छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: यौन शोषण पीड़िता दिव्यांग युवती को मिली गर्भपात की अनुमति
NEWS IN SHORT
- हाईकोर्ट का अहम फैसला मानसिक दिव्यांग युवती को गर्भपात की अनुमति
- सुनवाई में पीड़िता की शारीरिक और मानसिक स्थिति का किया गया पूरा आकलन
- प्रेग्नेंसी खत्म करने के लिए मेडिकल जांच रिपोर्ट के आधार पर दिया गया आदेश
- कोर्ट ने गर्भपात के दौरान भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित रखने का आदेश दिया
- चीफ मेडिकल ऑफिसर को निर्देश: प्रेग्नेंसी खत्म करने के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में प्रक्रिया पूरी करें
NEWS IN DETAIL
Bilaspur : Chhattisgarh High Court :छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मानसिक रूप से दिव्यांग युवती के यौन शोषण के बाद गर्भवती होने के मामले में गर्भपात की अनुमति दे दी है।
यह मामला एक बहुत ही संवेदनशील और महत्वपूर्ण फैसले का हिस्सा बन गया है, जिसमें कोर्ट ने पीड़िता की शारीरिक और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया।
मेडिकल जांच और रिपोर्ट की शर्तें
High Court Decision :कोर्ट ने पहले हुई सुनवाई में यह सुनिश्चित किया था कि चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर (CMHO), कांकेर को 18 अप्रैल तक एक्सपर्ट डॉक्टरों की एक टीम की व्यवस्था करनी चाहिए
जिसमें एक गायनेकोलॉजिस्ट शामिल हो। इस टीम का काम याचिकाकर्ता की शारीरिक और मानसिक स्थिति का पूरा आकलन करना था।
इस जांच में यह भी देखा गया कि गर्भवती होने का प्रेग्नेंसी स्टेज क्या है और क्या गर्भपात करने से पीड़िता को किसी तरह का नुकसान हो सकता है। रिपोर्ट के आधार पर, कोर्ट ने आगे की सुनवाई की।
प्रेग्नेंसी को खत्म करने की अनुमति
मेडिकल रिपोर्ट और उच्चतम न्यायालय व हाईकोर्ट के पूर्व में दिए गए फैसलों को ध्यान में रखते हुए, कोर्ट ने यह निर्णय लिया कि मानसिक रूप से कमजोर पीड़िता के लिए
अनचाही प्रेग्नेंसी को बढ़ने देना उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को और बिगाड़ सकता है। इसलिए कोर्ट ने याचिकाकर्ता को मेडिकल तरीके से प्रेग्नेंसी समाप्त करने की अनुमति दे दी।
सुरक्षित तरीका और गार्जियन की उपस्थिति
इसके बाद, कोर्ट ने पीड़िता से कहा कि वह अपने गार्जियन या रिश्तेदार के साथ चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर, कांकेर के सामने पेश हों, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रेग्नेंसी को कानूनी तरीके से समाप्त किया जाए
जैसा कि एक्ट 1971 के तहत निर्धारित है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी आवश्यक मेडिकल प्रक्रिया पूरी करने के बाद ही गर्भपात किया जाए।
भ्रूण के डीएनए सैंपल की सुरक्षा
एक और महत्वपूर्ण पहलू पर कोर्ट ने ध्यान दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि भ्रूण का डीएनए सैंपल सुरक्षित किया जाए, ताकि भविष्य में क्रिमिनल केस के लिए
यह सबूत के रूप में काम आ सके। यह कदम इस मामले की गंभीरता और भविष्य में होने वाली जांच के लिए अहम साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
इस फैसले के साथ, हाईकोर्ट ने न केवल पीड़िता के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी, बल्कि कानूनी प्रक्रिया को भी सुनिश्चित किया।
कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि यौन शोषण की शिकार मानसिक रूप से कमजोर पीड़िता को अनचाही प्रेग्नेंसी के लिए मजबूर करना, उसे और नुकसान पहुंचा सकता है।
इसके साथ ही, भ्रूण के डीएनए सैंपल को सुरक्षित रखने की आवश्यकता समझी, जो कि इस मामले के आगे के सबूत के रूप में काम करेगा।
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