भ्रष्टाचारियों को CS का भी नहीं है डर, एक लाख आवेदन अटका दिए

VINAY VERMA | Sept 21, 2026, 15:31 IST
छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार ठप
छत्तीसगढ़ में आरटीआई आवेदनों के लंबित रहने का आंकड़ा सामने आया है। दो साल में 1 लाख से ज्यादा आवेदन अटके हैं। मुख्य सचिव के निर्देशों के बावजूद विभागों में जानकारी देने की रफ्तार धीमी है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में सबसे ज्यादा आवेदन लंबित हैं।

Raipur। छत्तीसगढ़ में सूचना का अधिकार कानून सरकारी दफ्तरों की फाइलों में उलझकर रह गया है। आम आदमी सरकार के कामकाज, खरीदी और खर्च का हिसाब मांग रहा है, लेकिन विभाग जानकारी देने में टालमटोल कर रहे हैं। दो साल में 1,00,679 आरटीआई आवेदन लंबित हैं। मुख्य सचिव विकासशील के लगातार निर्देशों के बावजूद अगर हालात नहीं बदल रहे हैं, तो सवाल उठता है कि आखिर विभागों में किसका दबदबा है? क्या लोक सूचना अधिकारी और विभागीय अफसरों के बीच ऐसा तालमेल बन गया है, जिसके चलते दस्तावेज आवेदकों तक नहीं पहुंच रहे?



CS के आदेशों का क्या हुआ?

मुख्य सचिव का पद संभालने के बाद ही आरटीआई की जानकारी समय पर नहीं मिलने की शिकायतें सामने आने लगी थीं। इसके बाद विभागों को तय समय में जानकारी देने के निर्देश दिए गए। कोर्ट से जुड़े मामले के बाद भी सख्ती दिखाई गई। फिर नोडल अधिकारी नियुक्त कर आरटीआई की निगरानी कराने का आदेश दिया गया। यानी व्यवस्था सुधारने के लिए एक के बाद एक निर्देश जारी हुए, लेकिन लंबित आवेदनों का आंकड़ा बता रहा है कि जमीनी स्तर पर इनका असर कितना हुआ।



एक लाख से ज्यादा आवेदन पेंडिंग

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में 69,463 आरटीआई आवेदन प्राप्त हुए। इनमें 49,054 लंबित रहे। वर्ष 2025-26 में 84,935 आवेदन आए और 51,625 पेंडिंग बताए गए। दोनों वर्षों को मिलाकर लंबित आवेदनों की संख्या 1,00,679 है। लोगों का अधिकार है कि वे सरकारी कामकाज की जानकारी हासिल करें, लेकिन जवाब में देरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रही है।



पंचायत विभाग में सबसे ज्यादा अड़चन

लंबित आवेदनों में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का आंकड़ा सबसे ज्यादा है। वर्ष 2024-25 में इस विभाग से जुड़े 39,614 आवेदन लंबित थे। स्कूल शिक्षा में 1,403, नगरीय प्रशासन में 1,042, वन में 726 और राजस्व में 721 आवेदन अटके रहे। ये आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण विकास से जुड़े कामकाज की जानकारी मांगने वाले आवेदकों को भी लंबे इंतजार का सामना करना पड़ रहा है।



दूसरे साल भी नहीं सुधरी स्थिति

वर्ष 2025-26 में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के 27,563 आवेदन लंबित बताए गए हैं। वन विभाग में 4,192, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति में 3,276 और स्कूल शिक्षा में 3,070 आवेदन पेंडिंग रहे। नगरीय प्रशासन, राजस्व और गृह विभाग में भी बड़ी संख्या में आवेदन लंबित हैं। जब अलग-अलग विभागों में एक जैसी शिकायतें सामने आती हैं, तो निगरानी और जिम्मेदारी तय करने की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।



खरीदी के दस्तावेजों पर सवाल

आरटीआई के जरिए लोग सरकारी खरीदी, भुगतान, निर्माण और योजनाओं का रिकॉर्ड मांगते हैं। ऐसे मामलों में दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सरकारी पैसे का इस्तेमाल कैसे हुआ। हालांकि हर लंबित आवेदन को भ्रष्टाचार से जोड़ना सही नहीं होगा, लेकिन खरीदी और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड रोकने या देरी करने की शिकायतों की गंभीरता से जांच जरूरी है। सवाल यह भी है कि लोक सूचना अधिकारी जानकारी नहीं मिलने की वजह क्या बताते हैं और प्रथम अपीलीय अधिकारी आवेदक को राहत क्यों नहीं दे पा रहे?



30 दिन की समय सीमा

सूचना का अधिकार कानून, 2005 के तहत सामान्य तौर पर 30 दिनों के भीतर जानकारी दी जानी चाहिए। जवाब नहीं मिलने पर आवेदक प्रथम अपील कर सकता है और जरूरत पड़ने पर राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटा सकता है। नियमों के बावजूद आवेदन लंबित रहना बताता है कि केवल आदेश जारी करने से व्यवस्था नहीं सुधर रही। जिम्मेदार अधिकारियों की निगरानी और नियमों के तहत कार्रवाई जरूरी है।



अब कार्रवाई की बारी

मुख्य सचिव के आदेशों के बाद भी अगर आरटीआई आवेदन अटके हैं, तो सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि विभागीय स्तर पर कहां रुकावट है। कितने आवेदन समय सीमा पार कर चुके हैं, कितने मामलों में प्रथम अपील हुई और कितने अधिकारियों पर कार्रवाई की गई? इन सवालों के जवाब के बिना सुशासन और पारदर्शिता के दावे अधूरे रहेंगे। आरटीआई का अधिकार कागज पर नहीं, जमीन पर लागू होना चाहिए।



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