100 करोड़ के कमीशन पर खाद्य विभाग घिरा, 5 साल से राशन दुकानदारों का हक अटका
समझें क्या है पूरा मामला
- 5 साल से बायोमेट्रिक कमीशन का भुगतान लंबित।
- करीब 100 करोड़ रुपए अटकने का दावा।
- प्रति क्विंटल 21 रुपए भुगतान का प्रावधान।
- POS और वेइंग मशीन के नाम पर समायोजन पर विवाद।
Raipur : छत्तीसगढ़ में गरीबों को मुफ्त राशन पहुंचाने वाले अब खुद अपने हक के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। मामला छोटा नहीं, करीब 100 करोड़ रुपए का है। आरोप सीधे खाद्य विभाग के अधिकारियों पर है। राशन दुकानदारों का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक थंब इंप्रेशन के जरिए करोड़ों हितग्राहियों को राशन दिया, लेकिन तय कमीशन आज तक नहीं मिला। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब केंद्र सरकार हर साल यह राशि भेजती रही, तो फिर दुकानदारों का पैसा आखिर गया कहां? मामले में फूड डायरेक्टर डॉ. फरीहा आलम का कहना है कि इसकी जांच करवाएंगे। किसी का हक नहीं मारा जाएगा।
5 साल से फाइलों में कैद भुगतान
प्रदेश में 14,040 शासकीय उचित मूल्य दुकानें संचालित हैं। इन्हीं दुकानों के जरिए 2.73 करोड़ लोगों तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली का खाद्यान्न पहुंचता है। नियम साफ है। बायोमेट्रिक सत्यापन कर राशन वितरण करने पर दुकानदारों को प्रति क्विंटल 21 रुपए का भुगतान किया जाना है। लेकिन राशन दुकानदार संघ का दावा है कि पिछले पांच वर्षों से यह भुगतान नहीं हुआ। कई बार मांग उठी, कई आवेदन दिए गए, लेकिन भुगतान की फाइल आगे नहीं बढ़ी।
हड़ताल में खुली विभाग की दलील
हाल ही में राशन दुकानदारों की हड़ताल के दौरान यह मुद्दा जोर-शोर से सामने आया। संघ ने बकाया भुगतान का हिसाब मांगा तो विभाग की ओर से बताया गया कि यह राशि POS मशीन और इलेक्ट्रॉनिक वेइंग मशीन उपलब्ध कराने में समायोजित कर दी गई। यहीं से विवाद और गहरा गया। दुकानदारों का कहना है कि विभाग अब नया बहाना बना रहा है, ताकि भुगतान से बचा जा सके।
मशीन का पैसा भी लिया, कमीशन भी रोका
राशन दुकान संचालकों का दावा है कि POS और वेइंग मशीन के लिए उनसे पहले ही प्रति मशीन करीब 25 हजार रुपए तक लिए जा चुके हैं। ऐसे में उसी मशीन के नाम पर बायोमेट्रिक वितरण का कमीशन काटने का तर्क समझ से परे है। दुकानदार पूछ रहे हैं कि अगर मशीन का भुगतान अलग लिया गया, तो फिर पांच साल का कमीशन किस नियम के तहत रोक दिया गया? यही सवाल अब पूरे मामले को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है।
संचालक तक पहुंची शिकायत
छग पीडीएस संचालक संघ के अध्यक्ष नरेश बाफना ने कहा है कि पूरे मामले की लिखित शिकायत खाद्य विभाग के संचालक को सौंप दी है। मांग की है कि केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाली राशि का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया जाए। यह भी बताया जाए कि पांच वर्षों में बायोमेट्रिक वितरण के लिए आई राशि किस मद में खर्च हुई। यदि भुगतान नहीं किया गया, तो जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
गरीबों की सेवा, दुकानदारों की अनदेखी
कोरोना काल से लेकर आज तक राशन दुकानदारों ने बिना रुके काम किया। गांव-गांव और शहर-शहर गरीबों तक खाद्यान्न पहुंचाया। हर वितरण से पहले अंगूठा लगवाया, रिकॉर्ड अपडेट किया और सरकारी व्यवस्था को मजबूत बनाया। लेकिन अब वही दुकानदार कह रहे हैं कि उनकी मेहनत की कमाई रोक दी गई। उनका आरोप है कि गरीबों के नाम पर योजनाओं का प्रचार खूब हुआ, लेकिन व्यवस्था संभालने वालों का हक दबा दिया गया।
अब सीधा सवाल
यह विवाद अब सिर्फ दुकानदारों के भुगतान तक सीमित नहीं है। मामला सरकारी वित्तीय पारदर्शिता का भी है। यदि केंद्र सरकार ने बायोमेट्रिक वितरण का भुगतान राज्य को दिया, तो लाभार्थी दुकानदारों तक वह राशि क्यों नहीं पहुंची? यदि राशि किसी दूसरी मद में समायोजित हुई, तो उसका वैधानिक आधार क्या है? अब सरकार को स्पष्ट जवाब देना होगा। क्योंकि सवाल सिर्फ 100 करोड़ रुपए का नहीं, बल्कि हजारों राशन दुकानदारों के भरोसे और सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है।
FAQ
- छत्तीसगढ़ राशन दुकानदारों का कितना पैसा अटका है?
राशन दुकानदार संघ का दावा है कि बायोमेट्रिक कमीशन का करीब 100 करोड़ रुपए का भुगतान 5 साल से लंबित है। - राशन दुकानदारों को बायोमेट्रिक वितरण पर कितना कमीशन मिलना था?
नियम के अनुसार राशन दुकानदारों को बायोमेट्रिक सत्यापन के जरिए राशन वितरण पर प्रति क्विंटल 21 रुपए भुगतान का प्रावधान है। - खाद्य विभाग ने भुगतान नहीं होने पर क्या सफाई दी है?
विभाग का कहना है कि बायोमेट्रिक कमीशन की राशि POS मशीन और इलेक्ट्रॉनिक वेइंग मशीन की व्यवस्था में समायोजित की गई है। मामले की जांच कराई जाएगी।
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