श्री सीमेंट सवालों के घेरे में, मंजूरी से लेकर खनन तक आरोप

Rajesh Lahoti | Mar 31, 2026, 15:51 IST
CG Shree Cement Under Scrutiny Allegations Ranging Approvals Mining Operations
श्री सीमेंट संयंत्र को लेकर खनन, मंजूरी और पर्यावरण नियमों के उल्लंघन के आरोपों में नई जांच शुरू हो गई है। उत्पादन क्षमता बढ़ाने के बाद खदानों की उपलब्धता पर सवाल उठ रहे हैं।

RAIPUR : छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार-भाटापारा जिले के खपराडीह स्थित श्री सीमेंट प्लांट एक बार फिर सवालों के केंद्र में आ गया है। इस बार मामला सिर्फ पर्यावरण मंजूरी का नहीं, बल्कि पूरी परियोजना की पारदर्शिता, खनन व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। लोकसभा में उठे एक सवाल ने इस पूरे प्रकरण को नए सिरे से चर्चा में ला दिया है।



जितना कच्चा माल नहीं, उससे ज्यादा मंजूरी कैसे

2019 में कंपनी को क्लिंकर उत्पादन क्षमता 5.2 मिलियन टन से बढ़ाकर 13.5 मिलियन टन और सीमेंट उत्पादन 6 मिलियन टन से बढ़ाकर 16.5 मिलियन टन प्रतिवर्ष करने की मंजूरी दी गई। साथ ही वेस्ट हीट रिकवरी प्लांट, कैप्टिव पावर प्लांट और सिंथेटिक जिप्सम यूनिट के विस्तार को भी हरी झंडी दे दी गई। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कंपनी के पास खुद के अनुसार सिर्फ 13 मिलियन टन चूना पत्थर उपलब्ध था, तो इतनी बड़ी क्षमता बढ़ोतरी का आधार क्या था? क्या यह महज कागजी गणित था या फिर इसके पीछे कोई बड़ा खेल छिपा है?



खदानों का सहारा या बाद में जोड़ा गया तर्क

सरकार की ओर से सफाई दी गई है कि चूना पत्थर की आपूर्ति सेमराडीह, भरूवाडीह और करही-चांदी खदानों से की जानी है, जिन्हें 2020 में पर्यावरण मंजूरी दी गई थी। लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि जब 2019 में ही उत्पादन बढ़ाने की मंजूरी दी गई, तो क्या उस समय इन खदानों की उपलब्धता पूरी तरह सुनिश्चित थी? या फिर बाद में इसे “एडजस्ट” किया गया?





पारदर्शिता पर पर्दा

मामला सिर्फ मंजूरी तक सीमित नहीं है। 2024-25 के पर्यावरणीय अनुपालन से जुड़े आंकड़े सार्वजनिक न होने की बात भी सामने आई है। यह सवाल खड़ा करता है कि क्या जरूरी जानकारियां जानबूझकर छिपाई जा रही हैं? हालांकि मंत्रालय का दावा है कि डेटा अपलोड करना अनिवार्य है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसकी उपलब्धता को लेकर संदेह बना हुआ है।



निरीक्षण में खुली पोल, जुर्माना ठोका

जनवरी 2025 में निरीक्षण के दौरान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने संयंत्र के को-प्रोसेसिंग यूनिट में गड़बड़ियां पाई थीं। इसके चलते इन हिस्सों को बंद करने के निर्देश दिए गए।सिर्फ इतना ही नहीं, पर्यावरण नियमों के उल्लंघन पर कंपनी पर 14.2 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। पिछले कुछ वर्षों में इस परियोजना के खिलाफ शिकायतें भी दर्ज हो चुकी हैं।



क्या सिस्टम ने आंखें मूंदी

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी परियोजना में मंजूरी से लेकर संचालन तक कहीं न कहीं सिस्टम की अनदेखी या मिलीभगत रही है? फिलहाल यह मामला सिर्फ सवालों तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में बड़े खुलासों की आशंका भी जताई जा रही है। अगर जांच गहराई से हुई, तो यह मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित न रहकर पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर सकता है।





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