छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, क्या अब बिना काम के भी मिलेगा पूरा वेतन?
NEWS IN SHORT
- बिलासपुर हाई कोर्ट ने नो वर्क नो पे पर दिया अहम फैसला
- जीआर साहू की पदोन्नति और वेतन विवाद का निपटारा
- अधिकारियों की निष्क्रियता बनी याचिकाकर्ता वंचित रहने की वजह
- हाई कोर्ट ने काल्पनिक पदोन्नति और वेतन अंतर के लिए आदेश दिया
- न्यायालय ने कहा, कर्मचारियों को काम रोकने पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता
NEWS IN DETAIL
Bilaspur। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि काम नहीं तो वेतन नहीं का सिद्धांत हर कर्मचारी पर लागू नहीं होता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम केवल सामान्य परिस्थितियों में लागू होगा, जबकि मामलों की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्णय लेना जरूरी है।
याचिकाकर्ता का मामला
जीआर साहू, रिटायर्ड असिस्टेंट कमिश्नर, ट्राइबल वेलफेयर विभाग में कार्यरत थे। उन्हें 13 जुलाई 2011 से उपायुक्त पद पर पदोन्नति का लाभ नहीं मिला। इस कारण उन्होंने न्यायालय में रिट याचिका दायर की। उन्होंने न्यायालय से वेतन अंतर और वरिष्ठता के संबंध में उचित राहत की मांग की।
पहले की कार्रवाई
याचिकाकर्ता ने 2010 और 2011 में पदोन्नति के लिए आवेदन किए, लेकिन किसी भी आवेदन पर तत्काल कार्रवाई नहीं हुई। वर्ष 2014 में राज्य सरकार ने विभागीय पदोन्नति समिति की सिफारिशों के आधार पर उन्हें सहायक आयुक्त पद पर वरिष्ठता प्रदान की। इसके बावजूद, उपायुक्त पद पर पदोन्नति नहीं दी गई।
हाई कोर्ट में रिट याचिका
स्थिति बदलने पर, याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की। अदालत ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि याचिकाकर्ता के पदोन्नति दावे पर शीघ्र विचार करें और निर्णय लेते समय विभागीय सिफारिशों का पालन करें। इसके बाद भी तत्काल कार्यवाही नहीं हुई, जिस पर याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दायर की।
काल्पनिक पदोन्नति और वेतन
राज्य सरकार ने 29 नवंबर 2019 को उन्हें 13 जुलाई 2011 से प्रभावी काल्पनिक पदोन्नति दी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने वेतन अंतर का भुगतान, मुकदमेबाजी की लागत और मानसिक कष्ट के लिए अदालत में अतिरिक्त याचिका भी दायर की।
कोर्ट की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के पदोन्नति से वंचित रहने का कारण केवल अधिकारियों की निष्क्रियता थी। यदि किसी कर्मचारी को अपने कर्तव्यों का पालन करने से रोका जाए, तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस मामले में नो वर्क नो पे सिद्धांत लागू नहीं होता।
न्यायसंगत राहत
अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक वेतन अंतर का 50 प्रतिशत भुगतान किया जाए। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि अधिकारियों की चूक के कारण ही कर्मचारी पदोन्नति के लाभ से वंचित रहा, इसलिए न्यायसंगत राहत देना आवश्यक है।
FAQ
- बिलासपुर हाई कोर्ट ने किस मामले में फैसला दिया?
कोर्ट ने नो वर्क नो पे सिद्धांत और जीआर साहू की पदोन्नति तथा वेतन विवाद पर अहम फैसला दिया। - नो वर्क नो पे सिद्धांत हर कर्मचारी पर लागू होता है?
नहीं, कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत हर स्थिति में लागू नहीं होता, परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लिया जाता है। - जीआर साहू की पदोन्नति क्यों नहीं हुई थी?
अधिकारियों की निष्क्रियता और विलंब के कारण उन्हें 2011 से उपायुक्त पद पर पदोन्नति का लाभ नहीं मिला। - कोर्ट ने याचिकाकर्ता को क्या राहत दी?
याचिकाकर्ता को 13 जुलाई 2011 से 31 दिसंबर 2016 तक वेतन अंतर का 50% भुगतान करने का आदेश दिया गया। - अगर किसी कर्मचारी को काम करने से रोका जाए तो क्या होगा?
कोर्ट ने कहा कि ऐसे कर्मचारी को 'काम न करने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
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