बिजली सुधारने वाली गाड़ियों की अब कैब जैसी होगी ट्रैकिंग, शिकायत मिलते ही टीम होगी अलर्ट, जीपीएस से खुलेगी लेटलतीफी की पोल
यानी शिकायत के बाद फॉल्ट सुधारने वाली गाड़ी कहां है, कितनी दूर है और टीम मौके पर पहुंची या नहीं, इसकी जानकारी डिजिटल सिस्टम से मिल सकेगी। कंपनी इसे पारदर्शिता और तेज सेवा से जोड़ रही है, लेकिन असली परीक्षा इस व्यवस्था के जमीन पर उतरने के बाद होगी।
शिकायत मिलते ही अलर्ट
टेंडर के तकनीकी प्रावधानों के मुताबिक, फ्यूज ऑफ कॉल (FOC) और रखरखाव से जुड़ी गाड़ियों में GPS आधारित व्हीकल ट्रैकिंग सिस्टम लगाना अनिवार्य होगा। इसे कंपनी के सेंट्रलाइज्ड कमांड सेंटर और प्रकाश मोबाइल ऐप से जोड़ा जाएगा। उपभोक्ता बिजली गुल होने या किसी फॉल्ट की शिकायत दर्ज कराएगा, तो सिस्टम संबंधित क्षेत्र की टीम और वाहन को अपने आप अलर्ट भेज सकेगा। इसके लिए हर बार कर्मचारी को फोन करके टीम तलाशने या शिकायत आगे बढ़ाने पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
अफसर देखेंगे गाड़ी की लोकेशन
इस सिस्टम के जरिए कॉल सेंटर के अधिकारी और इंजीनियर लाइव लोकेशन देख सकेंगे। शिकायत मिलने के बाद टीम कितनी देर में रवाना हुई, मौके पर कब पहुंची और सुधार कार्य पूरा करने में कितना समय लगा, इसकी निगरानी की जा सकेगी। अभी उपभोक्ताओं की बड़ी शिकायत यह रहती है कि बिजली बंद होने के बाद शिकायत तो दर्ज हो जाती है, लेकिन सुधार कब होगा, इसकी पक्की जानकारी नहीं मिलती। नई व्यवस्था लागू होने पर काम में देरी की जिम्मेदारी तय करने का रास्ता खुल सकता है।
कागजी दावों पर लगेगी लगाम?
कंपनी की योजना के मुताबिक, तय समय-सीमा के भीतर शिकायतों का निराकरण कराने और फील्ड स्टाफ की जवाबदेही बढ़ाने में डिजिटल निगरानी मदद कर सकती है। अगर सिस्टम सही तरीके से काम करता है, तो शिकायतों के निपटारे से जुड़े आंकड़ों की जांच करना भी आसान होगा। अधिकारी यह देख सकेंगे कि किस क्षेत्र में बार-बार फॉल्ट आ रहे हैं और कहां सुधार में ज्यादा समय लग रहा है। हालांकि, सिर्फ गाड़ियों की लोकेशन दिखने से बिजली आपूर्ति की समस्या खत्म नहीं होगी। इसके लिए कर्मचारियों, उपकरणों और जरूरी संसाधनों की उपलब्धता भी उतनी ही जरूरी है।
गांवों में नेटवर्क बनेगा चुनौती
इस हाईटेक व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती दूरदराज के इलाके हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ के कई ग्रामीण और वन क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की परेशानी रहती है। ऐसे में GPS आधारित निगरानी और ऐप पर रियल टाइम अपडेट कितने कारगर होंगे, यह बड़ा सवाल है। नेटवर्क कमजोर होने पर गाड़ी की लोकेशन और शिकायत की स्थिति समय पर अपडेट नहीं हुई, तो निगरानी का मकसद प्रभावित हो सकता है।
गाड़ी बंद तो सेवा ठप?
टेंडर में अलग-अलग जोन और सब-डिस्ट्रिक्ट स्तर पर वाहनों की उपलब्धता का प्रावधान है। लेकिन गाड़ी खराब होने, समय पर मरम्मत नहीं होने या वैकल्पिक वाहन नहीं मिलने की स्थिति में उपभोक्ता को फिर इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में पेनाल्टी लगाने का प्रावधान कितना प्रभावी होगा, यह उसके वास्तविक क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
जवाबदेही तय होगी या दावा?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नई तकनीक से बिजली विभाग की जवाबदेही वास्तव में बढ़ेगी? क्या शिकायतों के समाधान में देरी करने वालों पर कार्रवाई होगी? नेटवर्क नहीं होने या वाहन खराब होने पर वैकल्पिक व्यवस्था कितनी जल्दी मिलेगी? और क्या उपभोक्ता भी अपनी शिकायत की स्थिति आसानी से देख सकेंगे? ओला-उबर जैसी ट्रैकिंग का मॉडल आधुनिक जरूर है, लेकिन इसका फायदा तभी मिलेगा जब GPS की निगरानी के साथ समय पर कार्रवाई भी सुनिश्चित हो। वरना सिस्टम में गाड़ी की लोकेशन तो दिखेगी, लेकिन बिजली आने का इंतजार पहले जैसा ही रह सकता है।