तीसरी बार में बनीं IAS... जानिए भिलाई की नई कमिश्नर सुरुचि सिंह की दिलचस्प कहानी
नए प्रशासनिक फेरबदल में नगर पालिक निगम भिलाई की नई आयुक्त बनाई गई 2020 बैच की आईएएस सुरुचि सिंह, उन युवा अफसरों में शामिल हैं, जिन्होंने प्रशासनिक जिम्मेदारियों के साथ टेक्नोलॉजी और इनोवेशन को भी अपनी पहचान बनाया। बस्तर में प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने जिस मातृभूमि जीओएस एप का प्रस्तुतीकरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने किया, वही एप आज कई राज्यों में लागू हो चुका है और अन्य राज्य भी इसे अपनाने की तैयारी में हैं। दिल्ली में पली-बढ़ी सुरुचि सिंह का छत्तीसगढ़ से रिश्ता केवल कैडर आवंटन भर नहीं है। उनके परिवार का इस प्रदेश से जुड़ाव उस दौर से है, जब छत्तीसगढ़ अलग राज्य भी नहीं बना था। यही वजह है कि आज जब वे छत्तीसगढ़ में अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभा रही हैं, तो यह सफर उनके परिवार की विरासत से भी जुड़ता दिखाई देता है।
प्रशासनिक माहौल में बीता बचपन
15 सितंबर 1992 को इंदौर में जन्मी सुरुचि सिंह ऐसे परिवार से आती हैं, जहां प्रशासन और सार्वजनिक सेवा जीवन का हिस्सा रहे हैं। उनके पिता कृष्णपाल सिंह 1985 बैच के मध्यप्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी रहे और अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय उन्होंने धमतरी, महासमुंद और बस्तर सहित कई इलाकों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। उनकी माता किरण सिंह ने भी अपने करियर की शुरुआत भारतीय स्टेट बैंक में प्रोबेशनरी अधिकारी के रूप में की और बाद में असिस्टेंट जनरल मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त हुईं। परिवार में उनसे बड़ी एक बहन हैं, जिन्होंने आईआईएम से प्रबंधन की पढ़ाई करने के बाद कॉर्पोरेट क्षेत्र में करियर बनाया और वर्तमान में सिंगापुर में रह रही हैं।
अलग-अलग शहरों से दिल्ली तक की पढ़ाई
पिता की प्रशासनिक पदस्थापनाओं के कारण बचपन मध्यप्रदेश के विभिन्न शहरों में बीता। बाद में मां की नौकरी के चलते पूरा परिवार दिल्ली आ गया, जहां सुरुचि सिंह की आगे की शिक्षा पूरी हुई। उन्होंने नई दिल्ली के संस्कृति सीनियर सेकेंडरी स्कूल से सीबीएसई बोर्ड की दसवीं परीक्षा 88 प्रतिशत और बारहवीं परीक्षा 90.1 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की। इसके बाद देश के प्रतिष्ठित नेशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया, बेंगलुरु से वर्ष 2015 में बीए-एलएलबी की डिग्री प्राप्त की। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने देश की प्रसिद्ध लॉ फर्म लूथरा एंड लूथरा में वकालत का पेशेवर अनुभव भी हासिल किया। हालांकि कुछ वर्षों बाद उन्होंने कॉर्पोरेट करियर छोड़कर पूरी तरह सिविल सेवा की तैयारी पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया।
तीन प्रयासों के बाद पूरा हुआ सपना
सिविल सेवा की तैयारी आसान नहीं रही। पहला प्रयास वर्ष 2017 में था, जिसमें वे मुख्य परीक्षा तक पहुंचीं, लेकिन अंतिम चरण में जगह नहीं बना सकीं। दूसरे प्रयास में वर्ष 2018 की परीक्षा के माध्यम से उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) में हुआ और उन्हें केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क विभाग मिला।अधिकांश अभ्यर्थी यहां पहुंचकर संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन सुरुचि सिंह का लक्ष्य आईएएस बनना था। इसलिए उन्होंने एक और प्रयास किया। वर्ष 2019 की यूपीएससी परीक्षा में उन्हें अखिल भारतीय स्तर पर 432वीं रैंक मिली और उनका चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए हो गया। वर्ष 2020 बैच में उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर आवंटित किया गया।
छत्तीसगढ़ क्यों बना पहली पसंद
दिलचस्प बात यह है कि छत्तीसगढ़ से उनका संबंध केवल सेवा आवंटन के बाद नहीं जुड़ा। उनके पिता ने अविभाजित मध्यप्रदेश के दौरान वर्तमान छत्तीसगढ़ के कई जिलों में काम किया था। बस्तर में अतिरिक्त कलेक्टर रहते समय ही परिवार का इस क्षेत्र से गहरा जुड़ाव बना था। उनकी बड़ी बहन का जन्म भी बस्तर में पिता की पदस्थापना के दौरान हुआ था। कैडर वरीयता में उन्होंने मध्यप्रदेश को पहला और छत्तीसगढ़ को दूसरा विकल्प दिया था। अंततः उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला, जिसे उन्होंने पूरे उत्साह के साथ स्वीकार किया।
बस्तर में शुरू हुई अलग पहचान
प्रशिक्षण के दौरान उनकी पहली महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में बस्तर में सहायक कलेक्टर के रूप में काम करना शामिल था। यही वह इलाका था, जहां कभी उनके पिता भी अतिरिक्त कलेक्टर रह चुके थे। बस्तर में कार्य करते हुए उन्होंने प्रशासनिक चुनौतियों को नजदीक से समझा और तकनीक आधारित समाधान विकसित करने की दिशा में भी काम किया। बाद में उन्हें भारत सरकार के भूमि संसाधन विभाग में तीन माह के लिए सहायक सचिव के रूप में प्रतिनियुक्त किया गया।
जब प्रधानमंत्री के सामने किया प्रेजेंटेशन
भूमि संसाधन विभाग में कार्यकाल के दौरान उनकी टीम ने मातृभूमि जीओएस एप विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस एप का उद्देश्य केवल जमीन का रिकॉर्ड दिखाना नहीं था, बल्कि भूमि से जुड़ी सूचनाओं को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराना था। एप के जरिए किसी भी खसरा नंबर की जानकारी खोजने पर भूमि का नक्शा, स्वामित्व संबंधी विवरण, आसपास की सड़कें, प्राकृतिक संकेतक, नदी की दूरी और अन्य भौगोलिक जानकारियां भी एक साथ उपलब्ध हो जाती हैं। इससे राजस्व प्रशासन, भूमि प्रबंधन और आम नागरिकों को काफी सुविधा मिलती है। इस नवाचार की उपयोगिता को देखते हुए केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए चुना। देश के प्रधानमंत्री के सामने इस एप का प्रस्तुतीकरण स्वयं आईएएस सुरुचि सिंह ने दिया। इसके बाद इस मॉडल की व्यापक चर्चा हुई और कई राज्यों ने इसे अपनाने में रुचि दिखाई। वर्तमान में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र सहित कुछ अन्य राज्यों में यह प्रणाली लागू हो चुकी है, जबकि अन्य राज्य भी इसे अपनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।
प्रशासनिक जिम्मेदारियों में बढ़ता दायरा
प्रशिक्षण पूरा होने के बाद सुरुचि सिंह को बेमेतरा जिले में एसडीएम की जिम्मेदारी मिली। यहां उन्होंने कानून-व्यवस्था, राजस्व और विकास कार्यों से जुड़े कई महत्वपूर्ण मामलों को संभाला। इसके बाद राज्य सरकार ने उन्हें राजनांदगांव जिला पंचायत का मुख्य कार्यपालन अधिकारी नियुक्त किया है। यह पद ग्रामीण विकास, पंचायत योजनाओं और शासन की कल्याणकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। अब नए प्रशासनिक फेरबदल में सुरुचि सिंह को भिलाई नगर पालिक निगम का आयुक्त बनाया गया है।
युवा प्रशासनिक अधिकारी की नई पहचान
सुरुचि सिंह की यात्रा केवल एक आईएएस अधिकारी बनने की कहानी नहीं है। यह उस सोच का उदाहरण भी है जिसमें प्रशासन, तकनीक और नवाचार एक साथ चलते हैं। कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर सिविल सेवा का सपना देखना, आईआरएस में चयन के बाद भी आईएएस के लिए एक और प्रयास करना और फिर तकनीकी नवाचार के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाना। इन सभी पड़ावों ने उन्हें युवा प्रशासनिक अधिकारियों की नई पीढ़ी में अलग पहचान दिलाई है।भिलाई में उनकी नई जिम्मेदारी इस बात की अगली परीक्षा होगी कि तकनीक और प्रशासनिक अनुभव के सहारे वे शहर को व्यवस्थित करने में किस तरह नए प्रयोग करती हैं।
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