सुप्रीम कोर्ट ने कड़क कर कहा, मिस्टर डीजीपी आपने अदालत से फ्रॉड कर मिसलीड किया

Arun Tiwari | Aug 27, 2026, 14:46 IST
छत्तीसगढ़ DGP को सुप्रीम कोर्ट की फटकार
छत्तीसगढ़ के हिरासत में मौत मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख सामने आया है। FIR में 2 साल 7 महीने की देरी और गलत हलफनामे पर कोर्ट ने DGP को जमकर फटकार लगाई है।

सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में एक हिरासत में मौत (custodial death) के मामले में राज्य पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सख्त रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) को पूरी तरह अक्षम बताया था।



अदालत इस बात से बेहद नाराज थी कि हिरासत में मौत के एक गंभीर मामले में FIR दर्ज करने में 2 साल और 7 महीने की देरी की गई। कोर्ट ने DGP से सवाल किया कि क्या हमें आपको ट्रेनिंग के लिए भेजने की जरूरत है।



इसके साथ ही बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखे गलत तथ्यों वाला हलफनामा दायर करने पर कोर्ट ने इसे सुप्रीम कोर्ट के साथ धोखाधड़ी बताया। सुप्रीम कोर्ट की फटकार के दौरान छत्तीसगढ़ की होम सेक्रेटरी निहारिका बारिक बगलें झांकने लगी और डीजीपी अरुणदेव गौतम ने कोर्ट से पांच बार माफी मांगी। यह सुनवाई 7 अगस्त को हुई, जिसमें DGP अरुणदेव, होम सेक्रेटरी और DG जेल वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़े थे।



सुप्रीम कोर्ट की डीजीपी को फटकार :

कोर्ट ने बेहद सख्त लहजे में कहा इस देश में हिरासत में मौत के मामले में 2 साल और 7 महीने बाद FIR दर्ज करने पर क्या हमें आपको किसी ट्रेनिंग के लिए भेजने की जरूरत है।



अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा हमें यह रिकॉर्ड करना होगा कि छत्तीसगढ़ के डीजीपी पूरी तरह से अक्षम हैं। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ का प्रशासन इस मामले को संभालने के लायक नहीं है।



जब यह पता चला कि डीजीपी ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट देखे बिना ही हलफनामा दायर कर दिया था, तो कोर्ट ने कहा, यह सुप्रीम कोर्ट के साथ धोखाधड़ी (fraud) है। कोर्ट ने आगे कहा आपने हर पहलू पर अदालत को गुमराह (mislead) करने की कोशिश की है।



सिर पर चोट की बात का जिक्र करते हुए कोर्ट ने पूछा क्या आपको सादे शब्दों में अंग्रेजी (plain English) समझ आती है। कोर्ट इस बात से नाराज था कि मौत का कारण अल्कोहल विड्रॉल बताया गया जबकि रिपोर्ट में कुंद वस्तु से सिर की चोट दर्ज थी।



जब डीजीपी ने कहा कि उन्हें न्यायिक रिपोर्ट नहीं मिली थी, तो कोर्ट ने पूछा, क्या वह रिपोर्ट हवा से मिली थी या जेल पहुँचने के बाद उसे श्रेडर में डाल दिया गया था। कोर्ट ने याद दिलाया कि वह रिपोर्ट डीजीपी के अपने हलफनामे का ही हिस्सा थी।



हिरासत में मौत के लिए 1 लाख रूपए के मुआवजे पर कोर्ट ने कहा यह देश में मानव जीवन की कीमत है? यह भयावह है।



डीजीपी ने अपनी सफाई में पेश की दलीले :

डीजीपी ने तर्क दिया कि कानून के तहत न्यायिक हिरासत में हुई किसी भी मौत के मामले में न्यायिक जांच अनिवार्य है। उन्होंने दलील दी कि पुलिस तब तक सीधे FIR दर्ज नहीं कर सकती जब तक कि न्यायिक जांच में यह पुष्टि न हो जाए कि मामला संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है।



डीजीपी ने बार-बार यह कहा कि पुलिस विभाग को दो साल तक न्यायिक जांच की रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई थी। उनके अनुसार यह रिपोर्ट जेल विभाग (सेंट्रल जेल बिलासपुर/डीजी जेल) को भेजी गई थी, पुलिस विभाग को नहीं।



उन्होंने अदालत को बताया कि मौत की प्रकृति (कि वह हत्या थी, दुर्घटना थी या आत्महत्या) को लेकर भ्रम था, जिसे स्पष्ट करने का काम न्यायिक जांच का होता है।



डीजीपी ने यह दलील भी दी कि उन्होंने पहले ही हाईकोर्ट के आदेशों का पालन करते हुए मुआवजे का भुगतान कर दिया था।



उन्होंने कोर्ट को सूचित किया कि संदर्भ मिलने के बाद अब 30 जुलाई को FIR दर्ज कर ली गई है। और एक राजपत्रित अधिकारी (gazetted officer) की टीम सीसीटीवी फुटेज की जांच कर रही है।



डीजीपी ने पांच बार मांगी माफी :

डीजीपी ने सुनवाई के दौरान 5 बार अलग-अलग बातो पर माफी मांगी। उन्होंने apologize शब्द का प्रयोग किया।



पहली बार: जब रिपोर्ट के सेंट्रल जेल बिलासपुर भेजे जाने और उसमें हुई देरी पर चर्चा हो रही थी, तब उन्होंने कहा I apologize sir



दूसरी बार: जब अदालत ने उन्हें बताया कि न्यायिक जांच रिपोर्ट जुलाई 2024 में ही जमा कर दी गई थी और उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी, तब उन्होंने कहा, I will just apologize for that



तीसरी बार: मामले में संदर्भ मिलने के बाद देरी से FIR दर्ज करने के संबंध में उन्होंने फिर से माफी मांगते हुए कहा sir I really apologize



चौथी बार: रिपोर्टों को लेकर पैदा हुए किसी भी भ्रम के लिए उन्होंने फिर से माफी मांगी, sir again I will apologize for any confusion



पांचवीं बार: जब अदालत ने उन्हें पूरी तरह अक्षम कहा तो उन्होंने अंत में कहा I m sorry sir but I just apologized for everything



सीबीआई के हवाले जांच :

सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में हुई मौत के इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी है। सीबीआई ने इसकी जांच भी शुरु कर दी है। पुलिस की हिरासत में 2024 में एक युवक की मौत हुई थी।



इस पर 2026 में एफआईआर हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आया कि कैदी के सिर पर कुंद वस्तु से मारा गया। कुछ जगह से खून भी निकल रहा था। इस मामले को लेकर उसका परिवार न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।



सुप्रीम कोर्ट ने जांच सीबीआई को सौंपने के साथ ही पीड़ितों को 25 लाख मुआवजा देने का फैसला भी सुनाया।



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