NIT रायपुर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से झटका, कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश रद्द
समझें क्या है पूरा मामला
- बिना नोटिस ब्लैकलिस्टिंग पर हाईकोर्ट की रोक
- NIT रायपुर को हाईकोर्ट से बड़ा झटका
- कंपनी को सुनवाई का मौका देना जरूरी
- ब्लैकलिस्टिंग को कोर्ट ने बताया गंभीर कार्रवाई
- पुराने नोटिस से नहीं हो सकती कार्रवाई
Bilaspur। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने NIT रायपुर को बड़ा झटका देते हुए एक कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी भी कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने से पहले उसे स्पष्ट कारण बताओ नोटिस देना और अपना पक्ष रखने का मौका देना जरूरी है। सिर्फ काम के दौरान हुई कमियों को लेकर दिए गए सामान्य नोटिस को ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने NIT रायपुर के 19 दिसंबर 2025 के आदेश को निरस्त कर दिया। यह मामला इंदौर की कामथेन सिक्योरिटी सर्विस से जुड़ा है, जिसे NIT रायपुर में सुरक्षा और हाउसकीपिंग सेवाओं का ठेका मिला था।
एक साल के लिए किया गया था ब्लैकलिस्ट
कामथेन सिक्योरिटी सर्विस ने फरवरी 2024 से फरवरी 2025 तक NIT रायपुर में सेवाएं दी थीं। कंपनी का कहना था कि काम के दौरान उसके कई बिलों का भुगतान लंबित रहा। इसके बावजूद NIT रायपुर ने दिसंबर 2025 में कंपनी को एक साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया।
कंपनी को इस कार्रवाई की जानकारी करीब आठ महीने बाद मिली, जब एक दूसरे टेंडर में प्रतिस्पर्धी कंपनी ने उसके खिलाफ आपत्ति दर्ज कराई। इसके बाद कंपनी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पुराने नोटिस को नहीं माना गया ब्लैकलिस्टिंग का आधार
हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि अनुबंध के दौरान काम में कमी को लेकर दिए गए नोटिस अलग विषय हैं। उन्हें ब्लैकलिस्टिंग से पहले जारी किया गया विशेष शो-कॉज नोटिस नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी संस्था को किसी कंपनी के खिलाफ इतनी गंभीर कार्रवाई करनी है, तो उसे पहले साफ तौर पर बताना होगा कि उसे ब्लैकलिस्ट क्यों नहीं किया जाए। इसके बाद कंपनी को जवाब देने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
ब्लैकलिस्टिंग को कोर्ट ने बताया गंभीर कार्रवाई
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी को ब्लैकलिस्ट करना उसके भविष्य के कारोबार पर सीधा असर डालता है। सरकारी टेंडर में भाग लेने और नए काम हासिल करने के रास्ते बंद हो सकते हैं। इसलिए इसे "सिविल डेथ" जैसी गंभीर कार्रवाई माना गया है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संस्था को कार्रवाई करने से रोका नहीं गया है। अगर नियमों के अनुसार उचित प्रक्रिया अपनाई जाती है तो आगे कार्रवाई की जा सकती है।
कंपनी ने उठाया था भुगतान में देरी का मुद्दा
याचिकाकर्ता कंपनी ने कोर्ट में बताया कि NIT रायपुर की ओर से नवंबर 2024 में GST और श्रम भुगतान से जुड़े मुद्दों को लेकर पत्र जारी किए गए थे। कंपनी ने इन मामलों पर जवाब दिया था और लंबित भुगतान जारी करने का अनुरोध किया था।
कंपनी का दावा था कि अनुबंध खत्म होने के बाद अचानक ब्लैकलिस्टिंग का आदेश जारी किया गया, जबकि उसे इस कार्रवाई से पहले कोई मौका नहीं दिया गया।
हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अब सरकारी संस्थानों को किसी भी कंपनी के खिलाफ ब्लैकलिस्टिंग जैसी कार्रवाई करने से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना होगा।
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