हसदेव अरण्य में नई खदान को मंजूरी पर भड़के सिंहदेव बोले-अडानी को फायदा पहुंचाने का खेल शुरू

Umeshwari Baghel | May 28, 2026, 22:25 IST
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हसदेव अरण्य में केते एक्सटेंशन कोल परियोजना को मंजूरी मिलने से लगभग सात लाख पेड़ों की कटाई होने का खतरा है। रामगढ़ पहाड़ का अस्तित्व भी प्रभावित हो सकता है। पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने पर्यावरण और आदिवासी हितों की अनदेखी पर सवाल उठाए हैं।

NEWS IN SHORT

  • हसदेव अरण्य में केते एक्सटेंशन कोल परियोजना को मिली मंजूरी
  • सात लाख पेड़ों की कटाई से वन क्षेत्र पर पड़ेगा गंभीर असर
  • रामगढ़ पहाड़ के अस्तित्व पर बढ़ता संकट
  • पूर्व उपमुख्यमंत्री सिंहदेव ने सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए
  • आंदोलनकारी हसदेव बचाने और परियोजना रद्द करने की मांग में सक्रिय

NEWS IN DETAIL

Ambikapur। छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र में प्रस्तावित केते एक्सटेंशन कोल परियोजना को हाल ही में स्वीकृति मिली है, जिसे लेकर पूर्व उपमुख्यमंत्री टीएस सिंहदेव ने केंद्र और राज्य सरकार की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं।



सिंहदेव ने आरोप लगाया कि इस परियोजना को मंजूरी देने का उद्देश्य जनहित और पर्यावरण संरक्षण की अनदेखी कर निजी कंपनी अडानी समूह को लाभ पहुंचाना है। परियोजना के तहत लगभग 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होगी और लगभग सात लाख पेड़ों की कटाई की आशंका जताई जा रही है।



रामगढ़ पहाड़ पर खतरे की चेतावनी

सिंहदेव ने कहा कि यह खनन क्षेत्र सरगुजा के ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व वाले रामगढ़ पहाड़ से सटा हुआ है। पहले से संचालित कोयला परियोजनाओं के कारण पहाड़ में दरारें और चट्टानों के टूटने की घटनाएं सामने आई हैं। नई खदान की स्वीकृति से यह संकट और गहरा सकता है, जिससे रामगढ़ पहाड़ के अस्तित्व पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।



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पूर्व नीतियों और संवैधानिक पहल

टीएस सिंहदेव ने याद दिलाया कि 26 जुलाई 2022 को छत्तीसगढ़ विधानसभा के विशेष सत्र में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया था, जिसमें हसदेव अरण्य में नई कोल परियोजनाओं को अनुमति न देने की बात कही गई थी।



इसके अलावा, जुलाई 2023 में सुप्रीम कोर्ट में दायर शपथ पत्र में भी राज्य सरकार की ओर से नई खदानों को गैरजरूरी बताया गया था। इसके बावजूद परियोजना को मंजूरी देने से सरकार की कथनी और करनी में अंतर स्पष्ट हो जाता है।



आदिवासी हित और पर्यावरण संरक्षण की उपेक्षा

सिंहदेव ने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार पर्यावरण और आदिवासी हितों की उपेक्षा कर एक निजी कंपनी के हित में काम कर रही है। उन्होंने कहा कि पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने संवैधानिक दायरे में रहते हुए हसदेव अरण्य को बचाने के प्रयास किए थे।



परियोजना के विरोध में छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हसदेव बचाओ संघर्ष समिति ने मोर्चा खोल दिया है। आंदोलनकारी हसदेव को जैव विविधता और आदिवासी जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।



परियोजना का संचालन और वन स्वीकृति प्रक्रिया

केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक का एमडीओ (माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर) अडानी समूह है। राज्य सरकार ने पहले ही अपनी अनुशंसा केंद्र को भेज दी है, और यदि केंद्रीय स्वीकृति मिलती है, तो हसदेव अरण्य में लाखों पेड़ों की कटाई का मार्ग खुल जाएगा। इससे क्षेत्र की पारिस्थितिकी, वन्यजीव और आदिवासी समुदायों पर गंभीर असर पड़ने की संभावना है।



निष्कर्ष

टीएस सिंहदेव ने परियोजना के विरोध में जोर देकर कहा कि केंद्र और राज्य सरकार को सार्वजनिक और पर्यावरणीय हित के लिहाज से इस खदान की मंजूरी पर पुनर्विचार करना चाहिए। हसदेव अरण्य और रामगढ़ पहाड़ जैसे संवेदनशील इलाकों में खनन न केवल पर्यावरणीय नुकसान पहुंचा सकता है, बल्कि ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों के अस्तित्व के लिए भी खतरा बन सकता है।



FAQ

  1. केते एक्सटेंशन कोल परियोजना क्या है?
    यह हसदेव अरण्य में प्रस्तावित नई कोयला खदान परियोजना है, जिसका संचालन अडानी समूह करता है।
  2. परियोजना से कितनी वन भूमि प्रभावित होगी?
    लगभग 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होने का अनुमान है और सात लाख पेड़ों की कटाई हो सकती है।
  3. रामगढ़ पहाड़ को खतरा क्यों है?
    पहले से संचालित कोयला खदानों के कारण पहाड़ में दरारें पड़ रही हैं। नई खदान स्थिति और गंभीर कर सकती है।
  4. आंदोलनकारियों की मांग क्या है?
    हसदेव बचाने और जैव विविधता एवं आदिवासी जीवन की सुरक्षा के लिए परियोजना रद्द करने की मांग।

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