अधिकारी बनाम जनप्रतिनिधि : सदन से सड़क तक नेताओं में नाराजगी

VINAY VERMA | Aug 05, 2026, 13:46 IST
अधिकारी बनाम जनप्रतिनिधि विवाद
छत्तीसगढ़ में अफसरशाही को लेकर अब सत्ता पक्ष के नेता भी सवाल उठा रहे हैं। सांसद बृजमोहन अग्रवाल और विजय बघेल की शिकायतों के बाद जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच बढ़ते टकराव का मुद्दा चर्चा में है।

बे लगाम अफसरशाही अब सिर्फ विपक्ष का आरोप नहीं रह गई है। सत्ता पक्ष के सांसद भी खुलकर मैदान में उतर आए हैं। रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल और स्वास्थ्य सचिव अमित कटारिया के विवाद ने पहले ही सरकार को असहज कर रखा है।



अब दुर्ग सांसद विजय बघेल ने भी राज्य के दो अधिकारियों के खिलाफ लोकसभा सचिवालय में शिकायत भेज दी है। यानी मामला अब व्यक्तिगत विवाद नहीं, बल्कि सिस्टम पर प्रश्न उठा रहा है।



सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार खुद 19 बार अफसरों को जनप्रतिनिधियों का सम्मान करने की हिदायत दे चुकी है, तो फिर आदेश फाइलों से बाहर क्यों नहीं निकल पाए?



19 आदेश, फिर भी वही हाल

द सूत्र की पड़ताल में सामने आया कि छत्तीसगढ़ बनने के बाद से सरकार ने 2001 से लेकर 2010 तक कम से कम 19 बार अलग-अलग आदेश और निर्देश जारी किए। हर बार कहा गया कि सांसद, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ सौहार्दपूर्ण व्यवहार करें। उनके पत्रों का समय पर जवाब दें। कार्यक्रमों में बुलाएं।



प्रोटोकॉल का पालन करें। लेकिन हर नए आदेश के बाद कुछ दिन सुधार दिखा और फिर वही पुरानी कहानी लौट आई। सवाल यह है कि जब 19 चेतावनियां भी असर नहीं कर सकीं, तो आखिर जिम्मेदार कौन है?



15 दिन का नियम भी बेअसर

सरकारी आदेश साफ कहता है कि सांसदों और विधायकों के पत्रों का जवाब 15 दिन के भीतर दिया जाए। सिर्फ जवाब ही नहीं, पत्र की तत्काल अभिस्वीकृति भी भेजी जाए। लेकिन शिकायतें बताती हैं कि कई जनप्रतिनिधियों के पत्र महीनों तक फाइलों में दबे रहते हैं।



फोन तक नहीं उठाए जाते। विकास कार्यों के प्रस्ताव लंबित रखे जाते हैं और जानकारी मांगने पर भी जवाब नहीं मिलता। यही वजह है कि अब शिकायतें सीधे दिल्ली तक पहुंच रही हैं।



नाम तक गायब कर देते हैं

विवाद सिर्फ पत्राचार तक सीमित नहीं है। कई बार सरकारी कार्यक्रमों में स्थानीय विधायक या सांसद को बुलाया ही नहीं जाता। कहीं निमंत्रण नहीं भेजा जाता तो कहीं शिलापट्ट से नाम गायब कर दिया जाता है।



कई जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि राजनीतिक मतभेद के कारण प्रोटोकॉल की अनदेखी की जाती है।



सरकार के आदेश साफ कहते हैं कि भूमि पूजन, लोकार्पण और उद्घाटन जैसे कार्यक्रमों में क्षेत्रीय विधायक को अनिवार्य रूप से आमंत्रित किया जाए, लेकिन जमीन पर तस्वीर कई बार उलटी नजर आती है।



रमन सिंह भी मंच से बरसे

बेमेतरा के मुख्यमंत्री कन्या विवाह समारोह में जो हुआ, उसने पूरे प्रशासन पर सवाल खड़े कर दिए। मुख्यमंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्री और विधानसभा अध्यक्ष जैसे शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी के बावजूद स्वागत और बैठने की व्यवस्था तक ठीक नहीं थी।



मंच से ही विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने कलेक्टर और एसपी को कड़ी फटकार लगाई।



उन्होंने साफ कहा कि 15 साल मुख्यमंत्री रहने के दौरान भी उन्होंने ऐसी लचर व्यवस्था नहीं देखी। यह टिप्पणी बताती है कि प्रोटोकॉल की अनदेखी अब बड़े स्तर पर भी चिंता का विषय बन चुकी है।



सदन में भी अफसरशाही का मुद्दा

विधानसभा के बजट सत्र में भी यही तस्वीर सामने आई। अनुदान मांगों पर चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण विभागों के वरिष्ठ अधिकारी सदन में मौजूद नहीं थे।



इस पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तीखी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि अधिकारियों में जवाबदेही कम होती जा रही है और पूरे प्रदेश में अफसरशाही हावी है।



विपक्ष ने भी इसी मुद्दे पर सरकार को घेरा और सदन में जोरदार हंगामा हुआ। यानी सत्ता और विपक्ष दोनों की शिकायत लगभग एक जैसी है।



5 बड़ी बातें

  • 19 बार सरकार ने चेतावनी जारी की।
  • 15 दिन में जवाब देने का नियम।
  • फोन नहीं उठाने की सबसे ज्यादा शिकायत।
  • कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल पर लगातार विवाद।
  • सांसदों का गुस्सा अब दिल्ली तक पहुंचा।

2010 का समेकित आदेश क्या कहता है

21 अप्रैल 2010 को सामान्य प्रशासन विभाग ने एक समेकित परिपत्र जारी किया था। इसमें साफ लिखा गया कि सरकार के ध्यान में यह बात आई है कि पहले जारी निर्देशों का कड़ाई से पालन नहीं हो रहा है और यह खेदजनक है।



इसके बाद सभी विभागों, कलेक्टरों और विभागाध्यक्षों को पुराने सभी आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।



परिशिष्ट में 2001 से 2009 तक जारी 18 आदेशों का पूरा ब्यौरा भी जोड़ा गया। यानी सरकार ने खुद माना था कि अफसर निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं।



3 आदेश-पत्रों की तत्काल स्वीकृति एवं जानकारी देने के संबंध में।


3 आदेश - शासकीय आयोजनों में पूर्व संसद सदस्यों/विधायकों को आमंत्रित करने के संबंध में।


1 आदेश - संसद सदस्यों से प्राप्त पत्रों का 15 दिनों के अंदर उत्तर देने एवं रजिस्टर संधारित करने हेतु।


1 आदेश - विधायकों और आयोगों/निगमों/मंडलों के अध्यक्षों से प्राप्त पत्रों का अंतरित उत्तर 15 दिनों में देने बाबत


1 आदेश - प्राप्त पत्रों की तत्काल जानकारी भेजने बाबत्।


1 आदेश - जिला/ब्लॉक स्तर पर विकास योजनाओं की समीक्षा बैठकों की जानकारी क्षेत्रीय विधायकों को समय पर देना।


1 आदेश - अधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा सौहार्दपूर्ण व्यवहार हेतु मार्ग-निर्देशिका पुस्तिका।


1 आदेश - सांसदों/विधायकों के पत्रों पर कार्रवाई केंद्रीय सचिवालय मैनुअल एवं भारत सरकार के कार्मिक/लोक शिकायत मंत्रालय के दिशानिर्देशानुसार करना।


2 आदेश - किसी योजना के भूमि पूजन, शिलान्यास, उद्घाटन/लोकार्पण में क्षेत्रीय विधायक को अनिवार्य रूप से आमंत्रित करना।


3 आदेश - भूमि पूजन/लोकार्पण के निमंत्रण पत्रों में सांसदों/विधायकों के नाम व पते को स्पष्ट एवं आदरपूर्वक अंकित करना


2 आदेश - जनप्रतिनिधियों से बातचीत/इंटरैक्शन करते समय सरकारी कर्मचारियों द्वारा बुनियादी सिद्धांतों का पालन करना।



अब सवाल सरकार के सामने

बृजमोहन अग्रवाल और अमित कटारिया विवाद, विजय बघेल की शिकायत, बेमेतरा की फटकार और विधानसभा की नाराजगी... ये अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं। ये उस व्यवस्था की तस्वीर है, जहां जनप्रतिनिधि और अफसर आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे हैं।



सरकार ने 19 बार समझाया, नियम बनाए, समय सीमा तय की और सम्मान की नसीहत दी। लेकिन अगर शिकायतें आज भी पहले जैसी हैं, तो सवाल सिर्फ अधिकारियों पर नहीं, उन आदेशों के पालन कराने वाली व्यवस्था पर भी उठना तय है।



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