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Photograph: (the sootr)
News in Short
- छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बलात्कार और बलात्कार के प्रयास में अंतर स्पष्ट किया।
- जननांग प्रवेश का साक्ष्य न होने पर मामला बलात्कार का प्रयास माना गया।
- आरोपी को बलात्कार के बजाय बलात्कार के प्रयास का दोषी ठहराया गया।
- मेडिकल रिपोर्ट में जननांग प्रवेश का साक्ष्य नहीं था, इसलिए सजा में कटौती की गई।
- यह फैसला यौन अपराधों में साक्ष्य आधारित न्याय को बढ़ावा देता है।
News in Detail
BILASPUR. एक अहम और कानूनी तौर पर दूरगामी असर वाले फैसले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि पुरुष अंग को महिला के गुप्तांग के ऊपर रखा गया हो, लेकिन स्पष्ट प्रवेश सिद्ध न हो, तो इसे भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत “बलात्कार” नहीं माना जा सकता। ऐसी स्थिति में अपराध “बलात्कार की कोशिश” की श्रेणी में आएगा। यह फैसला न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की एकल पीठ ने 16 फरवरी को सुनाया, जिसमें निचली अदालत द्वारा दी गई धारा 376(1) की सज़ा को बदलकर धारा 376/511 (बलात्कार का प्रयास) में परिवर्तित कर दिया गया।
अदालत ने अपने आदेश में साफ कहा
“बलात्कार के अपराध के लिए पुरुष गुप्तांग का प्रवेश आवश्यक तत्व है, स्खलन इजैक्युलेशन नहीं। बिना गुप्तांग प्रवेश के केवल स्खलन होना बलात्कार नहीं, बल्कि बलात्कार का प्रयास है।” कोर्ट ने आगे कहा “धारा 376 के तहत दोषसिद्धि के लिए हल्का-सा प्रवेश भी पर्याप्त है, लेकिन यह स्पष्ट और ठोस साक्ष्यों से सिद्ध होना चाहिए कि आरोपी के अंग का कोई हिस्सा महिला के लैबिया (बाह्य जननांग) के भीतर गया था।”
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अश्लील हमला और बलात्कार की कोशिश के बीच फर्क समझना ज़रूरी है, और हर गंभीर आरोप स्वतः बलात्कार की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता जब तक कानूनी तत्व पूरे न हों।
मामला क्या था?
अभियोजन के अनुसार, 21 मई 2004 को आरोपी ने पीड़िता को जबरन घर ले जाकर उसके कपड़े उतारे, कमरे में बंद किया और यौन उत्पीड़न किया। धमतरी की अतिरिक्त सत्र अदालत ने आरोपी को धारा 376(1) (बलात्कार) और 342 (गैर-कानूनी बंधक बनाना) के तहत दोषी ठहराया था, लेकिन उच्च न्यायालय में अपील के दौरान गवाही और मेडिकल रिपोर्ट का गहन परीक्षण किया गया।
गवाही में विरोधाभास, मेडिकल रिपोर्ट निर्णायक
पीड़िता ने एक हिस्से में कहा कि गुप्तांग का प्रवेश हुआ, लेकिन अपनी ही गवाही के दूसरे हिस्से में बताया कि आरोपी ने लगभग 10 मिनट तक अंग ऊपर रखा, अंदर प्रवेश नहीं किया।
उधर मेडिकल रिपोर्ट में हाइमन सुरक्षित पाया गया। डॉक्टर ने “आंशिक प्रवेश” की संभावना जताई, पर स्पष्ट रूप से बलात्कार की पुष्टि नहीं की।
अदालत ने कहा कि जब गवाही में विरोधाभास हो और मेडिकल साक्ष्य स्पष्ट प्रवेश सिद्ध न करें, तो धारा 376 के तहत दोषसिद्धि कायम नहीं रह सकती।
सजा में क्या बदलाव हुआ?
उच्च न्यायालय ने आरोपी को धारा 376(1) के बजाय धारा 376/511 (बलात्कार की कोशिश) के तहत दोषी ठहराया। उसे 3 वर्ष 6 माह की सजा और 200 रुपये जुर्माना दिया गया। धारा 342 के तहत दोषसिद्धि बरकरार रखी गई। आरोपी को शेष सजा काटने के लिए ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि बलात्कार जैसे गंभीर अपराध में भी अदालतें भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि कानून में निर्धारित तत्वों और ठोस साक्ष्यों के आधार पर फैसला करती हैं। उच्च न्यायालय ने साफ कर दिया कि “पेनेट्रेशन” और “स्खलन” अलग कानूनी अवधारणाएं हैं, और बलात्कार सिद्ध करने के लिए प्रवेश का प्रमाण अनिवार्य है।
यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ माना जाएगा।
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