पर्यावरण मंत्रालय की हसदेव कोल ब्लॉक को मंजूरी, पहले चरण में कटेंगे 98 हजार पेड़
Raipur. केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र में स्थित केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक के लिए वन भूमि के उपयोग की सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। यह परियोजना राजस्थान सरकार को आवंटित की गई है और इसका खनन कार्य अडानी समूह द्वारा किया जाएगा। मंत्रालय ने लगभग 1,742.6 हेक्टेयर वन भूमि को खनन के लिए डायवर्जन करने की अनुमति दी है।
4 लाख से ज्यादा पेड़ कटेंगे:
इस निर्णय के बाद हसदेव-अरण्य क्षेत्र में बड़े पैमाने पर जंगल कटाई की आशंका बढ़ गई है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार इस परियोजना के कारण लगभग 4.48 लाख पेड़ों की कटाई होगी। इनमें से लगभग 97,837 पेड़ पहले पांच वर्षों में ही काटे जाएंगे। पर्यावरणविदों और स्थानीय संगठनों ने इस फैसले पर गंभीर चिंता व्यक्त की है।
सेंसिटिव जोन घोषित है हसदेव:
वर्ष 2021 में भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद द्वारा किए गए जैव विविधता अध्ययन में हसदेव-अरण्य को अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्र बताया गया था। अध्ययन में सिफारिश की गई थी कि पहले से संचालित परसा ईस्ट केंटे बासन खदान को छोड़कर इस क्षेत्र में किसी नए खनन कार्य की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि यह क्षेत्र हाथियों के महत्वपूर्ण आवासों में से एक है और यहां खनन बढ़ने से मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि हो सकती है।
इन शर्तों पर मंजूरी:
मंत्रालय द्वारा दी गई मंजूरी कुछ शर्तों के साथ प्रदान की गई है। खनन कार्य को दो चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में लगभग 1,001.95 हेक्टेयर भूमि पर 15 वर्षों तक खनन किया जाएगा। दूसरे चरण में शेष 740.65 हेक्टेयर क्षेत्र में खनन तभी शुरू होगा जब पहले चरण के दौरान पुनर्वनीकरण (Reforestation) और जैव विविधता संरक्षण से संबंधित निर्धारित शर्तों का पालन किया जाएगा।
राजस्थान को सप्लाई होगा कोयला:
दस्तावेजों के अनुसार खनन से प्राप्त कोयला राजस्थान विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों को सप्लाई किया जाएगा। यह कोल ब्लॉक वर्ष 2015 में राजस्थान सरकार को आवंटित किया गया था ताकि राज्य के बिजली उत्पादन संयंत्रों के लिए कोयले की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
पेड़ कटाई के बदले नए पेड़:
परियोजना के तहत पेड़ों की कटाई के बदले 130.6 हेक्टेयर गैर-वन भूमि और 4450.326 हेक्टेयर क्षतिग्रस्त वन भूमि पर प्रतिपूरक वनीकरण किया जाएगा। इसके अलावा राज्य वन विभाग को 60 सेंटीमीटर से कम परिधि वाले लगभग *67,414 पेड़ों को अन्य स्थानों पर स्थानांतरित करने के निर्देश दिए गए हैं।
लंग्स जोन है हसदेव:
हसदेव अरण्य छत्तीसगढ़ के कोरबा, सरगुजा और सूरजपुर जिलों में फैला हुआ है और इसका क्षेत्रफल लगभग 1.75 लाख हेक्टेयर माना जाता है। यह क्षेत्र घने साल वनों, समृद्ध जैव विविधता और अनेक वन्यजीव प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है। यहां तेंदुए, भालू, हाथी सहित कई संरक्षित वन्यजीव पाए जाते हैं। यह क्षेत्र हसदेव नदी और बांगो बांध का महत्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र भी है तथा लेमरू हाथी अभयारण्य के निकट स्थित है।
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन का विरोध:
पर्यावरण संरक्षण और आदिवासी अधिकारों के लिए कार्यरत संगठनों ने इस निर्णय का विरोध किया है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन सहित कई समूहों का कहना है कि खनन से न केवल जंगल और वन्यजीव प्रभावित होंगे, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका और पारंपरिक जीवनशैली पर भी गंभीर असर पड़ेगा।
हसदेव-अरण्य को लंबे समय से देश के सबसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता रहा है। ऐसे में इस क्षेत्र में कोयला खनन को मिली मंजूरी ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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