छत्तीसगढ़ डीजीपी बनने के बाद अशोक जुनेजा को मिले दो साल,अरुण देव को सिर्फ 8 महीने
RAIPUR: क्या एक राज्य में एक पद के लिए दो तरह के नियम लागू हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में इस सवाल का जवाब हां है। छत्तीसगढ़ में डीजीपी पद के लिए दो तरह के नियम अपनाए गए हैं। पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा को दो साल का कार्यकाल मिला जबकि पूर्णकालिक डीजीपी बनने के बाद अरुण देव गौतम को महज आठ महीने ही मिल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह गाइडलाइन दी थी कि डीजीपी का कार्यकाल दो साल का होना चाहिए। बीजेपी सरकार ने अरुणदेव गौतम के कार्यकाल की गणना उनके प्रभारी डीजीपी बनने की तारीख से कर ली। जबकि अशोक जुनेजा प्रभारी डीजीपी के बाद जब पूर्णकालिक डीजीपी बने थे तब उनको दो साल का कार्यकाल मिला और उसके बाद सर्विस एक्सटेंशन भी मिला।
अशोक जुनेजा को मिले 2 साल :
पूर्व डीजीपी अशोक जुनेजा को पूर्णकालिक डीजीपी बनाए जाने के बाद करीब दो साल का कार्यकाल मिला था। वे नवंबर 2021 में प्रभारी डीजीपी बनाए गए थे, लेकिन सितंबर 2022 में यूपीएससी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें नियमित डीजीपी नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्हें सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के मुताबिक दो साल का कार्यकाल मिला। इतना ही नहीं रिटायरमेंट के बाद उन्हें सेवा विस्तार भी दिया गया और वे फरवरी 2025 तक पद पर बने रहे। जुनेजा 10 महीने प्रभारी डीजीपी रहे और उसके बाद जब वे पूर्णकालिक डीजीपी बने तो उस तारीख से अगले दो साल तक वे इस पद पर बने रहे।
अरुण देव गौतम को 8 महीने :
वहीं दूसरी ओर अरुण देव गौतम के मामले में अलग स्थिति देखने को मिल रही है। उन्हें 4 फरवरी 2025 को प्रभारी डीजीपी बनाया गया था। अब मई 2026 में उन्हें पूर्णकालिक डीजीपी नियुक्त किया गया है। वे करीब 15 महीने प्रभारी डीजीपी रहे। उनका रिटायरमेंट दिसंबर 2026 में तय है। यानी पूर्णकालिक डीजीपी बनने के बाद उनके पास महज आठ महीने का कार्यकाल ही बचता है। यह इसलिए है क्योंकि उनके डीजीपी कार्यकाल की गिनती उनके प्रभारी बनने की तारीख से की गई है। यानी उनका दो साल का कार्यकाल उनके प्रभारी डीजीपी बनने से शुरु हो जाता है।
क्या कहती है सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन :
सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह केस में राज्यों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि डीजीपी की नियुक्ति मेरिट और वरिष्ठता के आधार पर हो तथा उन्हें कम से कम दो साल का निश्चित कार्यकाल दिया जाए। ताकि पुलिस प्रशासन राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रह सके। इसी गाइडलाइन के आधार पर कई राज्यों में डीजीपी को सुरक्षा अवधि दी जाती रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ में आईपीएस अरुण देव गौतम के मामले में सरकार ने उनके कार्यकाल की गणना प्रभारी डीजीपी बनाए जाने की तारीख से कर ली। यानी फरवरी 2025 से दिसंबर 2026 तक की अवधि को ही उनका कार्यकाल माना जा रहा है। जबकि अशोक जुनेजा के मामले में प्रभारी कार्यकाल को अलग रखते हुए पूर्णकालिक नियुक्ति के बाद दो साल की अवधि दी गई थी।
उठ रहे सवाल :
इसी अंतर को लेकर प्रशासनिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि अशोक जुनेजा को नियमित नियुक्ति के बाद दो साल का कार्यकाल मिल सकता है, तो फिर अरुण देव गौतम को वही लाभ क्यों नहीं दिया गया। इसे लेकर एक राज्य, एक पद, दो कानून जैसी चर्चाएं तेज हो गई हैं।
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