छत्तीसगढ़ को स्वस्थ करने 15 दिन का स्पेशल अभियान, सबसे महत्वपूर्ण दवा ही निकली घटिया
Raipur : CGMSC Scam :सरकार “सही दवा-शुद्ध आहार” यही छत्तीसगढ़ का आधार का नारा देकर प्रदेशभर में 15 दिवसीय सघन जांच अभियान चला रही है। लेकिन घटिया दवा सप्लाई के मामले ने प्रशासनिक कसावट की पोल खोल दी है।
अब ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई अभियान का मकसद मरीजों की खोज करना और सुरक्षित दवा देना है? अगर ऐसा है तो अस्पतालों तक पहुंच रही दवाओं की गुणवत्ता पर कौन नजर रख रहा है?
15 दिन का विशेष अभियान
( दवा घोटाला) छत्तीसगढ़ स्वास्थ्य विभाग के सचिव स्तर से सभी कलेक्टरों को पत्र जारी कर 27 अप्रैल से 11 मई तक खाद्य और औषधि की सघन जांच के निर्देश दिए गए हैं।
इस अभियान में खाद्य सुरक्षा और दवा गुणवत्ता पर विशेष फोकस रखने की बात कही गई है। टीम गठित करने, रोजाना रिपोर्टिंग और सख्त निगरानी के निर्देश भी दिए गए हैं। यानी कागजों में पूरी व्यवस्था चौकस दिखाई दे रही है।
बेसिक मेडिसिन ही निकली घटिया
लेकिन इसी बीच छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कॉर्पोरेशन (CGMSC) के जरिए सप्लाई की गई एक दवा पर सवाल खड़े हो गए हैं।
दस्तावेज बताते हैं कि Ferrous Sulphate and Folic Acid (Red Color) नाम की दवा के एक बैच को गुणवत्ता परीक्षण में फेल पाया गया। यह वही दवा है जो आमतौर पर एनीमिया जैसी समस्याओं के इलाज में मरीजों को दी जाती है, खासकर महिलाओं और बच्चों के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है।
CGMSC दवा मंगवाएगी वापस
चौंकाने वाली बात यह है कि यह दवा पहले ही अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंच चुकी थी। बाद में जांच में इसे “सब-स्टैंडर्ड” यानी मानक से कम गुणवत्ता का पाया गया।
इसके बाद संबंधित बैच को वापस लेने के निर्देश जारी किए गए। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब तक दवा मरीजों तक पहुंच चुकी थी, तब तक कितने लोगों ने इसका सेवन कर लिया होगा?
सिस्टम की दोहरी तस्वीर
यह पूरा मामला सिस्टम की दोहरी तस्वीर दिखाता है। एक तरफ अभियान चलाकर जनता को भरोसा दिलाया जा रहा है कि उन्हें सुरक्षित दवा मिलेगी, दूसरी तरफ उसी दौरान घटिया दवा की सप्लाई सामने आ रही है।
इससे न सिर्फ मरीजों की सेहत पर खतरा बढ़ता है, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आ जाती है।
मरीज के इलाज को प्रभावित कर सकती है
विशेषज्ञों का कहना है कि दवा की गुणवत्ता में जरा सी भी कमी मरीज के इलाज को प्रभावित कर सकती है। खासकर आयरन और फोलिक एसिड जैसी दवाएं अगर सही स्तर की न हों, तो उनका कोई लाभ नहीं मिलता, बल्कि बीमारी लंबी खिंच सकती है।
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का
सवाल उठता है कि क्या सप्लाई से पहले गुणवत्ता की जांच नहीं हुई? अगर हुई, तो फिर फेल बैच अस्पतालों तक कैसे पहुंच गया? और अगर बाद में गड़बड़ी सामने आई, तो जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होगी?
पैरासिटामोल तक निकल चुकी है अमानक
सरकार के लिए यह मामला सिर्फ एक दवा तक सीमित नहीं है। यह पूरे सिस्टम की साख से जुड़ा हुआ है। क्योंकि पिछली 2 साल में दो दर्जन से अधिक दवाएं अमानक निकल चुकी हैं जिसमें गर्भवती माताओं से जुड़ी और
पैरासिटामोल जैसी दवाएं शामिल हैं। जब “सही दवा” का दावा किया जा रहा है, तो जमीनी हकीकत भी उसी दावे के अनुरूप होनी चाहिए। वरना अभियान सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाएगा और मरीजों की सेहत जोखिम में पड़ती रहेगी।
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