रायपुर बार एसोसिएशन चुनाव पर पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक, पुरुषों को 50% आरक्षण बना विवाद की वजह
रायपुर में प्रस्तावित जिला बार एसोसिएशन चुनाव को लेकर कानूनी विवाद सामने आया है। 17 अप्रैल को होने वाले इस चुनाव पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। यह फैसला उस याचिका पर सुनवाई के बाद आया, जिसमें पुरुषों को 50% आरक्षण दिए जाने को चुनौती दी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
जिला बार एसोसिएशन, रायपुर के चुनाव के लिए निर्वाचन अधिकारी द्वारा पुरुषों के लिए 50 प्रतिशत पद आरक्षित करने का निर्णय लिया गया था। इस फैसले ने अधिवक्ताओं के बीच विवाद खड़ा कर दिया, खासकर महिला वकीलों ने इसे असंवैधानिक बताते हुए विरोध किया।
कोर्ट में क्या हुआ?
इस मामले की सुनवाई जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने जिला बार एसोसिएशन के बायलॉज (नियमावली) में पुरुषों को आरक्षण देने के प्रावधान की जानकारी मांगी।
हालांकि, प्रतिवादी पक्ष (चुनाव अधिकारी) इस तरह के किसी स्पष्ट प्रावधान की जानकारी देने में असमर्थ रहे। इसके बाद कोर्ट ने चुनाव प्रक्रिया पर स्थगन आदेश (Stay Order) जारी कर दिया।
याचिकाकर्ता का पक्ष
इस मामले में याचिका दायर करने वाली महिला अधिवक्ता की ओर से पैरवी कर रही हमीदा सिद्दीकी ने कोर्ट को बताया कि संविधान और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए आरक्षण दिया जाना चाहिए।
योगमाया केस का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि महिलाओं के लिए कम से कम 30% आरक्षण का प्रावधान होना चाहिए। लेकिन मौजूदा चुनाव में महिलाओं को कोई आरक्षण नहीं दिया गया, बल्कि पुरुषों के लिए 50% आरक्षण तय कर दिया गया, जो न्यायसंगत नहीं है।
विवाद का मुख्य बिंदु
- महिलाओं के लिए आरक्षण की अनदेखी
- पुरुषों के लिए 50% आरक्षण का असामान्य निर्णय
- बायलॉज में इस प्रावधान का अभाव
आगे क्या?
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (CG High Court) के इस फैसले के बाद फिलहाल 17 अप्रैल को होने वाले चुनाव पर रोक लग गई है। अब इस मामले में अगली सुनवाई में यह तय होगा कि आरक्षण का ढांचा क्या होगा, चुनाव कब और किस प्रक्रिया के तहत होंगे।
निष्कर्ष
रायपुर बार एसोसिएशन चुनाव (Raipur Bar Association elections) में पुरुषों को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला विवाद का कारण बन गया है। हाईकोर्ट ने नियमों और संवैधानिक प्रावधानों की जांच पूरी होने तक चुनाव पर रोक लगाकर स्पष्ट संकेत दिया है कि प्रतिनिधित्व से जुड़े मामलों में प्रक्रिया की वैधता सर्वोपरि है। यह मामला अब न केवल बार एसोसिएशन के चुनाव तक सीमित है, बल्कि न्यायिक संस्थानों में लैंगिक समानता और आरक्षण नीति पर भी बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
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