भू-जल दोहन पर लगेगी लगाम, हर जिले में बनेगी निगरानी परिषद

VINAY VERMA | Jun 29, 2026, 17:06 IST
भू-जल स्तर सुधारने सरकार का बड़ा फैसला
छत्तीसगढ़ सरकार ने गिरते भू-जल स्तर को रोकने के लिए नई निगरानी व्यवस्था लागू की है। अब घरेलू, कृषि, औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं का पंजीकरण जरूरी होगा। हर जिले में कलेक्टर की अध्यक्षता में परिषद बनेगी।

Raipur। छत्तीसगढ़ में लगातार गिरते भू-जल स्तर और बढ़ते जल संकट को देखते हुए राज्य सरकार ने बड़ा प्रशासनिक फैसला लिया है। सरकार ने छत्तीसगढ़ भू-जल अधिनियम के तहत पूरे प्रदेश में त्रि-स्तरीय निगरानी प्रणाली लागू कर दी है। अब भू-जल के दोहन से लेकर उसके उपयोग तक हर स्तर पर निगरानी होगी। सरकार का उद्देश्य अनियंत्रित भू-जल दोहन पर रोक लगाना, जल स्रोतों का संरक्षण करना और भविष्य में संभावित जल संकट से निपटने की तैयारी करना है।



मुख्य सचिव के हाथ में कमान

नई व्यवस्था के तहत राज्य स्तर पर छत्तीसगढ़ भू-जल प्रबंधन एवं विनियामक प्राधिकरण का गठन किया जा रहा। इस प्राधिकरण की कमान मुख्य सचिव के हाथ में होगी। इसके सदस्य जल संसाधन, वित्त, कृषि, उद्योग और पर्यावरण संरक्षण विभाग के सचिव स्तर के अधिकारी होंगे। प्राधिकरण तय करेगा कि प्रदेश के किस क्षेत्र से कितना भू-जल निकाला जा सकता है? किस उद्योग या व्यावसायिक संस्थान को अनुमति मिलेगी? पूरे राज्य का भू-जल डाटाबेस कैसे तैयार होगा?



बिना रजिस्ट्रेशन नहीं निकाल सकेंगे भू-जल

सरकार ने भू-जल उपयोग को लेकर नियम भी कड़े कर दिए हैं। अब केवल उद्योग ही नहीं, बल्कि घरेलू, कृषि और व्यावसायिक श्रेणी के नए और पुराने सभी उपयोगकर्ताओं को पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोग के लिए भू-जल निकालने पर शुल्क भी लगाया जा सकेगा। यानी अब भू-जल का उपयोग पहले की तरह पूरी तरह अनियंत्रित नहीं रहेगा और हर उपयोगकर्ता सरकारी निगरानी के दायरे में होगा।



सेंसर से होगी हर बूंद की निगरानी

नई व्यवस्था में तकनीक को भी अहम भूमिका दी गई है। भू-जल स्तर की निगरानी के लिए प्रदेशभर में पीजोमीटर, सेंसर और टेलीमेट्री नेटवर्क स्थापित किए जाएंगे। इन उपकरणों के जरिए रियल टाइम में यह पता लगाया जाएगा कि किस इलाके में भू-जल स्तर कितना है, कहां तेजी से गिर रहा है और किन क्षेत्रों में तत्काल संरक्षण की जरूरत है। इससे सरकार को समय रहते आवश्यक कदम उठाने में मदद मिलेगी।



हर जिले में बनेगी भू-जल परिषद

राज्य सरकार ने जिला स्तर पर जिला भू-जल प्रबंधन परिषद के गठन का भी फैसला किया है। इसकी अध्यक्षता संबंधित जिले के कलेक्टर करेंगे, जबकि जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी उपाध्यक्ष होंगे। जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता सदस्य-सचिव की भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा वन विभाग, कृषि विभाग, पर्यावरण संरक्षण मंडल, भू-जल सर्वेक्षण इकाई, नगर निगम या नगरपालिका, जिला उद्योग केंद्र और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारी परिषद के सदस्य होंगे। भू-जल विशेषज्ञों को भी परिषद में शामिल किया जाएगा।



जिला स्तर पर होगी अनुमति

जिला परिषद की जिम्मेदारी केवल निगरानी तक सीमित नहीं होगी। परिषद जिला भू-जल सुरक्षा योजना तैयार करेगी, औद्योगिक और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं का पंजीकरण करेगी, भू-जल दोहन की अनुमति देने की सिफारिश करेगी और ड्रिलिंग एजेंसियों व बोरिंग मशीनों का भी पंजीकरण करेगी। इसके अलावा नगरीय निकायों के साथ मिलकर जल स्तर की निगरानी के लिए आवश्यक तकनीकी ढांचा विकसित किया जाएगा।



अब नियम तोड़ना पड़ेगा भारी

सरकार का मानना है कि लगातार गिरते भू-जल स्तर और बढ़ती जल मांग को देखते हुए अब सख्त नियमन की जरूरत है। नई व्यवस्था लागू होने के बाद भू-जल का दोहन पूरी तरह निगरानी के दायरे में आ जाएगा। इससे एक ओर जल संरक्षण को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर भविष्य में पेयजल संकट और भू-जल के अंधाधुंध दोहन पर भी प्रभावी नियंत्रण लगाने की दिशा में सरकार को मजबूत आधार मिलेगा।



FAQ

  1. क्या अब सभी को भू-जल उपयोग के लिए पंजीकरण कराना होगा?
    हां, नई व्यवस्था के तहत घरेलू, कृषि, औद्योगिक और व्यावसायिक सभी प्रकार के भू-जल उपयोगकर्ताओं को पंजीकरण कराना अनिवार्य कर दिया गया है। बिना रजिस्ट्रेशन किसी को भी भू-जल निकालने की अनुमति नहीं होगी।
  2. भू-जल की निगरानी कैसे की जाएगी?
    भू-जल स्तर की निगरानी अब आधुनिक तकनीक से की जाएगी। इसके लिए प्रदेश में पीजोमीटर, सेंसर और टेलीमेट्री नेटवर्क लगाए जाएंगे, जो रियल टाइम डेटा देकर बताएंगे कि किस क्षेत्र में जल स्तर गिर रहा है या स्थिर है।
  3. नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई होगी?
    अगर कोई व्यक्ति या संस्था बिना अनुमति भू-जल का दोहन करती है या नियमों का उल्लंघन करती है, तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा और गंभीर मामलों में कानूनी कार्रवाई भी की जा सकती है।

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