छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: आस्था की आड़ में राजनीति, जंगल से सिस्टम तक सब मैनेज
छत्तीसगढ़ चिट्ठी में इस हफ्ते बहुत कुछ है। कोरबा में भक्ति के मंच पर भी राजनीति का कब्जा दिखा, जहां कथा कम और ताकत की नुमाइश ज्यादा हुई। नक्सलवाद के खात्मे को लेकर दिल्ली में आत्मविश्वास और राज्य की सियासत में आरोप-प्रत्यारोप का खेल चलता रहा।
सोशल मीडिया पर दो पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और रमन सिंह पुरानी कटिंग और सबूतों की लड़ाई में उलझ गए। बिना बात राजनीतिक माहौल ऐसा गरमाया कि पुराने जख्म सामने आ गए।वहीँ, चार साल बाद हुई कार्रवाई ने 2200 करोड़ के शराब सिंडिकेट की परतें खोलीं, तो हसदेव में जंगल कटाई पर सच भी सरकारी फाइलों के हिसाब से बदलता नजर आया।
दूसरी ओर संसद में शिक्षा के नाम पर फर्जी स्कूलों का कारोबार खुला, जहां फीस असली और मान्यता नकली निकली। वहीं जोगी कांग्रेस के सुप्रीमो अमित जोगी को लेकर जग्गी हत्याकांड का फैसला आया। यह हफ्ता बताता है कि प्रदेश में मुद्दे बदलते हैं, लेकिन सिस्टम की कार्यशैली वही पुरानी रहती है।
आस्था में राजनीति का प्रसाद
छत्तीसगढ़ में इस हफ्ते सबसे दिलचस्प दृश्य कोरबा से आया, जहां भक्ति के मंच पर राजनीति ने एंट्री मार ली। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा चल रही थी, लेकिन कथा से ज्यादा चर्चा “कौन मालिक” है, इस पर हो गई। कहानी कुछ यूं है।
कथा का मंच भक्ति का, लेकिन बैकस्टेज पूरी तरह सत्ता का। एक तरफ कांग्रेस नेता अमरजीत सिंह भगत और दूसरी तरफ बीजेपी के बसंत अग्रवाल। दोनों के समर्थक ऐसे भिड़े जैसे कथा नहीं, चुनावी सभा हो। अग्रसेन भवन में एंट्री को लेकर जो बहस शुरू हुई, वो देखते ही देखते धक्का-मुक्की में बदल गई।
भक्तों को लगा शायद हनुमंत कथा में आज लाइव महाभारत का भी प्रसारण हो रहा है। अब आरोपों का प्रसाद भी बांटा जा रहा है। किसने आयोजन किया, किसने कब्जा किया, और किसने पैसे लेकर एंट्री दिलाई। भक्ति में वीआईपी पास का नया अध्याय खुल गया है। छत्तीसगढ़ में अब कथा सिर्फ कथा नहीं रही, यह इवेंट और पॉलिटिकल मैनेजमेंट का संयुक्त प्रोजेक्ट बन चुकी है। यहां भगवान कम, बैनर ज्यादा दिखने लगे हैं।
नक्सली तारीखों में खत्म
दिल्ली की संसद और छत्तीसगढ़ की फिजां में एक ही लाइन गूंज रही थी-प्रूफ दूं क्या? नक्सलवाद पर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने दमदार भाषण दिया। नक्सलवाद के लिए जिम्मेदार कांग्रेस और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को जिम्मेदार ठहराया। एक बात तो है। बस्तर में अब शांति आ गई है। कोई माने या ना माने, लेकिन लोगों के मन से खौफ दूर हुआ है। यही कारण है कि अमित शाह ने भूपेश बघेल को लेकर कहा कि-अब नक्सल ख़त्म हो गया है प्रूफ दूं क्या?
इधर छत्तीसगढ़ के गृहमंत्री विजय शर्मा खुद मान रहे हैं कि उन्हें भी पहले इस डेडलाइन वाले नक्सल अंत पर भरोसा नहीं था। यानी दिल्ली में आत्मविश्वास, और रायपुर में पहले शक, फिर विश्वास वाला भाव। खैर, जो भी हो, प्रदेश की जनता के लिए, खासकर बस्तर वालों के लिए तो अच्छे दिन आ ही गए हैं।
सोशल मीडिया पर घमासान
नक्सलियों के खात्मे को लेकर जब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बयान पर कांग्रेस आक्रामक थी, तभी भूपेश बघेल ने अखबार की एक पुरानी कटिंग निकाली और ऐसा पेश किया जैसे इतिहास का छुपा हुआ अध्याय खोल दिया हो।
मतलब साफ़ था...नक्सलवाद सिर्फ जंगल में नहीं, सिस्टम में भी था। जवाब में रमन सिंह ने कहा-कटिंग नहीं, सबूत लाओ। यानि अब सियासत का पूरा खेल पेपर बनाम प्रूफ हो गया।
इसी बीच 2013 का झीरम घाटी हमला फिर से चर्चा में आ गया। हर बार की तरह यह घटना कम, राजनीतिक हथियार ज्यादा बन जाती है। वैसे देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद अब दो जगह सबसे ज्यादा सक्रिय है। एक जंगल में, दूसरा राजनीति में। वैसे जंगल का तो अब पता नहीं, लेकिन राजनीति में तो मौजूद है ही। कारण, राजनीति वाले नक्सलवाद में गोली नहीं चलती, सिर्फ आरोप चलते हैं।
चार साल बाद जागी ईमानदारी
छत्तीसगढ़ की डायरी में इस हफ्ते ईमानदारी ने लंबी नींद से उठकर अंगड़ाई ली और उठते ही 2200 करोड़ का हिसाब पूछने लगी। फर्क बस इतना है कि ये ईमानदारी अलार्म से नहीं, चार साल की देरी से जागी। ईओडब्लू और एसीबी ने 16 ट्रक जब्त कर लिए।
वो भी वही ट्रक, जो कभी अवैध शराब के हाईवे के हीरो हुआ करते थे। अब बेचारे ट्रक खड़े सोच रहे होंगे। जब दौड़ रहे थे तब कोई नहीं रोक रहा था, अब खड़े हैं तो पकड़ लिया। सबसे दिलचस्प किरदार इस कहानी में ट्रक नहीं, उनके मालिक हैं।
जांच में पता चला कि करोड़ों के ट्रक उन कर्मचारियों के नाम पर हैं, जिनकी सैलरी शायद ईएमआई के लायक भी नहीं होगी। यानी छत्तीसगढ़ में नौकरी छोटी होती है, लेकिन कागजों पर अमीरी बहुत बड़ी हो सकती है।
सबसे ज्यादा हैरानी इस बात पर है कि यह सिंडिकेट कोई रातों-रात नहीं बना। सालों तक शराब चली, पैसा घूमता रहा, सिस्टम देखता रहा और फिर अचानक एक दिन सबको याद आ गया-अरे, यहां तो घोटाला हो गया। अब कार्रवाई हो रही है, लेकिन ऐसे जैसे फिल्म खत्म होने के बाद ट्रेलर दिखाया जा रहा हो।
जंगल कम, फाइलें ज्यादा कट रहीं
छत्तीसगढ़ की अगर कोई स्थायी पीड़ा है, तो वो है हसदेव। यहां पेड़ ऐसे काटे जा रहे हैं जैसे घास। एक तरफ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग कहता है-ग्राम सभा फर्जी है। दूसरी तरफ एक एसडीएम कहते हैं-सब असली है। अब सवाल ये है कि सच कौन बोल रहा है? सच भी अब दो वर्जन में आने लगा है।
यह बात अलग है कि इस सच के दोनों फॉर्मेट ऑफिशियल ही है। इस बीच उद्योगपतियों की आरी लगातार चल रही है। पेड़ गिर रहे हैं, और हर गिरते पेड़ के साथ एक नया तर्क खड़ा हो जाता है-विकास जरूरी है। यहां विकास और विनाश के बीच की लाइन इतनी पतली हो गई है कि अब फर्क सिर्फ रिपोर्ट तय करती है।
अगर रिपोर्ट कहे असली, तो जंगल कटेगा। अगर रिपोर्ट कहे फर्जी, तो जांच चलेगी। जिन आदिवासियों के नाम पर ग्राम सभा होती है, वही सबसे ज्यादा असमंजस में हैं। वे सोचने पर मजबूर है -हमने मंजूरी दी थी या हमारे नाम पर दे दी गई?
फर्जी स्कूल, शिक्षा या स्कीम
इस हफ्ते शिक्षा ने खुद ही अपना रिपोर्ट कार्ड फाड़ दिया। सांसद ज्योत्सना महंत ने संसद में जो बताया, वो शिक्षा कम और एजुकेशन स्कैम ज्यादा लगा। राज्य में ऐसे स्कूल चल रहे हैं, जो खुद को सीबीएसई बताते हैं, लेकिन उनका सीबीएसई से रिश्ता वैसा है, जैसे दूर के रिश्तेदार। यहां फीस असली है। पूरी वसूली के साथ। मान्यता नकली है।
कागजों में एडजस्ट होकर।यहां बच्चे एडमिशन नहीं लेते, बल्कि लॉटरी खेलते हैं। किसी का भविष्य बन जाएगा, किसी का फंस जाएगा। छत्तीसगढ़ में अभिभावक अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेजने का सपना लेकर आते हैं, और सिस्टम उन्हें प्रयोगशाला में बदल देता है। किताबें नहीं, मान्यता नहीं, लेकिन फीस समय पर चाहिए। यह शिक्षा नहीं, सब्सक्रिप्शन मॉडल हो गया है।
लापरवाही आदत हो गई
रायपुर में तीन सफाईकर्मियों की मौत कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं, बल्कि दोहराई गई कहानी है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने नोटिस भेजा। जांच की बात कुछ आगे बढ़ी। बिना मास्क, बिना सुरक्षा, सीधे सेप्टिक टैंक में उतार दिया गया। यह गलती नहीं, सिस्टम की आदत है।
हर बार यही होता है। मौत होती है। जांच होती है। रिपोर्ट आती है और मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। देखा जाए तो छत्तीसगढ़ में सफाई कर्मी सिर्फ गंदगी नहीं साफ करते, वे सिस्टम की लापरवाही भी झेलते हैं। सबसे कड़वा सच यह है कि यहां मौत अचानक नहीं आती, उसे भेजा जाता है। बिना सुरक्षा, बिना तैयारी के।
अब सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद
इस हफ्ते चौकाने वाला फैसला आया। जोगी को रामावतार जग्गी हत्याकांड में दोषी ठहराया गया। यह कहानी किसी फिल्म से कम नहीं। पहले बरी, फिर अपील, फिर जांच, फिर वापसी, फिर फैसला। जग्गी परिवार के लिए यह 23 साल की तपस्या का फल है, लेकिन सिस्टम के लिए आईना भी।
इतने सालों में गवाह बदले, सरकारें बदलीं, हालात बदले… लेकिन उसके बावजूद फैसला हुआ। हालांकि अमित जोगी ने फैसले को लेकर अपने तर्क दिए है। अब वे इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। खैर, आगे क्या होगा इस बारे में ज्यादा तो कह नहीं सकते, लेकिन यह तय है कि इस मामले में आगे भी ख़बरों का बाज़ार गर्म रहेगा।
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