क्या बस्तर में शुरु होगी संसाधनों की नई जंग, आदिवासियों के सामने खड़े बड़े सवाल, क्या उनके होंगे जल,जंगल,जमीन

Arun Tiwari | Mar 30, 2026, 15:26 IST
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बस्तर में माओवादी गतिविधियों को समाप्त करने का दावा किया गया है। केंद्र और राज्य सरकार ने 31 मार्च 2026 तक माओवादी उन्मूलन की समयसीमा तय की है। लेकिन आदिवासी समाज के बीच जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।

Raipur. केंद्र और राज्य सरकार ने माओवादी गतिविधियों को पूरी तरह समाप्त करने के लिए 31 मार्च 2026 की समयसीमा तय की है। इस डेडलाइन के साथ ही छत्तीसगढ़ में सशस्त्र नक्सलवाद को खत्म करने का दावा किया जा रहा है। सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के बाद सरकार का कहना है कि बस्तर समेत सभी आदिवासी इलाकों में माओवादी आंदोलन अब टूट चुका है।



सरकार का यह भी दावा है कि माओवाद समाप्त होने के साथ ही बस्तर में शांति लौटेगी और विकास की रफ्तार तेज होगी। गांव-गांव में सड़क, बिजली, स्कूल, अस्पताल और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचेंगी। लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। आदिवासी समाज का एक बड़ा वर्ग इस बदलाव को लेकर चिंतित है। उनके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि माओवाद के बाद उनके जल, जंगल और जमीन का क्या होगा।



नई व्यवस्था और नए सवाल

नक्सल उन्मूलन अभियान के तहत बस्तर के दूर-दराज इलाकों में हर 3-5 किलोमीटर पर पुलिस और अर्धसैनिक बलों के कैंप स्थापित किए गए हैं। ऐसे में स्थानीय लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि माओवाद खात्मे के बाद क्या ये कैंप हटेंगे। और अगर नहीं हटे तो क्या लोग अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण और कानूनी तरीके से आवाज उठा पाएंगे।



कार्पोरेट की बढ़ती दिलचस्पी

बस्तर क्षेत्रफल में कई राज्यों से बड़ा है और खनिज संपदाओं से भरपूर है। यहां लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन, कोयला, चूना पत्थर और ग्रेनाइट जैसी बहुमूल्य संसाधनें बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। लंबे समय से बड़े कॉरपोरेट घरानों की नजर इन संसाधनों पर रही है।



हाल के वर्षों में खदानों के खुलने और प्रस्तावित परियोजनाओं की संख्या तेजी से बढ़ी है। रावघाट और आमदाई जैसे क्षेत्रों में खनन गतिविधियों के कारण स्थानीय लोगों को पहले से ही परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले का उदाहरण भी सामने रखा जाता है, जहां माओवादी प्रभाव कम होने के साथ ही खनन और औद्योगिक परियोजनाओं को तेजी से बढ़ाया गया।



स्थानीय लोगों के अनुसार इससे पर्यावरण को गंभीर नुकसान हुआ है। बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई, पहाड़ों का क्षरण और खनन से निकलने वाला प्रदूषण हवा और पानी दोनों को प्रभावित कर रहा है।



सदियों से चले संघर्ष की परंपरा

बस्तर में संघर्ष की परंपरा माओवाद से कहीं पुरानी है। 18वीं सदी के हल्बा विद्रोह से लेकर 1910 के भूमकाल आंदोलन तक आदिवासी समाज ने हमेशा बाहरी हस्तक्षेप और संसाधनों पर नियंत्रण के खिलाफ आवाज उठाई है। आजादी के बाद भी यह संघर्ष जारी रहा।



चाहे वह वन कानूनों के खिलाफ आंदोलन हो, जमीन अधिग्रहण का विरोध हो या बड़े बांध और खनन परियोजनाओं के खिलाफ जनआंदोलन, आदिवासी समाज ने लगातार अपनी लड़ाई जारी रखी। पिछले दशकों में बैलाडीला, लोहंडीगुड़ा और बोधघाट जैसी परियोजनाओं के खिलाफ लंबे संघर्ष हुए। कई मामलों में ग्राम सभाओं ने प्रस्ताव पारित कर परियोजनाओं का विरोध किया और कंपनियों को पीछे हटने पर मजबूर किया। इन आंदोलनों के दौरान मानवाधिकार उल्लंघन और दमन के आरोप भी सामने आए।



बस्तर का भविष्य

माओवाद के खात्मे के दावे के साथ बस्तर अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। एक ओर विकास, निवेश और बुनियादी ढांचे के विस्तार की उम्मीद है, तो दूसरी ओर आदिवासी समुदाय अपने अस्तित्व, अधिकार और पहचान को लेकर चिंतित है।



सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या विकास और सुरक्षा के नाम पर आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी होगी, या उन्हें इस प्रक्रिया में बराबरी से शामिल किया जाएगा।



बस्तर में नक्सलवाद का अंत हुआ है, लेकिन इसके बाद शुरू होने वाली कहानी - विकास बनाम अधिकार - कहीं ज्यादा जटिल और निर्णायक हो सकती है।



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