छत्तीसगढ़ की चिट्ठी : विवादों के बीच टूटता भरोसा, विश्वास की चल रही लड़ाई

छत्तीसगढ़ के हालिया घटनाक्रमों से विश्वास संकट की गहरी तस्वीर सामने आई है। प्रशासन से लेकर समाज और सरकारी भर्ती प्रणाली तक, हर मोड़ पर टूटते भरोसे की कहानी बयां हो रही है।

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Rajesh Lahoti
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Raipur. छत्तीसगढ़ में हफ्ते अब कैलेंडर से नहीं, विवादों से गिने जाते हैं। सोमवार को अगर खनन में मौत हो जाए, मंगलवार को गांवों में “प्रवेश वर्जित” के बोर्ड लग जाएं, बुधवार को भर्ती प्रक्रिया कोर्ट पहुंच जाए, गुरुवार को पेपर लीक की चर्चा हो और शुक्रवार को ऐसा फैसला आ जाए जिस पर पूरा समाज बहस करने लगे- तो समझ लीजिए यह सप्ताह किस तरह उठापटक वाला रहा है।

अगर आप इन घटनाओं को अलग-अलग खबर मानकर पढ़ेंगे तो आधी कहानी समझ आएगी। इन सबको जोड़कर देखिए, तो एक ही कहानी सामने आती है- भरोसा टूट रहा है। कहीं प्रशासन पर भरोसा टूटा है, कहीं समाज पर, तो कहीं सरकारी भर्ती सिस्टम पर। इस हफ्ते की डायरी असल में घटनाओं की सूची नहीं है- यह उस भरोसे की कहानी है जो हर मोड़ पर डगमगाता दिखाई देता है।

एसडीएम की गुंडागर्दी और भरोसे की लाश

सप्ताह की शुरुआत बलरामपुर से हुई और ऐसी हुई कि पूरे सिस्टम का चेहरा सामने आ गया। बाक्साइट के ट्रक रोकने और खनन की जांच करने प्रशासनिक टीम पहुंची। जांच के नाम पर एसडीएम करुण डहरिया पर आरोप लगा कि उन्होंने एक आदिवासी ग्रामीण को इतना पीटा कि उसकी मौत हो गई।

मामले में एसडीएम समेत चार लोग गिरफ्तार हुए। यह खबर पढ़कर पहली प्रतिक्रिया आती है- यह कैसा प्रशासन है। अफसर हैं या गुंडे? ये लोग कानून लागू कराने आए थे या खुद कानून तोड़ने? हां-ना के बीच कार्रवाई हुई, गिरफ्तारी हुई और अंत में वही बयान आया- “किसी को बख्शा नहीं जाएगा।”

यह वही वाक्य है जो हर बड़ी घटना के बाद बोला जाता है। लेकिन गांव वाले जानते हैं कि कार्रवाई और भरोसे के बीच बहुत लंबा फासला होता है। खनन क्षेत्र में विकास का मतलब अक्सर यही होता है- पहले मशीन आती है, फिर पुलिस आती है, फिर अफसर आते हैं, फिर नेता आते हैं और अंत में न्याय आता है… अगर आए तो।

बलरामपुर की घटना ने सिर्फ एक मौत नहीं दिखाई। इसने बताया कि जब प्रशासन पर भरोसा टूटता है तो गांव अपने तरीके ढूंढने लगता है।

प्रवेश वर्जित – लोकतंत्र का नया गेट पास सिस्टम

इस हफ्ते अदालत से भी बड़ा संदेश आया। छत्तीसगढ़ के कुछ क्षेत्रों के गांवों में लगे “प्रवेश वर्जित” बोर्डों पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया। मतलब बोर्ड लगे रहेंगे। अब छत्तीसगढ़ के कुछ गांवों में लोकतंत्र इस तरह चलता है।

देश कहता है- आप कहीं भी जा सकते हैं। गांव कहता है- पहले अनुमति लो। मामला धर्मांतरण से जुड़ा है। सबसे ज्यादा विवाद वहां हुआ जहां, ईसाई धर्मावलंबियों को गांवों में प्रवेश से रोके जाने के आरोप लगे।

ग्राम सभा कहती है- यह परंपरा है। प्रशासन कहता है- मामला संवेदनशील है। अदालत कहती है- फिलहाल यथास्थिति। “प्रवेश वर्जित” के बोर्ड असल में सिर्फ लकड़ी के बोर्ड नहीं हैं। यह भरोसा खत्म होने की तख्तियां हैं।

संदेश साफ है- जब सरकार सुरक्षा नहीं दे पाती, तो समाज अपनी सीमा खुद तय करता है।

मौत के बाद भी पहचान का सवाल

गांवों में प्रवेश का विवाद चल ही रहा था कि एक और मामला सामने आया- आदिवासी ईसाइयों के दफन स्थलों का। सुप्रीम कोर्ट ने कहा- दफनाए गए शव नहीं हटेंगे। यह आदेश सामान्य लगता है, लेकिन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। जब गांव तय करने लगे कि कौन अंदर आएगा और कौन नहीं, तो अगला सवाल यह होना ही था- कौन कहां दफन होगा!

छत्तीसगढ़ में अब पहचान का विवाद जीवन से आगे बढ़कर मृत्यु तक पहुंच गया है। पहले लोग पूछते थे- तुम कौन हो? अब पूछा जा रहा है- तुम मरोगे तो कहां जाओगे? यह वही समाज है जहां कभी एक साथ त्योहार मनते थे। अब अंतिम स्थान की जगह भी तय नहीं हो पा रही है।

नौकरी नहीं, अदालत का रास्ता

भरोसा तो युवाओं का सरकारी भर्तियों की प्रक्रिया से भी टूट गया है। आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे स्वास्थ्य विभाग के अफसर इतने घबराए हुए हैं कि 650 पदों की भर्ती का रिजल्ट घोषित करने से पहले ही कोर्ट पहुंच गए। साथ ही, अपने बचाव के लिए केविएट दाखिल कर दी।

छत्तीसगढ़ में भर्ती अब सरकारी प्रक्रिया नहीं, कानूनी प्रक्रिया बन चुकी है। पहले विज्ञापन निकलता है। फिर विवाद होता है। फिर कोर्ट जाते हैं। फिर इंतजार होता है और अंत में अभ्यर्थी ओवरएज हो जाते हैं।

सरकार कहती है- पारदर्शिता है। अभ्यर्थी कहते हैं- पिछली बार भी यही कहा था। उधर सिस्टम हर परीक्षा में इतना घालमेल कर चुका है कि अब उसे ख़ुद पर भी भरोसा नहीं रहा है।

पेपर लीक – प्रतिभा बनाम पहुंच

भरोसा टूटने का एक और उदाहरण राजस्व निरीक्षक परीक्षा है। इस हफ्ते ईओडब्ल्यू की जांच में पता चला कि पेपर परीक्षा से पहले ही लीक हो गया था। होटलों में बैठकर तैयारी हुई।

फार्महाउस में क्लास लगी और परीक्षा हॉल में भविष्य लिखा गया। 2600 अभ्यर्थियों की मेहनत थी। कुछ लोगों की सेटिंग थी और सिस्टम बीच में खड़ा था।

छत्तीसगढ़ में पेपर लीक अब ऐसा लगता है जैसे परीक्षा का अनौपचारिक चरण हो। जैसे बिना एडमिट कार्ड परीक्षा नहीं होती, वैसे बिना विवाद भर्ती नहीं होती।

बंदूक कम, अविश्वास ज्यादा

यही भरोसे का संकट बस्तर तक पहुंचता है। सरकार कहती है 2026 तक नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। वहीं इस हफ्ते बस्तर में मारे गए नक्सली कमांडर हिड़मा के महिमामंडन वाला गीत रैली में बजा। बहस शुरू हो गई।

कुछ बोले- गलत हो रहा है। कुछ बोले- प्रचार है। पुलिस प्रशासन चुपचाप देखता रहा। असल सवाल यह है- अगर व्यवस्था पर भरोसा मजबूत होता, तो क्या ऐसे गीत बजते?

बंदूक से लड़ी लड़ाई खत्म हो सकती है, लेकिन विचारधारा से लड़ी लड़ाई लंबी चलती है। बस्तर में असली लड़ाई अब जंगल से ज्यादा विचारधारा को बदलकर भरोसे जितने की है।

रेप पर हाईकोर्ट का फैसला

सप्ताह के अंत में हाईकोर्ट का फैसला आया। अदालत ने कहा- बलात्कार सिद्ध करने के लिए प्रवेश आवश्यक है, केवल स्खलन नहीं। कानून ने कहा- परिभाषा यही है। जनता ने अपनी बात कही। कोर्ट कानून से चला। पब्लिक भावना से चली। अदालत कहती है- प्रमाण चाहिए। जनता कहती है- संवेदना चाहिए। देखा जाए तो दोनों अपनी-अपनी जगह सही भी हैं।

होली- रंग से ज्यादा हिसाब

और आखिर में होली। इस बार ड्राय डे नहीं रहेगा। मतलब दुकानें खुलेंगी। राजस्व बढ़ेगा। सरकार खुश रहेगी। पुलिस सतर्क रहेगी और समाज वही करेगा जो हर साल करता है- पहले रंग, फिर बहस। ऐन एक बात तो तय हो गई है कि छत्तीसगढ़ में त्योहार भी राजस्व और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन बनाकर ही मनाए जाएंगे।

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