छत्तीसगढ़ वन विभाग में बड़ा खेल! विधानसभा और RTI के आंकड़ों में भारी अंतर

Rajesh Lahoti | Apr 10, 2026, 15:05 IST
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छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों की मौतों का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। वन विभाग ने विधानसभा और आरटीआई में दिए गए आंकड़ों में बड़ा अंतर बताया है। विधानसभा में 38 हाथियों की मौत का जिक्र किया गया, जबकि आरटीआई में 36 मौतों की जानकारी दी गई हैं।

Raipur। छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों की मौत का मामला अब गंभीर सवालों के घेरे में है। एक ही समयावधि में वन विभाग ने विधानसभा और आरटीआई में जो जानकारी दी है उसमे काफी अंतर बताया गया है।



इतना ही नहीं विधानसभा में प्रस्तुत मौत के अंतर वाले दस्तावेजों को आरटीआई के तहत मांगने पर वन विभाग ने इसे देने से मना करते हुए कहा कि यह दस्तावेज प्रदान करना वन्यप्राणियों की सुरक्षा एवं वन्यप्राणी प्रबंधन रणनीति, गोपनीयता तथा शासन हित में नहीं है।



मौतों के आंकड़ो में अंतर इसलिए मांगी जानकारी

वन्य प्राणी विशेषज्ञ नितिन सिंघवी ने बताया कि विधानसभा में वन विभाग के दस्तावेजों के मुताबिक दिसंबर 2023 से जनवरी 2026 के बीच 38 हाथियों की मौत हुई, जबकि उन्हें सूचना के अधिकार में इसी अवधि के लिए बताया गया कि 36 हाथियों की मौतें हुईं।



(छत्तीसगढ़ वन विभाग विवाद )इसी प्रकार, इसी अवधि में विधानसभा को बताया गया कि 9 बाघ मरे और 562 वन्यप्राणियों की अस्वाभाविक मौत हुई, जबकि उन्हें सूचना का अधिकार के तहत बताया गया कि इस अवधि में केवल 2 बाघ और 39 वन्यप्राणियों का अवैध शिकार और तस्करी हुई है।



सिंघवी ने बताया कि जब दोनों डेटा में इतना अंतर है तो वे जानना चाहते थे कि बाकी के हाथी, बाघ और सैकड़ों जानवर अस्वाभाविक रूप से (अर्थात प्राकृतिक रूप से नहीं), कब मरे, कहां मरे, और कैसे मरे? क्या वे बिजली के करंट से, शिकार से या अन्य अस्वाभाविक कारणों से मरे हैं।



यह सारी जानकारी विधानसभा को दी जा चुकी है, परंतु वन विभाग मुख्यालय ने सूचना का अधिकार की धारा 8(1)(क) का हवाला देते हुए सूचना देने से मना कर दिया।



कैसे उड़ाई धारा 8(1)(क) की धज्जियां

सूचना का अधिकार की धारा 8(1)(क) के अनुसार वह सूचना नहीं दी जानी है, जिससे (अ) भारत की प्रभुता और अखंडता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़े, (ब) देश सहित सभी राज्यों एवं संघ राज्य क्षेत्रों की सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, (स) जिससे राज्य की रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित तथा



विदेश संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े, या (द) अपराध करने को उकसावा या प्रोत्साहन मिले। परंतु विभाग ने, चूंकि जानकारी नहीं देनी थी, इसलिए यह धारा लगाकर सूचना देने से मना कर दिया। विभाग ने यह भी नहीं बताया कि वन्यजीवों की मौत की जानकारी, जो कि विधानसभा को देकर सार्वजनिक कर दी गई है



एक नागरिक को देने से छत्तीसगढ़ की सुरक्षा, रणनीति, वैज्ञानिक या आर्थिक हित तथा विदेश संबंधों पर कैसे प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा या कैसे अपराध करने को उकसावा या प्रोत्साहन मिलेगा।



सवाल खड़े होते हैं

सिंघवी ने पूरे मामले पर बड़ा सवाल खड़ा कर कहा कि-जो जानकारी विधानसभा में सार्वजनिक रूप से दी जा चुकी है, वही जानकारी आरटीआई में अचानक गोपनीय कैसे हो गई? वही जानकारी अचानक कैसे वन्यप्राणियों की सुरक्षा एवं वन्यप्राणी प्रबंधन रणनीति, गोपनीयता तथा शासन हित में नहीं की गई?



क्या विभाग अपनी असफल हुई प्रबंधन रणनीति छुपा रहा है? विभाग को डर है कि 562 मौतों की विस्तृत जानकारी RTI में देने से उसकी पोल खुल जाएगी। यह साफ हो जाएगा कि विभागीय लापरवाही और अवैध शिकार ने कितने वन्यजीवों की जान ली है, और कितनी अधिकारियों की लापरवाही के कारण। इस पूरे मामले में यह भी सवाल उठता है



कि अगर विभाग की लापरवाही नहीं है, तो जानकारी देने से परहेज क्यों किया जा रहा है? और यदि जानकारी छुपाई जा रही है, तो यह आशंका और मजबूत होती है कि कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं, जिन्हें बदनामी के दर से सार्वजनिक होने से रोका जा रहा है।



छत्तीसगढ़ अब शिकारगढ़

पूरा छत्तीसगढ़ पिछले कुछ माह से शिकारगढ़ हो गया है। अन्य वन्यजीवों को छोड़ दें, तो 16 मार्च से 4 अप्रैल के बीच, सिर्फ 18 दिनों में 6 तेंदुओं की खाल जब्त की गई है। तेंदुआ मारा गया तभी तो खाल मिली। आशंका व्यक्त की जा रही है कि इनका शिकार हाल ही में हुआ है।



कवर्धा में 2, बलरामपुर में 2, फरसगांव में 1 और दंतेवाड़ा में 1 तेंदुए की खाल जब्त हुई है। दंतेवाड़ा में तो एक बाघ की खाल भी जब्त की गई, जिसका शिकार जनवरी 2026 में किया गया था।



जो लोग वन विभाग के लिए आवाज उठाते हैं, वो विभाग की नजर में खटकते हैं

पिछले कुछ समय से वन विभाग द्वारा महत्वपूर्ण सूचनाएं जानबूझकर नहीं दी जा रही हैं, ताकि लोगों की आवाज और उनके वैधानिक अधिकार को दबाया जा सके। उन्होंने सवाल उठाया कि जब वन्यजीवों के हित में बोलने वालों की आवाज ही दबा दी जाएगी, तो आखिर उनके संरक्षण और कल्याण की उम्मीद कैसे की जा सकती है?



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