बिजली बिल आधा करो, करप्शन खत्म करो... राज्योत्सव में पुलिस पंडाल बना जनता की आवाज का मंच, सरकार को सीधा संदेश
Raipur. छत्तीसगढ़ राज्योत्सव 2025 में इस बार पुलिस विभाग का पंडाल बाकी सभी प्रशासनिक पंडालों से अलग और सबसे आकर्षक नजर आया। यहाँ पुलिस विभाग ने एक अनोखा प्रयोग किया- “जनता की बात, आपकी पुलिस के साथ” नाम से 20 फीट लंबा व्हाइट बोर्ड लगाया गया, जहाँ आम नागरिकों को खुलकर अपनी बात लिखने का मौका दिया गया।
जनता ने लिखा सरकार को सीधा संदेश
कुछ ही घंटों में यह वॉल जनता की भावनाओं, शिकायतों और सुझावों से भर गई। लगभग 2000 से ज्यादा मैसेज इस बोर्ड पर दर्ज हुए। लोगों ने बिजली बिल, करप्शन, VIP कल्चर, नशा, अपराध और प्रशासनिक लापरवाही जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी।
कई लोगों ने लिखा-
- “बिजली बिल आधा करो”
- “VIP कल्चर खत्म करो”
- “नो टू करप्शन”
- “चाकूबाजी पर लगाम लगाओ”
युवाओं ने परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, बेरोजगारी पर रोक और नशे के खिलाफ सख्त कदम उठाने की मांग की।
शराबबंदी की मांग सबसे ज्यादा
व्हाइट बोर्ड पर लिखे संदेशों में “शराब बिक्री बंद करो” जैसे वाक्य कई बार नजर आए। जनता ने साफ तौर पर सरकार से राज्य में शराबबंदी लागू करने की अपील की। इसके अलावा, लोगों ने पुलिस से उम्मीद जताई कि वे सिर्फ कानून लागू करने वाली एजेंसी न बनें, बल्कि जनता की सच्ची साथी बनें।
जनता की सोच झलकी मैसेजों में
कई मैसेजों ने प्रशासन और जनता के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत पर जोर दिया। कुछ नागरिकों ने लिखा —
- “पुलिस आपके मित्र हैं, उन्हें सहयोग करें।”
- “पढ़ाई के साथ संविधान भी पढ़ें।”
- “हेलमेट चेकिंग का तरीका बदलो, जनता को समझाओ।”
- “लॉ एंड ऑर्डर में जनता की भागीदारी जरूरी है।”
अधिकारियों ने खुद पढ़े जनता के सुझाव
हर उम्र के लोगों ने रखी अपनी राय
“सेल्फी विद पुलिस” कॉर्नर, पुलिस बैंड परेड और साइबर जागरूकता स्टॉल ने बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों सभी को आकर्षित किया। छोटे बच्चों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक हर कोई “जनता की बात” बोर्ड पर जाकर अपनी बात लिखने के लिए उत्साहित था।
सिर्फ प्रदर्शनी नहीं, संवाद का मंच बना पंडाल
राज्योत्सव 2025 का यह पुलिस पंडाल सिर्फ एक प्रदर्शनी नहीं रहा, बल्कि एक लोक संवाद मंच बन गया। यहां जनता ने सरकार और पुलिस दोनों को यह साफ संदेश दिया - “हम सुरक्षित, भ्रष्टाचार-मुक्त और जवाबदेह छत्तीसगढ़ चाहते हैं।” यह पहल न केवल लोगों के विश्वास को बढ़ाती है, बल्कि शासन-प्रशासन को यह भी दिखाती है कि जनता अब चुप नहीं, बल्कि संवाद चाहती है।