सोशल मीडिया पोस्ट पड़ी भारी, CISF जवान पर कार्रवाई को हाईकोर्ट ने माना सही
समझें क्या है पूरा मामला
CISF जवान की सजा पर हाईकोर्ट की मुहर
फेसबुक पोस्ट पड़ी भारी, राहत नहीं
सोशल मीडिया पर CISF जवान को झटका
हाईकोर्ट ने वेतन कटौती बरकरार रखी
विवादित पोस्ट पर हाईकोर्ट सख्त
Bilaspur। सोशल मीडिया पर की गई एक विवादित पोस्ट CISF के एक कांस्टेबल के लिए भारी पड़ गई। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विभाग द्वारा दी गई वेतन कटौती की सजा को सही ठहराते हुए स्पष्ट किया कि अर्द्धसैनिक बल जैसे अनुशासित संगठन में सोशल मीडिया का गैर-जिम्मेदाराना इस्तेमाल गंभीर अनुशासनहीनता माना जाएगा। अदालत ने कहा कि यदि विभागीय जांच निष्पक्ष तरीके से हुई है और कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिला है, तो न्यायालय ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
फेसबुक पोस्ट से शुरू हुआ विवाद
मामला उस CISF कांस्टेबल से जुड़ा है जिस पर जून 2020 में अपने फेसबुक अकाउंट से भारतीय सेना और पैरामिलिट्री बलों के खिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट साझा करने का आरोप लगा था। शिकायत मिलने के बाद विभाग ने नियमों के तहत जांच शुरू की और आरोपों की पुष्टि होने पर कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की।
जांच पूरी होने के बाद विभाग ने कांस्टेबल की वेतन वृद्धि का एक चरण (स्टेज) एक वर्ष के लिए संचयी प्रभाव के साथ रोकने की सजा दी। इस फैसले के खिलाफ कर्मचारी ने पहले विभागीय अपील की और बाद में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कर्मचारी ने कोर्ट में क्या दलील दी
याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि उसका उद्देश्य सेना या अर्द्धसैनिक बलों का अपमान करना नहीं था। उसने यह भी दावा किया कि विभाग यह साबित नहीं कर पाया कि संबंधित फेसबुक पोस्ट उसी ने अपलोड की थीं। इसके अलावा, उसने आरोप लगाया कि विभागीय जांच के दौरान उसे अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखने का पूरा अवसर नहीं मिला और दी गई सजा जरूरत से ज्यादा कठोर है।
विभाग ने रखा अपना पक्ष
विभाग की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित फेसबुक अकाउंट से 23 और 24 जून 2020 को कई आपत्तिजनक पोस्ट प्रकाशित हुई थीं। पूरे मामले में निर्धारित सेवा नियमों के अनुसार विभागीय जांच की गई, जिसमें कर्मचारी को नोटिस दिया गया, जवाब मांगा गया और सुनवाई का अवसर भी उपलब्ध कराया गया। विभाग का कहना था कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप रही।
हाईकोर्ट ने क्यों नहीं किया हस्तक्षेप
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में कोई ऐसी प्रक्रियागत त्रुटि सामने नहीं आई जिससे कार्रवाई को अवैध माना जाए। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा का अधिकार सीमित है। यदि जांच निष्पक्ष हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किया गया हो और सजा अत्यधिक मनमानी या असंगत न हो, तो अदालत विभागीय निर्णय में दखल नहीं दे सकती।
कोर्ट ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता को जांच के दौरान अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिला था, इसलिए प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन का तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अनुशासित बलों में सोशल मीडिया की जिम्मेदारी अहम
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सेना और अर्द्धसैनिक बल जैसे संगठनों की कार्यप्रणाली अनुशासन और आचरण पर आधारित होती है। ऐसे में सोशल मीडिया पर संस्थानों की छवि प्रभावित करने वाली गतिविधियां सेवा नियमों के विपरीत मानी जाती हैं। इसलिए विभाग द्वारा दी गई सजा को अनुचित या असंगत नहीं कहा जा सकता।
याचिका खारिज, विभागीय सजा बरकरार
सभी तथ्यों और दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने CISF कांस्टेबल की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने विभागीय कार्रवाई को वैध मानते हुए वेतन कटौती की सजा को बरकरार रखा। इस फैसले के साथ कोर्ट ने यह संदेश भी दिया कि सुरक्षा बलों के कर्मचारियों को सोशल मीडिया का उपयोग सेवा नियमों और अनुशासन की सीमाओं के भीतर रहकर करना होगा।
FAQ
- हाईकोर्ट ने किस मामले में फैसला सुनाया?
हाईकोर्ट ने फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट करने वाले CISF कांस्टेबल की वेतन कटौती की विभागीय सजा को बरकरार रखा। - कोर्ट ने सजा को सही क्यों माना?
कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच नियमानुसार हुई, कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला और सजा अनुचित नहीं थी। - इस फैसले का क्या संदेश है?
फैसला बताता है कि सुरक्षा बलों के कर्मियों को सोशल मीडिया का उपयोग सेवा नियमों और अनुशासन के अनुरूप करना होगा।
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