सीएम हाउस के नाम पर सर्किट हाउस में रुकता था सूर्यकांत, सौम्या करती थी हिसाब को ओके, कोल लेवी में दो रुपए रानू साहू का हिस्सा
इस घोटाले का किंगपिन सूर्यकांत तिवारी की सरकार में इतनी दखल थी कि जब वो वसूली करने जिलों में जाता था तो सरकारी सर्किट हाउस में रुकता था।
अवैध लेवी का सारा लेन देन उसकी ही लाल डायरी में में होता था। यह लाल डायरी तत्कालीन सीएम की उप सचिव सौम्या चौरसिया के पास पहुंचती थी। सौम्या उसे ओके करती थी। कोरबा की तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू कोयले लेवी में 25 रुपए की अवैध वसूली के साथ अतिरिक्त 2 रुपए अपने हिस्से के जोड़ती थी। समीर विश्नोई के अवैध वसूली के बाद ही ई परमिट जारी करने के निर्देश थे।
कोयला घोटाले का सिंडीकेट
ईओडब्ल्यू के अभियोग पत्र के अनुसार कोयला घोटाले की शुरुवात भूपेश बघेल सरकार बनने के तत्काल बाद 2019 में ही शुरु हो गई थी। इसमें कारोबारियों से लेकर सरकार के मुख्य अफसर और तत्कालीन विधायक तक शामिल थे। इसमें कारोबारी सूर्यकांत तिवारी, तत्कालीन सीएम की उप सचिव सौम्या चौरसिया, तत्कालीन आईएएस समीर विश्नोई,जेपी मौर्य, तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू, तत्कालीन विधायक जैसे अहम किरदार शामिल थे।
तय किया गया कि कोयला लेवी में 25 रुपए अतिरिक्त वसूले जाएंगे। जो यह पैसे देगा उसी का ई परमिट जारी किया जाएगा। और इस तरह बुनी गई 500 करोड़ कमाने की पटकथा और शुरु हुई वसूली। इसमें और भी कई किरदार शामिल हैं जो हम आपको सिलसिलेवार बताएंगे। इसमें हम आपको करोबारी और प्रमुख अफसरों की काली करतूत बता रहे हैं।
सूर्यकांत तिवारी
सूर्यकांत तिवारी इस घोटाले का मुख्य किरदार है। सूर्यकांत कोयला लेवी की वसूली, रकम का संग्रह, हिसाब, परिवहन और उपयोग की पूरी व्यवस्था का संचालन करता था। उसके यहां से आयकर विभाग की तलाशी के दौरान जब्त हस्तलिखित डायरी में कोयला लेवी की वसूली की योजना से संबंधित विवरण मिले। उसने अपने राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्कों का उपयोग कर कोयला परिवहन की अनुमति संबंधी प्रक्रिया में बदलाव कराया और उसका आदेश जारी करवाया।
इसके साथ ही तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व और मुख्यमंत्री कार्यालय से समन्वय कर मैदानी अधिकारियों को निर्देश दिलवाने में भूमिका निभाई। कोयला कारोबारियों और ट्रांसपोर्टरों की बैठकें आयोजित कराई और जिला स्तर पर वसूली के लिए उसके विश्वस्त व्यक्तियों को नियुक्त किया गया। संबंधित जिलों के दौरों के दौरान सूर्यकांत तिवारी एवं उसके सहयोगियों के ठहरने की व्यवस्था भी विभिन्न शासकीय और निजी अतिथि गृहों में मुख्यमंत्री कार्यालय के नाम से कराई जाती थी।
जिला स्तर पर नियुक्त व्यक्तियों द्वारा कोयला ट्रांसपोर्टरों से 25 रुपये प्रति टन की दर से रकम मांगी जाती थी और रकम मिलने के बाद संबंधित डीओ के अनुमोदन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती थी। रकम नहीं देने पर अनुमति रोकने, गाड़ियां रोकने और कारोबार में रुकावट पैदा की जाती थी। जिलों से इकट्ठी की गई रकम रायपुर स्थित महाराजा अपार्टमेंट, अनुपम नगर कार्यालय और अन्य निर्धारित स्थानों पर लाई जाती थी। रकम प्राप्त करने, उसका हिसाब रखने तथा आगे वितरण करने वालों के लिए अलग-अलग कोडवर्ड निर्धारित थे।
प्राप्त रकम की गिनती की जाती थी और उसकी आवक, खर्च तथा शेष राशि का हिसाब रजनीकांत तिवारी और सहयोगियों द्वारा डायरियों हाथों से लिख जाता था। किसको कितना पैसा देना है यह सूर्यकांत तिवारी तय करता था। वसूली से मिली रकम का उपयोग राजनीतिक और प्रशासनिक व्यक्तियों को भुगतान करने, चुनाव संबंधी खर्च, संपत्ति खरीदी,कोल वाशरी निर्माण और अन्य निवेश में किया जाता था।
सौम्या चौरसिया
सौम्या चौरसिया मुख्यमंत्री कार्यालय में उप सचिव के पद पर पदस्थ थीं। वे अवैध धन संग्रहण से संबंधित अघोषित कार्य विभाजन में खनिज विभाग से संबंधित कार्यों का समन्वय करती थीं। कोयला परिवहन की अनुमति संबंधी आदेश में परिवर्तन कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए जाने के तथ्य मिले। सूर्यकांत तिवारी द्वारा संचालित वसूली की व्यवस्था में उन्हें रकम प्राप्त होती थी और वसूली से प्राप्त रकम के हिसाब एवं उपयोग की जानकारी भी उन्हें दी जाती थी।
कोयला लेवी के मासिक आय-व्यय की डायरियां सूर्यकांत तिवारी द्वारा सौम्या चौरसिया एवं अन्य राजनीतिक व्यक्ति को दिखाई जाती थी। रकम के खर्च और वितरण के संबंध में भी सूर्यकांत तिवारी उनसे निर्देश प्राप्त करता था। सूर्यकांत तिवारी द्वारा सौम्या चौरसिया के हिस्से की नकद रकम मनीष उपाध्याय और जयचंद कोशले के माध्यम से पहुंचाई जाती थी। जप्त डायरियों में MU और JAI नाम से दर्ज प्रविष्टियों का संबंध मनीष उपाध्याय और जयचंद कोशले से पाया गया।
इन व्यक्तियों के माध्यम से सौम्या चौरसिया तक रकम पहुंचाने का विवरण संबंधित बयानों में भी मिला। उनके परिवार के अन्य सदस्यों तक देश के विभिन्न स्थानों पर सूर्यकांत तिवारी के लिए काम करने वाले व्यक्तियों द्वारा अवैध रकम पहुंचाए जाने के तथ्य मिले। अवैध रकम से उनकी माता शांति देवी चौरसिया और भाई अनुराग चौरसिया के नाम पर संपत्तियां खरीदी जाने और उन संपत्तियों से संबंधित भुगतान एवं प्रबंधन के दस्तावेज भी प्राप्त हुए।
रानू साहू
रानू साहू संबंधित अवधि में कोरबा एवं रायगढ़ जिलों में कलेक्टर के पद पर पदस्थ थीं। विवेचना में सूर्यकांत तिवारी द्वारा संचालित कोयला लेवी की व्यवस्था में उनकी सहभागिता और उन्हें अवैध रकम प्राप्त होने के तथ्य सामने आए। कोरबा जिले में 25 रूपये प्रति टन के अतिरिक्त 2 रूपये प्रति टन के अतिरिक्त लेवी के माध्यम से भी इनके द्वारा लाभ प्राप्त किया गया। आगे की विवेचना में इस रकम के निवेश तथा उनके परिवारजनों के नाम पर संपत्तियां खरीदे जाने से संबंधित दस्तावेज मिले। संपत्ति खरीदी, नकद भुगतान, बैंकिंग लेन-देन एवं ऋण के रूप में रकम के निवेश में रानू का भाई पीयूश भी शामिल था। डायरी में आरएस नाम से रकम के लेन देन की इंट्री थी।
समीर विश्नोई
समीर विश्नोई तत्कालीन खनिज के संचालक थे। 15 जुलाई 2020 को उनके द्वारा जारी आदेश से कोयले का ऑनलाइन ई-परमिट जारी होने से पहले संबंधित जिला खनिज अधिकारी द्वारा डीओ का परीक्षण और अनुमोदन आवश्यक कर दिया गया। ई-परमिट ऑनलाइन जारी होने की व्यवस्था बनी रही लेकिन उसके पहले जिला स्तर की स्वीकृति अनिवार्य होने से परिवहनकर्ताओं को अपने डीओ जिला खनिज कार्यालय में प्रस्तुत कर अनुमोदन प्राप्त करना पड़ता था।
इसी प्रक्रिया के दौरान सूर्यकांत तिवारी पक्ष से जुड़े व्यक्तियों द्वारा 25 रुपये प्रति टन की रकम मांगी जाती थी और भुगतान होने के बाद अनुमोदन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती थी। परिवहनकर्ताओं के रकम नहीं देने पर डीओ रोकने और कोयला परिवहन में रुकावट पैदा की जाती थी। समीर विश्नोई द्वारा ऊपर से प्राप्त दबाव एवं निर्देश के अनुसार शासन स्तर का अनुमोदन प्राप्त किए बिना यह आदेश जारी किया गया।