बस्तर के बाद जशपुर में होमस्टे, 1.80 करोड़ की योजना पर सवाल
बस्तर के बाद अब जशपुर में भी होमस्टे की योजना को मंजूरी मिल गई है। सरकार ने बगीचा-मयाली-जशपुर इलाके के 6 जनजातीय गांवों में 30 होमस्टे बनाने का फैसला किया है। कागज पर योजना बड़ी दिख रही है, लेकिन असली सवाल यह है कि इसका फायदा सीधे गांव के परिवारों तक कितना पहुंचेगा? क्योंकि पर्यटन योजनाओं में घोषणा से ज्यादा जरूरी पैसा, निर्माण और स्थानीय लोगों की भागीदारी होती है।
1.80 करोड़ का हिसाब
किंकेल, कमतरा, डंगरी, महनई, सरुधाप और पंडरापाठ में पांच-पांच होमस्टे बनाए जाएंगे। पूरी परियोजना पर करीब 1.80 करोड़ रुपए खर्च प्रस्तावित है। इसके अलावा गांवों में सामुदायिक सुविधाओं के लिए अलग से पांच लाख रुपए तक के काम किए जाने हैं। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि यह पैसा जमीन पर कितना दिखता है और कितनी सुविधाएं सिर्फ कागजों में रह जाती हैं।
सिर्फ कमरे बनाने से पर्यटन नहीं
सरकार का दावा है कि होमस्टे से पर्यटक स्थानीय परिवारों के साथ रहेंगे और जनजातीय संस्कृति, खान-पान और ग्रामीण जीवन को करीब से समझेंगे। लेकिन सवाल सीधा है। क्या सिर्फ घर में कमरा बना देने से पर्यटक गांव तक पहुंच जाएंगे? सड़क, इंटरनेट, साफ-सफाई, पानी, सुरक्षा, स्थानीय गाइड और प्रचार के बिना होमस्टे की पूरी योजना अधूरी रह सकती है।
बस्तर के बाद जशपुर
जशपुर में होमस्टे मॉडल की चर्चा ऐसे समय हो रही है, जब बस्तर में भी पर्यटन को गांवों और स्थानीय समुदायों से जोड़ने की कोशिशें चल रही हैं। अब जशपुर में भी वही मॉडल लाने की तैयारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां योजना शुरू होने से पहले ही यह देखना होगा कि स्थानीय परिवार वास्तव में इसके मालिक और कमाई के हिस्सेदार बनते हैं या सिर्फ योजना के लाभार्थी बनकर रह जाते हैं।
पहले भी हो चुके हैं होम स्टे फेल
कई मोर्टल कबाड़ होने के बाद पर्यटन मंडल पिछले साल से प्रदेश में होम स्टे का कॉसेप्ट लेकर आई। दावा था पर्यटको को बस्तरिया संस्कृति और सभ्यता को करीब से जानने का मौका मिलेगा। इसके अलावा स्थानीय जनजातियों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी। व्यवस्था बनाने पर्यटन मंडल ने करोड़ों रुपए खर्च किए थे। लेकिन मॉनिटरिंग और मेंटेनेंस के बिना सब बर्बाद हो गया। योजना फेल होने के कगार पर है। अब यही योजना सरगुजा के लिए लांच की गई है।
पर्यटन स्थलों का सहारा
जशपुर में कैलाश गुफा, खुड़ियारानी गुफा, बादलखोल अभयारण्य, रानीदाह जलप्रपात, देशदेखा पहाड़ और लोरोघाट जैसे इलाके हैं। यानी पर्यटकों को खींचने के लिए जगहों की कमी नहीं है। असली चुनौती पर्यटकों को इन जगहों तक लाने और उन्हें गांव में रोकने की है। अगर ठहरने और घूमने का पूरा नेटवर्क नहीं बना तो 30 होमस्टे कितने पर्यटकों को रोक पाएंगे, यह बड़ा सवाल है।
रोजगार का दावा
योजना में स्थानीय युवाओं और महिलाओं को गाइड, भोजन, परिवहन, हस्तशिल्प और दूसरी पर्यटन सेवाओं से जोड़ने की बात कही गई है। दावा है कि इससे गांव में रोजगार बढ़ेगा। लेकिन इसके लिए सिर्फ योजना बनाना काफी नहीं। प्रशिक्षण, बाजार और नियमित पर्यटक मिलना भी जरूरी है। वरना होमस्टे बनेंगे, लेकिन कमरे खाली रहेंगे और निवेश का फायदा नहीं मिलेगा।
सरकार से सीधा सवाल
1.80 करोड़ रुपए खर्च होने के बाद इन 30 होमस्टे की निगरानी कौन करेगा? किस परिवार को कितना पैसा मिलेगा? निर्माण के बाद रखरखाव कौन करेगा? पर्यटक लाने की जिम्मेदारी किसकी होगी? और अगर होमस्टे में पर्यटक नहीं पहुंचे तो परिवारों की आय कैसे बढ़ेगी? इन सवालों का जवाब योजना की सफलता तय करेगा।
स्थानीय हिस्सेदारी सबसे जरूरी
जनजातीय पर्यटन का सबसे बड़ा फायदा तभी है, जब स्थानीय परिवारों की जेब में पैसा पहुंचे। बाहर की एजेंसियां निर्माण करें, बाहर के लोग पर्यटन चलाएं और गांव के लोग सिर्फ मेहमाननवाजी करें तो इसे ग्रामीण पर्यटन का मॉडल नहीं कहा जा सकता। जशपुर की इस योजना की असली परीक्षा यही होगी कि 30 होमस्टे के साथ कितने परिवारों की स्थायी कमाई शुरू होती है।
अब जमीन पर नजर
सरकार ने मंजूरी दे दी है। पैसा भी प्रस्तावित है और गांव भी तय हो चुके हैं। अब असली कहानी मंजूरी की नहीं, जमीन पर काम की होगी। होमस्टे कब बनते हैं, किसके घर बनते हैं, पैसा कितना खर्च होता है और पर्यटक कितने पहुंचते हैं, इसकी निगरानी जरूरी होगी। वरना 1.80 करोड़ की यह योजना भी पर्यटन के नाम पर एक और सरकारी फाइल बनकर रह सकती है।
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