छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट : 434 दिन नौकरी से गायब रहने वाले कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी बरकरार
RAIPUR : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में 434 दिनों तक ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाले पुलिस कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी को सही ठहराया है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि वर्दीधारी बलों में अनुशासन सर्वोपरि होता है और इस तरह की लापरवाही को किसी भी स्थिति में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि ऐसे मामलों में सख्ती नहीं बरती गई, तो इससे पूरे बल की कार्यप्रणाली और अनुशासन पर बुरा असर पड़ेगा। यह फैसला जस्टिस राकेश मोहन पांडेय की सिंगल बेंच ने कॉन्स्टेबल नरेश कुमार नेताम द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुनाया। याचिकाकर्ता ने 2019 में जारी अपनी सेवा समाप्ति के आदेश को चुनौती दी थी।
हल्के में नहीं ली जा सकती अनुशासनहीनता:
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ऐसी अनुशासनहीनता, यदि बिना दंड के छोड़ दी जाए, तो यह बल के अनुशासन को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी। वर्दीधारी सेवाओं में इस प्रकार की लापरवाही को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस जैसे अनुशासित बल में कार्यरत कर्मचारी से उच्च स्तर की जिम्मेदारी और प्रतिबद्धता की अपेक्षा की जाती है।
ये है पूरा मामला :
नरेश कुमार नेताम की नियुक्ति नवंबर 2010 में कॉन्स्टेबल के पद पर हुई थी। उस समय उनकी पदस्थापना मैनपुर में थी। 10 जुलाई 2017 को उनका तबादला देवभोग किया गया और उसी दिन उन्हें रिलीव भी कर दिया गया। उन्होंने नए पदस्थ स्थान पर जॉइन नहीं किया और बिना अनुमति के अनुपस्थित रहे।
रिकॉर्ड के अनुसार, वे 7 जुलाई 2017 से 18 सितंबर 2018 तक कुल 434 दिनों तक ड्यूटी से गायब रहे। इस दौरान विभाग की ओर से उन्हें कई बार नोटिस भेजे गए लेकिन उन्होंने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया और न ही जांच प्रक्रिया में शामिल हुए। सितंबर 2018 में विभाग ने उनके खिलाफ कारण बताओ नोटिस और आरोप पत्र जारी किया।
27 अक्टूबर 2018 को नोटिस तामील कराया गया और 2 नवंबर 2018 को जांच अधिकारी के सामने उपस्थित होने के लिए कहा गया। लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। इसके बाद नवंबर 2018 से जनवरी 2019 के बीच उन्हें पांच बार और नोटिस भेजे गए, फिर भी उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। आखिरकार विभाग ने एकतरफा (एक्स-पार्टी) कार्रवाई करते हुए जांच पूरी की और फरवरी 2019 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। उनकी अनुपस्थिति की अवधि को ‘नो वर्क, नो पे’ के सिद्धांत के तहत दर्ज किया गया।
अपील और पुनरीक्षण भी खारिज :
बर्खास्तगी के बाद कॉन्स्टेबल ने विभागीय अपील दायर की। जिसे जुलाई 2020 में पुलिस महानिरीक्षक (IG) ने खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने पुलिस महानिदेशक (DGP) के समक्ष पुनरीक्षण याचिका (मर्सी पिटीशन) दायर की लेकिन अगस्त 2021 में वह भी खारिज कर दी गई।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कॉन्स्टेबल की ओर से अधिवक्ता जितेंद्र नाथ नंदे ने दलील दी कि उन पर लगाया गया दंड अत्यधिक और असंगत है। उन्होंने कहा कि विभागीय अधिकारियों को उनके पिता की बीमारी जैसी परिस्थितियों पर विचार करना चाहिए था। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि उन्हें पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया।
सरकार का पक्ष और कोर्ट की राय :
राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता ने कहा कि पूरी विभागीय प्रक्रिया का पालन किया गया था। आरोप पत्र जारी किया गया, जांच अधिकारी नियुक्त किए गए और सभी आवश्यक साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। बावजूद इसके याचिकाकर्ता ने न तो ड्यूटी जॉइन की और न ही जांच में सहयोग किया।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने के बाद माना कि यह गंभीर कदाचार का मामला है। अदालत ने कहा कि अनुशासित बल के सदस्य द्वारा लंबे समय तक बिना अनुमति अनुपस्थित रहना सेवा के प्रति घोर लापरवाही को दर्शाता है। ऐसे मामलों में बर्खास्तगी की सजा को न तो अत्यधिक कहा जा सकता है और न ही असंगत।
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