मूकबधिर रेप पीड़िता ने प्लास्टिक की गुड़िया के सहारे बताई आपबीती, हाईकोर्ट ने आरोपी को सुनाई बड़ी सजा
छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है, जहां मूक-बधिर युवती से दुष्कर्म के मामले में हाईकोर्ट ने आरोपी की सजा बरकरार रखते हुए उसे उम्रकैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि इशारों के माध्यम से दी गई गवाही भी पूरी तरह वैध और मजबूत साक्ष्य मानी जाएगी।
हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने आरोपी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा मूक-बधिर गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता, इशारों और संकेतों से दी गई जानकारी भी कानूनी मौखिक साक्ष्य है, यदि गवाही विश्वसनीय है, तो उसी आधार पर सजा दी जा सकती है। पीड़िता ने प्लास्टिक की गुड़िया के सहारे अपनी आपबीती बताई।
क्या है पूरा मामला?
घटना 29 जुलाई 2020 की है, जब बालोद जिले के अर्जुंदा थाना क्षेत्र में 20 वर्षीय मूक-बधिर युवती घर पर अकेली थी। इसी दौरान उसका रिश्तेदार नीलम कुमार देशमुख घर में घुसा और उसके साथ दुष्कर्म कर फरार हो गया। शाम को जब माता-पिता घर लौटे, तो युवती ने इशारों के माध्यम से पूरी घटना बताई और आरोपी की पहचान कराई। इसके बाद पुलिस ने IPC की धारा 376(2) और 450 के तहत मामला दर्ज कर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।
गवाही बनी सबसे मजबूत कड़ी
पीड़िता जन्म से ही बोल और सुन नहीं सकती थी, जिससे कोर्ट में गवाही दर्ज करना चुनौतीपूर्ण था। ट्रायल कोर्ट ने इसके लिए विशेष इंतजाम किए। साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट (दुभाषिए) की मदद ली गई, सवाल समझाने में कठिनाई होने पर प्लास्टिक की गुड़िया का उपयोग किया गया। पीड़िता ने इशारों और गुड़िया के माध्यम से घटना की पूरी जानकारी दी। कोर्ट ने गवाही दर्ज करने से पहले यह सुनिश्चित किया कि पीड़िता सवाल समझ सकती है और संकेतों से जवाब देने में सक्षम है।
मेडिकल और फॉरेंसिक सबूत
मामले में वैज्ञानिक साक्ष्य भी अहम रहे। पीड़िता के सैंपल और आरोपी के कपड़ों पर मानव शुक्राणु पाए गए। आरोपी इन सबूतों का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया। इन साक्ष्यों ने गवाही को और मजबूत किया।
ट्रायल कोर्ट से हाईकोर्ट तक
ट्रायल कोर्ट ने गवाही, दुभाषिए की पुष्टि और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर आरोपी को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने सजा को सही ठहराते हुए बरकरार रखा।
सजा क्या मिली
कोर्ट ने आरोपी को IPC धारा 376(2) के तहत मृत्यु तक उम्रकैद, IPC धारा 450 के तहत 5 साल की सजा, साथ ही 21 हजार रुपए का जुर्माना का फैसला सुनाया है।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला न्याय व्यवस्था के लिए एक मिसाल है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय केवल शब्दों पर निर्भर नहीं है, इशारों, संकेतों और व्यवहार के जरिए भी सच्चाई सामने लाई जा सकती है, दिव्यांग पीड़ितों को भी समान न्याय मिलना चाहिए। यह निर्णय उन सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां पीड़ित बोल या सुन नहीं सकते, लेकिन फिर भी न्याय पाने का अधिकार रखते हैं।
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