छत्तीसगढ़ की चिट्ठी: अफीम, अफसर और अफरा-तफरी ने मौसम ही नहीं मिजाज भी बदला

Rajesh Lahoti | Mar 21, 2026, 18:38 IST
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इस हफ्ते छत्तीसगढ़ में खबरें कम और घटनाएं सिलसिलेवार होती चली गई है। कहीं खेतों में मक्का, तरबूज और खरबूज के बीच अफीम उग आई, तो वहीँ 11 साल पहले हुए नसबंदी कांड का फैसला आया। इधर कुछ नेता तो अपने ही पुराने बयान से पलट गए।

कृषि का नया अवतार अफीम की खेती

छत्तीसगढ़ में बाहर झारखंड से आए किसान अब नवाचार में काफी आगे बढ़ चुके हैं। कम से कम खबरें तो यही कह रही हैं। बलरामपुर, दुर्ग और अब रायगढ़ जैसे तीन-तीन जिलों में अफीम की खेती पकड़ी गई। बलरामपुर में तो मामला इतना बढ़ गया कि 58 पटवारियों का ट्रांसफर एक झटके में हो गया।



लगता है अफीम सिर्फ खेत में नहीं, सिस्टम की नसों में भी उग आई थी। करोड़ों की अफीम जब्त हुई यानि खेती छोटी थी, लेकिन कमाई स्टार्टअप यूनिकॉर्न वाली। रायगढ़ में तो कमाल ही हो गया। तरबूज और ककड़ी के बीच अफीम पैदा कर दी यानी मिक्स क्रॉपिंग का नया मॉडल। किसान सोच रहे होंगे, अगर पकड़े गए तो सब्जी, नहीं तो सप्लाई।



सरकार अब ड्रोन से निगरानी कर रही है। मतलब अब खेत में सिर्फ किसान नहीं, आसमान से भी नजर रहेगी। अब लोग भी पूछने लगे हैं...अफीम उगी कैसे? बीज हवा से आए या सिस्टम ने खाद-पानी दिया?



शराब घोटाले में 29 अफसर

3200 करोड़ के शराब घोटाले में 29 अधिकारियों पर कार्रवाई की मंजूरी मिल गई। अब ईडी के पास ग्रीन सिग्नल है। दिलचस्प बात ये है कि फाइल मंत्रालय में लंबे समय तक आराम कर रही थी। जैसे ही मंजूरी मिली, अफसरों की धड़कनें तेज हो गईं। कुछ को तो पहले ही जमानत मिल गई यानि जेल जाने से पहले ही प्री-बुकिंग।



अब सवाल ये है कि इतने बड़े घोटाले में सिर्फ अफसर ही जिम्मेदार हैं या सिस्टम भी बराबर का भागीदार? क्योंकि छत्तीसगढ़ में घोटाले ऐसे होते हैं जैसे त्योहार हो, वह भी हर साल, पूरे उत्साह के साथ।



नाम बदला, बवाल खड़ा

रायगढ़ में एक बोर्ड बदला, और पूरा शहर इमोशनल अटैचमेंट मोड में चला गया। मामला सिर्फ नाम का नहीं था, इतिहास का था, पहचान का था और थोड़ा-बहुत राजनीति का भी, जो हर अच्छे मुद्दे में नमक की तरह खुद ही घुल जाती है। सेठ किरोड़ीमल… वो नाम जो रायगढ़ की शिक्षा की नींव में सीमेंट की तरह लगा हुआ है।



उसी नाम को हटाकर छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी कर दिया गया। अब टेक्नोलॉजी तो आ गई, लेकिन भावनाएं आउटडेटेड फाइल की तरह बाहर फेंक दी गईं। पूर्व छात्र ऐसे भड़के जैसे उनके कॉलेज का नाम नहीं, उनका खुद का सरनेम बदल दिया गया हो। सोशल मीडिया पर वीडियो, पोस्ट, अपील। सब चल पड़ा।



कुछ तो इतने भावुक हो गए कि लगे अभी जाकर बोर्ड खुद बदल देंगे। सबसे मजेदार सीन तब आया जब वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने तकनीकी शिक्षा मंत्री को चिट्ठी लिख दी...भाई, नाम वापस कर दो। चिट्ठी लिखना वाजिब भी है, क्योंकि मामला विधानसभा क्षेत्र का बन रहा है।



अस्पताल में मौत, सेप्टिक टैंक बना कब्र

रायपुर के जानेमाने रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल में तीन मजदूर टैंक में उतरे और जिंदा नहीं लौटे। यह खबर पढ़कर कोई हैरान नहीं हुआ, बस दुख हुआ। क्योंकि यह नई घटना नहीं, पुराना पैटर्न है। सेप्टिक टैंक अब सफाई की जगह कम और मौत का ट्रैप ज्यादा बन चुके हैं। हर बार कहानी वही होती है। मजदूर उतरे। गैस बनी। ऑक्सीजन खत्म और जिंदगी भी।



फिर शुरू होती है जांच, बयान, मुआवजा, और कुछ दिनों बाद सब नॉर्मल। सवाल वही पुराना। क्या उन्हें सुरक्षा किट दी गई थी? जवाब भी वही पुराना कि जांच के बाद पता चलेगा। असल में, हमारे सिस्टम में मजदूर की जान की कीमत इतनी कम है कि हर हादसे के बाद सिर्फ संवेदना बढ़ती है, सुरक्षा नहीं।



धर्मांतरण कानून पर केवल और केवल बहस

छत्तीसगढ़ विधानसभा में नया धर्मांतरण कानून आया और ऐसा लगा जैसे किसी ने राजनीतिक बटन दबा दिया हो। कानून तो कागज पर था, लेकिन बहस हवा में उड़ रही थी। सरकार का स्टैंड साफ-यह कानून जरूरी है, समाज की सुरक्षा के लिए है। विपक्ष का जवाब भी तैयार-इतनी जल्दी क्या है? थोड़ा सोच लेते।



नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत ने कहा-पहले से कई राज्यों में कानून है, सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है तो इतनी हड़बड़ी क्यों? उधर गृहमंत्री विजय शर्मा बोले-सब कानूनी प्रक्रिया से हुआ है, कोई जल्दबाजी नहीं है। वैसे दोनों पक्ष सही लगते हैं और दोनों ही एक-दूसरे को गलत साबित करने में भी लगे हैं। विधानसभा में वॉकआउट हुआ, आरोप-प्रत्यारोप हुए और दिन खत्म हो गया।



इस बीच कानून का असर क्या होगा ? उस पर कोई बात ही नहीं हुई। इसका जवाब कहीं फाइलों के बीच खो गया। यह पूरी बहस किसी टीवी डिबेट जैसी लगी। जहां एंकर चिल्लाता है, पैनलिस्ट चिल्लाते हैं और दर्शक सोचता है...आखिर मुद्दा क्या था?



अफसर ज्यादा, जनता गायब

छत्तीसगढ़ की 19 नदियों को बचाने के लिए सरकार ने कमेटी बनाई। सुनने में अच्छा लगा। नदी बचेगी, भविष्य बचेगा। फिर कमेटी की लिस्ट आई, जिसमें 7 सचिव, 1 वाइस चांसलर है। लेकिन जनता कहीं भी नहीं। हाईकोर्ट ने फाइल देखी और कहा-ये कमेटी है या मीटिंग का ग्रुप? कोर्ट ने साफ कहा-इतिहासकार जोड़ो, पर्यावरणविद जोड़ो, लेखक जोड़ो यानी जो नदी को समझते हैं, उन्हें भी जगह दो।



असल में अभी सिस्टम नदी को डेटा मान रहा है। कितने किलोमीटर। कितना पानी और कितना बजट , लेकिन नदी सिर्फ आंकड़ा नहीं होती। वो संस्कृति होती है, भूगोल होती है, इतिहास होती है। आज हालत यह है कि नदियों का उद्गम नाले के नाम पर दर्ज है। उसके किनारों पर कब्जा है और पानी धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है।



सरकार कह रही है-रिवाइवल प्लान बना रहे हैं। कोर्ट कह रहा है-पहले समझो, फिर प्लान बनाओ। यहां असली लड़ाई नदी और सूखे की नहीं है। यह लड़ाई फाइल बनाम फ्लो की है।



सिस्टम के मास्टरमाइंड

भारतमाला प्रोजेक्ट देश को जोड़ने का सपना है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस सपने के बीच जमीन का गणित ऐसा बैठाया गया कि खजाना खाली हो गया।मास्टरमाइंड कोई और नहीं तत्कालीन एसडीएम निर्भय साहू निकला। नाम से ही निर्भय। किसी का डर नहीं। जमीन को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटकर अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का बखूबी परिचय दिया, ताकि मुआवजा कई गुना बढ़ जाए।



अब यह सुनने में घोटाला लगता है, लेकिन असल में यह क्रिएटिव अकाउंटिंग और जमीन इंजीनियरिंग का कॉम्बो है। यानि एक ही जमीन से दो बार कमाई। यह सब अकेले नहीं हो सकता था। पटवारी, अफसर, बिचौलिए, मतलब पूरा सिस्टम टीमवर्क में लगा हुआ था।अब मास्टरमाइंड पकड़ा गया है, लेकिन सवाल अब भी खड़े होते हैं। क्या यह सिर्फ एक खिलाड़ी था? या पूरी टीम अभी भी फील्ड में है?



रजिस्ट्री से राहत

इतनी सारी निगेटिव खबरों के बीच एक पॉजिटिव अपडेट भी आया। रजिस्ट्री सस्ती हो गई। 0.60% सेस खत्म। अब 1 करोड़ की प्रॉपर्टी पर करीब 60 हजार की बचत। यह सुनकर आम आदमी ने पहली बार कहा-सरकार भी कभी-कभी जनता के बारे में सोचती है। सरकार को इससे करीब 150 करोड़ का नुकसान होगा, लेकिन फैसला ले लिया गया।



यह वही सिस्टम है जो आमतौर पर राजस्व बढ़ाने के लिए नए टैक्स ढूंढता है और इस बार टैक्स हटाने का फैसला लिया। अब सिस्टम थोड़ा डिजिटल और सरल होने की कोशिश कर रहा है। कुल मिलाकर, यह खबर रेगिस्तान में पानी जैसी है, लेकिन राहत जरूर देती है।



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