देश में 97 हजार हेक्टेयर जंगल खत्म, MP का 25 तो CG राजस्थान का 10% हिस्सा शामिल
समझें क्या है पूरा मामला
- 5 साल में 97 हजार हेक्टेयर जंगल खत्म
- इसमें मध्य प्रदेश का एक चौथाई हिस्सा
- छत्तीसगढ़ और राजस्थान का 10 फीसदी भाग शामिल
- विकास योजनाओं की भेंट चढ़े जंगल
देश की वन भूमि विकास की बहुत बड़ी कीमत चुका रही है। विकास 97 हज़ार हेक्टेयर जंगल को लील गया है। इसमें एक चौथाई भाग तो अकेले मध्य प्रदेश का है। इसके अलावा 10 फीसदी हिस्सा छत्तीसगढ़ और राजस्थान का है। सबसे ज्यादा जंगल खनन और सड़क के लिए काटे गए हैं।
विकास की यह कीमत इंसान की सांसें चुका रही हैं। कभी सड़क तो कभी पॉवर तो कहीं लोहा और एल्युमिनियम निकालने के लिए जंगल उजाड़े जा रहे हैं। यही हाल रहा तो लोगों का सांस लेना मुश्किल हो जाएगा।
विकास विकास लील गया जंगल :
देश में विकास परियोजनाओं की रफ्तार लगातार बढ़ रही है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कीमत जंगल चुका रहे हैं। पिछले पांच सालों में विकास कार्यों के लिए देशभर में करीब 97 हजार हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया गया है।
यह क्षेत्रफल कई बड़े शहरों के कुल क्षेत्रफल के बराबर है। चिंताजनक बात यह है कि इस कुल वन भूमि का लगभग एक चौथाई हिस्सा अकेले मध्य प्रदेश का है। जबकि छत्तीसगढ़ और राजस्थान का हिस्सा लगभग 10 फीसदी है। यह केंद्र सरकार के आंकड़े हैं।
इतनी वन भूमि का डायवर्सन :
विकास योजनाओं में खत्म हो रहे जंगल :
वन भूमि का सबसे अधिक उपयोग खनन परियोजनाओं, राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों, रेलवे लाइनों, बिजली परियोजनाओं, सिंचाई योजनाओं और औद्योगिक इकाइयों के लिए किया गया है। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और इन्फ्रास्ट्रक्चर के विस्तार की इस दौड़ में हर साल हजारों हेक्टेयर जंगल समाप्त हो रहे हैं।
इन कामों के लिए इतनी वन भूमि खत्म :
सड़क - 22233.44 हेक्टेयर
माइनिंग - 18913.64 हेक्टेयर
पॉवर लाइन - 13859.31 हेक्टेयर
रेलवे - 5957.68 हेक्टेयर
पेट्रोल पंप - 1926.86 हेक्टेयर
28 लाख पेड़ों की कटाई को मंजूरी :
विकास पर्यावरण पर बहुत भारी पड़ रहा है। खनन परियोजनाएं हरे-भरे जंगलों को खाती जा रही हैं। एक रिपोर्ट में सामने आया है कि पिछले तीन सालों में देश के अलग अलग राज्यों में 28 लाख पेड़ों को काटने की मंजूरी दी गई है, या फिर काटे गए हैं।
पेड़ों की कटाई के मामले में छत्तीसगढ़ का हसदेव पहले नंबर पर है। यहां हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने कोल परियोजना के लिए 4 लाख से ज्यादा पेड़ों को काटने की अनुमति दी है। यह देश में सबसे बड़ी कटाई का मामला माना जा रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार देश में जुलाई 2023 से मई 2026 के बीच वन भूमि पर स्थित 28 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई को मंजूरी दी गई है। यह आंकड़ा केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की विभिन्न समितियों के रिकॉर्ड में सामने आया है।
रिपोर्ट के मुताबिक पेड़ों की कटाई के लिए मंजूर कुल प्रस्तावों में से ज्यादातर खनन, जलविद्युत, ऊर्जा और पुनर्वास प्रोजेक्ट से जुड़े थे। कुल स्वीकृत कटाई का लगभग 90 फीसदी हिस्सा इन परियोजनाओं से ही संबंधित है। साथ ही वन भूमि डायवर्जन के प्रस्तावों को मंजूरी मिलने की दर 80 फीसदी से अधिक रही है।
निष्कर्ष :
पर्यावरण पर भारी विकास :
आर्थिक विकास और औद्योगिक विस्तार की परियोजनाओं को प्राथमिकता देते हुए प्राकृतिक वनों की कीमत पर फैसले लिए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पुराने और बड़े जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते बल्कि वे जैव विविधता, जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता और कार्बन अवशोषण जैसी महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी सेवाएं प्रदान करते हैं।
इन जंगलों के विनाश से सांसों का संकट पैदा हो जाएगा। यदि इसी तरह से पेड़ कटते रहे तो एक दिन मानवता को खतरा आ जाएगा। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
यदि विकास की रफ्तार इसी तरह जंगलों को निगलती रही तो आने वाले वर्षों में इसकी सबसे बड़ी कीमत केवल वन्यजीव ही नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता को स्वच्छ हवा, पानी और स्वस्थ पर्यावरण के रूप में चुकानी पड़ सकती है।
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