घर बैठे हैं बीजेपी में शामिल हुए कांग्रेस नेता, बस एक को मिली सांसदी

Arun Tiwari | Jun 19, 2026, 14:14 IST
कांग्रेस नेता बीजेपी में शामिल हुए
छत्तीसगढ़ में चुनाव के वक्त कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हुए अधिकांश बड़े नेता आज हाशिए पर हैं। सिवाय सांसद चिंतामणि महाराज के, बाकी किसी को सरकार या संगठन में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली।

RAIPUR : चुनाव के समय नेता पार्टी तो बदल लेते हैं लेकिन उनमें से अधिकतर को न माया मिलती है और न राम। छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के वक्त कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए नेता घर बैठे हैं। किसी ने टिकट कटने पर, किसी ने गुस्से में तो किसी ने टिकट मिलने के लालच में कांग्रेस को अलविदा कह अपने गले में बीजेपी का दुपट्टा डाल लिया।



इक्का दुक्का नेताओं को संगठन में छोटे मोटे पद को छोड़ दें तो अधिकांश नेता घर पर बैठे हैं। सरकार बने ढाई साल बीत गए हैं लेकिन किसी को न पहले चुनाव में टिकट मिली और न अब निगम,मंडल आयोगों में कोई पद। यहां तक कि संगठन में भी कोई बड़ा पद इनको नहीं मिला है। इन नेताओं में एक अपवाद जरुर है। इनको न सिर्फ लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारी मिली बल्कि वे जीतकर सांसद भी बन गए। बाकी सब दलबदलू नेता हाशिए पर हैं।



कांग्रेस छोड़ बीजेपी में गए नेता हाशिए पर :

चुनावी मौसम में दल-बदल भारतीय राजनीति का पुराना चलन रहा है। नेता अक्सर बेहतर राजनीतिक भविष्य, टिकट की उम्मीद या पार्टी नेतृत्व से नाराजगी के कारण पाला बदलते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में 2023 विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए कई नेताओं का राजनीतिक सफर उम्मीद के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पाया। राज्य में बीजेपी सरकार बने करीब ढाई साल हो चुके हैं, लेकिन उस दौर में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामने वाले अधिकांश नेता आज भी किसी बड़ी जिम्मेदारी का इंतजार कर रहे हैं।



विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने कांग्रेस के कई नेताओं को पार्टी में शामिल कराया था। इनमें कुछ पूर्व विधायक, पूर्व पदाधिकारी और क्षेत्रीय प्रभाव वाले चेहरे भी शामिल थे। उस समय माना जा रहा था कि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद इन नेताओं को संगठन, निगम-मंडल या आयोगों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलेगी। लेकिन अब तक ऐसा होता दिखाई नहीं दिया है। बीजेपी दावा करती है कि चुनाव के वक्त करीब 10 हजार नेता और कार्यकर्ता उनकी पार्टी में शामिल हुए थे।



एक को मिली सांसदी :

कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए एक नेता खुशनसीब रहे। कांग्रेस में लगातार दो बार विधायक रहे चिंतामणि महाराज का 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने टिकट काट दिया। जबकि इससे पहले वे 2013 और 2018 में विधायक रहे हैं। सिटिंग एमएलए होने के बाद भी उनका टिकट कटा जिससे वे नाराज हो गए। चिंतामणि महाराज लोकसभा का टिकट पाने के लिए बीजेपी में शामिल हो गए।



राजनीतिक परिस्थितियां देखते हुए बीजेपी ने उनको सरगुजा लोकसभा सीट से टिकट दे दिया। बीजेपी की लहर ऐसी चली कि चिंतामणि महाराज सांसद बन गए। बीजेपी उनके लिए लकी पार्टी साबित हुई। हालांकि उनकी लोकसभा टिकट के लिए कांग्रेस नेता टीएस सिंहदेव भी कोशिश कर रहे थे लेकिन उनके नसीब में तो सांसदी लिखी थी जो उनको बीजेपी से ही मिल सकती थी।



इनको माया मिली न राम :

कांग्रेस के कई बड़े पदों पर रहे नेता भी बीजेपी में शामिल हुए। उनके कांग्रेस छोड़ने के पीछे सबसे बड़ा कारण था उनको सम्मान न मिलना। एक तो कांग्रेस ने टिकट नहीं दी उपर से उनको महत्व भी नहीं मिला। पार्टी छोड़ने वालों में पूर्व विधायक, महापौर और संगठन के बड़े पदों पर बैठे नेता भी रहे। इनमें से इक्का दुक्का नेताओं को संगठन में पद मिल गया है। किसी को 360 सदस्यों वाली प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया है तो किसी को संभागीय प्रभारी बनाकर काम दे दिया गया है। बाकी बिना काम के अपने अपने हिसाब से अपनी सियासी नाव का चप्पू चला रहे हैं। विधानसभा, लोकसभा, नगरीय निकाय और पंचायतों के चुनाव हो चुके हैँ जिनमें टिकट मिला नहीं। निगम,मंडल,आयोग के पद भी बंट चुके हैं। हाथ में फूल के अलावा कुछ खास आया नहीं और अब आने वाले ढाई साल कोई उम्मीद भी नहीं है।



इनको मिले संगठन में पद :

संगठनात्मक पदों की सूची


  • राधिका खेड़ा : राधिका खेड़ा हालांकि दिल्ली की नेता हैं लेकिन उनका जिक्र इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उस वक्त उनको छत्तीसगढ़ का जिम्मा सौंपा हुआ था। उन्होंने यहां के कुछ नेताओं पर अपमान का आरोप लगा दिया और दिल्ली में बीजेपी का दुपट्टा पहन लिया। बीजेपी ने उनको कांग्रेस के खिलाफ बोलने के लिए रख लिया लेकिन कोई खास जिम्मेदारी नहीं दी।
  • चंद्रशेखर शुक्ला : किसान कांग्रेस के प्रमुख और संगठन के प्रभारी रहे चंद्रशेखर शुक्ला बीजेपी के कार्यकारिणी सदस्य हैं।
  • तुलेश्रर चंद्राकर : ओबीसी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे तुलेश्वर चंद्राकर को किसान मोर्चा में दुर्ग संभाग का प्रभारी बनाया गया है।
  • अभिषेक शुक्ला बिसालपुर संभाग प्रभारी बनाए गए हैं।

हाशिए पर ये दलबदलू नेता :


प्रमोद शर्मा - पूर्व विधायक


सफीरा साहू - पूर्व मेयर जगदलपुर


विधान मिश्रा - पूर्व विधायक


शिशुपाल सोरी - पूर्व विधायक


अरुण चौहान - पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष


सरला तिवारी - पूर्व बस्तर जिला महिला कांग्रेस अध्यक्ष


वाणी राव - पूर्व मेयर,बिलासपुर


चुन्नीलाल साहू - अकलतरा के पूर्व विधायक


अनीता रावटे - पूर्व प्रदेश अध्यक्ष महिला कांग्रेस


सीमा बघेल - भूपेश बघेल की भाभी


कमल झझ - पूर्व महिला अध्यक्ष जगदलपुर


यशवर्धन राव - पूर्व नेता प्रतिपक्ष,जगदलपुर नगर निगम


महेश देवांगन - अजीत जोगी के करीबी


अविरल सिंह - जोगी कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव



क्या कहते हैं नेता :

कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए नेता चंद्रशेखर शुक्ल कहते हैं कि यह जानना बहुत जरुरी है कि आखिर हम कांग्रेस छोड़ने पर मजबूर क्यों हुए। हम तो हमेशा संघर्ष करते रहे हैं और संघर्ष कर रहे हैं। इतनी बड़ी पार्टी में 360 कार्यकारिणी सदस्यों में शामिल होना भी बड़ी बात है। कांग्रेस के प्रदेश संचार प्रमुख सुशील आनंद शुक्ला कहते हैं कि जिस पार्टी ने मान,सम्मान और पद सब कुछ दिया उसी को बीजेपी के भरोसे छोड़ दिया। बीजेपी में किसी को कुछ नहीं मिलना। सत्ता के लालच में ये लोग बीजेपी में गए थे, अब ये घर के बचे न घाट के। कांग्रेस भी इनको वापस लेने के पहले 100 बार सोचेगी। बीजेपी के प्रवक्ता अमित चिमनानी कहते हैं कि पार्टी में शामिल होने वाले नेताओं को संगठन में पद दिए जा रहे हैं,बाकी सब कार्यकर्ता तो हैं ही।



निष्कर्ष :

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दल-बदल करने वाले नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती नई पार्टी में अपनी उपयोगिता साबित करना होती है। बीजेपी जैसी कैडर आधारित पार्टी में लंबे समय से काम कर रहे नेताओं और कार्यकर्ताओं की मजबूत दावेदारी रहती है। ऐसे में बाहर से आए नेताओं को तुरंत बड़ा पद मिलना आसान नहीं होता।



राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इनमें से कई नेताओं ने कांग्रेस में टिकट कटने, नेतृत्व से नाराजगी या बीजेपी से चुनाव लड़ने की उम्मीद में पार्टी बदली थी। कुछ नेताओं को भरोसा था कि बीजेपी उन्हें विधानसभा या लोकसभा चुनाव में मौका देगी, जबकि कुछ को सत्ता परिवर्तन के बाद राजनीतिक पुनर्वास की उम्मीद थी। हालांकि सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने संगठन और सरकार में अपने पुराने और समर्पित कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी, जिससे नए आए नेताओं की अपेक्षाएं पूरी नहीं हो सकीं।



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