



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